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45. उपसंहार

श्रीकृष्ण भगवान ने अर्जुन का विषाद दूर करने के लिए गीताजी का उपदेश दिया । ईस तरह गीताजी की शुरुआत अर्जुन विषाद योग से होती है । लेख नंबर 6 से - "युध्ध नहीं करना या करना ?" से शुरु होकर, लेख नंबर 32 में "यहां गीताजी पूर्ण होती है", ऐसा जीक्र है । (पेज नंबर 94) । गीताजी ईतना बडा गहन ग्रंथ है कि उसे मर्यादित पन्ने  में लिखा नहीं जा सकता । उसके बारे में जितना भी अधिक सोचें, नये नये विचार   आएंगे । और लेख ईस तरह लिखे गए हैं । एक मित्र ने दिपावली नजदीक होने से, गीताजी के उपलक्ष्य में दिपावली और नूतन वर्ष के बारे में कुछ लिखने को कहा । गीताजी में ऐसा कोई जीक्र नहीं है, फिर भी परमात्मा ने जो लिखाया वह लिखा ।

दिपावली प्रकाश का पर्व है । प्रकाश परमात्मा का निराकार स्वरुप है । ईसी लिए दिपावली परमात्मा की आराधना करने का पर्व है । जीवन को निर्मल बना के, परमात्मा की आराधना करें तो, हमारा जीवन प्रकाशमय हो जाए । उस दिन लक्ष्मीपूजन का विशेष महत्व है । लक्ष्मी के बिना जीवन निर्वाह मुश्किल हो जाए । जीवन में दोनों का विशेष महत्व है । प्रामाणिक रुप से, परिश्रम कर के, धन उपार्जन कर के, परिवार के लिए और समाज के लिए उसका सदउपयोग करें तो ऐसा लक्ष्मीपूजन मंगलकारी हो जाए ।

नूतन वर्ष के दिन जीवन के लेखाजोखा करने की बात है । लेखाजोखा करने से ही फायदा या घाटा के बारे में पता चलेगा । धन जीवन के लिए जरुरी है मगर वह, सर्वस्व नहीं है । जीवन, धन से अधिक मूल्यवान है । आर्थिक नुकशान न हो ईसकी जितनी परवाह करते हैं, ईससे अधिक परवाह, जीवन मूल्यों को नुकशान न हो, ईसकी करें तो, और सभी का कल्याण हो, ऐसी कोशिष करें तो, समाज में परिवर्तन आ जाए ।

आज के कहेलाते गुरु सौजन्य की सीमा का उल्लंघन कर रहें है । समाज में सुधार करने का, संस्कारी बनाने का जिन का उत्तर दायित्व है, वे नराधम हो गए हैं । दो-चार शिक्षकों को सजा दी जाए, ईतना काफी नहीं है । धन के प्रति अंधी दौड और असंस्कारी शिक्षकों को रक्षण देनेवाले राजकीय नेता सुधरेंगे, तभी ये संभवित होगा । ऐसे असामाजिक तत्व समाज में से ही आते हैं । नराधम शिक्षकों को कडी से कडी सजा दी जाए और असामाजिक राजकारणीओं को जनता ईलेक्शन में वोट न दें, तभी समाज अच्छा होगा । समाज को निर्मल करने के लिए यह बहुत जरुरी है ।

लेख नंबर 6 में दो बात महत्वपूर्ण है । (1) अन्याय को सह लेना, यह कायरता है, अधर्म है । ईसके खिलाफ युध्ध करना ही चाहिये । (2) हर आदमी का एक छूपा हुआ दुश्मन होता है । यह दुश्मन माने अपना खुद का मन । उसके खिलाफ भी युध्ध अनिवार्य  है । मैं गीताजी का पूरा ज्ञानी नहीं हूं । ईसी लिए ये दोनों बातों का गीताजी में स्पष्ट जीक्र है या नहीं, यह मुझे मालूम नहीं । ये दोनों विषयों के बारे में मेरा अज्ञान मुझे परेशान करता था । परमात्मा की कृपा से, ये दोनों प्रश्नों का सुखद समाधान मिल गया ।

हमारे विद्वान लेखक श्री गौतमभाई शर्मा की पुस्तक "વિષ્ટિકાર શ્રીકૃષ્ણ" में पेज नंबर 351 पर अन्याय के बारे में बहुत स्पष्ट बात है । श्रीकृष्ण भगवान ने कहा कि - "पांडव और कौरव का यह कलह सिर्फ प्रतीक ही है । धर्म ...सहनशील धर्म को, जो अब तक बहुत अन्याय सहन करता रहा है, उसे अब अधर्म के खिलाफ युध्ध करना ही चाहिये ।"

हमारे विद्वान लेखक श्री हरीन्द्रभाई दवे की पुस्तक " આનંદ પુરુષ શ્રીકૃષ્ણ " में पेज नंबर 28 पर, मन के साथ युध्ध के बारे में बहुत सुंदर जीक्र है । महाभारत युध्ध खत्म होने के बाद स्वजनों की हत्या के बारे में युधिष्ठिर को गहेरा विषाद हुआ । खुद धृतराष्ट्र युधिष्ठिर को आश्वासन देते हुए कहेते हैं - "स्वप्न में मिला हुआ धन की भांति, मेरे सौ पुत्रों का विनाश हो गया । विषाद तो मुझे होना चाहिये ।" फिर भी युधिष्ठिर का विषाद कम नहीं होता, तब परमात्मा श्रीकृष्ण भगवान युधिष्ठिर को कहेते हैं -

" यच्च ते द्रोण भीष्माभ्याम् युध्धम् असीदरिदम्,

मनसा एकेन योध्धव्य तत् ते युध्धम् उपस्थितम् ..."

"हे शत्रुदमन ! आप ने द्रोण और भीष्म के साथ किया हुआ था वही युध्ध, आज आप के सामने आया है ।  लेकिन यह युध्ध मनसा माने कि मन के खिलाफ लडना है । और एकेन माने कि अकेले ही लडना है । अपने भैया भीम या अर्जुन का शौर्य भी यह युध्ध लडने के लिए निकम्मा है ।" श्रीकृष्ण भगवान ने यह बात हम सब को समझाई है । जीवन में आनेवाले दु:ख, आर्थिक नुकशान, पराजय, निष्फलता, शोक वगैरह के साथ निर्भय होकर, अकेले ही लडना पडेगा । तुम चाहो या न चाहो, ईस युध्ध में, तुम्हारे किसी स्वजन की सहायता तुम्हें काम नहीं आएगी । यह युध्ध अकेले ही लडना पडता है । अगर थक जाओ या किसी की सहायता चाहो तो परमात्मा की शरण में जाना चाहिये । वे अवश्य सहायता करेंगे ।

उपरोक्त दोनों बातें, माने अन्याय के खिलाफ युध्ध करने की और मन के खिलाफ युध्ध करने की, श्रीकृष्ण भगवान ने ही कही है । ईसी लिए यह गीताजी की लेखमाला मैंने  नहीं लिखी है मगर परमात्मा ने ही लिखायी है । यह स्वाभाविक रुप से सिध्ध होने से, मैं बहुत आनंद महसूस करता हूं।

यह कोई भ्रम या अतिशयोक्ति नहीं है मगर निर्भेल सत्य ही है । मेरी कोई योग्यता न होने पर भी, परमात्मा ने गीताजी की लेखमाला लिखायी, यह मेरा परम सौभाग्य है । एक पवित्र कार्य के लिए, मुझे निमित्त बनाया, ईससे अधिक आनंद की बात क्या हो सकती है ? परम कृपालु परमात्मा बडे दयालु हैं । जीवन में उनकी कृपा मिल जाए, ईसे परम सौभाग्य न कहें तो क्या कहें ?
हमारे विद्वान लेखक श्री हरीन्द्रभाई दवे की पुस्तक " આનંદ પુરુષ શ્રીકૃષ્ણ " में पेज नंबर 29 पर एक छोटी सी बात बहुत ही अजीब है -
"अगर श्रीकृष्ण हमारा हाथ थाम ले तो, सारी दुनिया हमें तिरस्कृत करे तो भी मानवी तिरस्कृत नहीं होता । लेकिन श्रीकृष्ण हमारी उंगली छोड दे तो, मनुष्य कभी, कहीं का नहीं रहेता ।"
जगतनियंता को मेरी ईतनी ही विनम्र प्रार्थना है कि - " हे श्रीकृष्ण भगवान ! हे परम दयालु ! मेरे में अगणित अवगुन होने पर भी, किसी भी हालत में, मुझे तिरस्कृत मत करियेगा । अगर आप तिरस्कृत करेंगे तो मैं कहीं का नहीं रहुंगा । मुझे सिर्फ आप की शरण चाहिये । और कोई भी अपेक्षा नहीं है । जीवन की अंतिम क्षण में आप का स्मरण न भूलुं, बस यही प्रार्थना है । मुझे कुछ नहीं चाहिये । मेरा अस्तित्व भूलकर, मैं संपूर्ण रुप से आप में खो जाना चाहता हूं । मैं जन्म से ही तिरस्कृत बालक हूं । अगर आप ठुकरायेंगे तो मैं कहां जाउंगा ? मेरा हाथ थाम लोगे न प्रभु ? "
 

     परम भक्त श्री सुरदासजी की प्रार्थना मैं बार बार दोहराता हूं -

" नैन हीन को राह दिखा प्रभु ! पग पग ठोकर खाउं मैं, प्रभु !...

चहुं ओर मेरे घोर अंधेरा, भूल न जाउं द्वार तेरा,

एक बार प्रभु ! हाथ पकड लो, एक बार प्रभु ! हाथ पकड लो......

तुम्हरी नगरीया की कठिन डगरीया, चलत चलत गिर जाउं मैं प्रभु !

एक बार प्रभु ! हाथ पकड लो, एक बार प्रभु ! हाथ पकड लो ......

................

 त्वम् एकम् शरेण्यम्, त्वम् एकम् वरेण्यम् ,

त्वम् एकम् जगत पालकम्, स्व प्रकाशम् ,

त्वम् एकम् निरालंबम् ईश !, त्वम् एकम् ,

भवान् अंबोधि पोते शरणम् व्रजाम ....

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