श्रीकृष्ण भगवान ने श्रीमद् भगवद् गीताजी में परम शांति का अनुभव करने के लिए, हमें श्रेष्ठ मार्ग दिखलाए हैं । स्वार्थ का त्याग करना, क्रोध का त्याग करना, ईच्छाओं का त्याग करना, सुख और दु:ख को समान मानना, लाभ-हानि, जय-पराजय, सफलता-निष्फलता, आदि जीवन के तमाम द्वंदों में समान भाव रख के उनसे विचलित न होना, उत्तम जीवन बनाने के लिए, स्थितप्रज्ञ बनना, परमात्मा की भक्ति करना, गुणातीत बनना, ये सब हमने पहेले गीताजी में पढा है, लेकिन ये काफी नहीं है । जीवन की मंझील का यह उत्तम मार्ग होने पर भी, उस मार्ग पर न चलें तो, मंझील तक नहीं पहुंच पाएंगे । गीताजी दुनीया की श्रेष्ठ पुस्तक है, मगर सिर्फ पढने से या कंठस्थ करने से परम शांति ऐसा ही, श्रीमद् भागवत, रामायण, वेद, उपनिषद या किसी भी उत्तम ग्रंथ के बारे में कह सकते हैं । न मिले ।
ऐसा ही गुरु के बारे में भी कह सकते हैं । गुरु परम ज्ञानवान हो, आत्म साक्षात्कार किया हो, फिर भी वे अपने तमाम शिष्यों को आत्म साक्षात्कार न करा सकें । सदगुरु परमहंस स्वामी श्री रामकृष्णदेवजी के कई अनुयायी थे, लेकिन उनमें से एक ही शिष्य स्वामी श्री विवेकानंदजी को आत्म साक्षात्कार करा सके । ऐसा क्यों ? गुरु समर्थ हो, मगर शिष्य की पात्रता भी अत्यंत महत्वपूर्ण है । रेडीओ या टेलीवीझन की ट्रान्समीशन सीस्टम अच्छी हो, साथसाथ रेडीओ या टेलीवीझन की रीसीवींग सीस्टम भी अच्छी होनी चाहिये । अगर हमारा रेडीओ या टेलीवीझन खराब हो तो पहेले उसे ठीक करना चाहिये । उसमें क्या दोष है, यह ढुंढकर, उसे दूर करने की सक्रिय कोशिष करनी चाहिये । स्वामी श्री विवेकानंदजी आत्म साक्षात्कार कर सके, क्योंकि वे खुद बहुत उच्च कोटि के साधक थे ।
महाराष्ट्र के श्री जी. के. प्रधान नाम के सज्जन ने ईंग्लीश भाषा में लिखी हुई पुस्तक "Towards The Silver Crest of The Himalayas" का श्री गुलाबराय मंकोडी नाम के सज्जन ने किया हुआ गुजराती अनुवाद "હિમગિરિ શિખરોનો આધ્યાત્મિક સાદ" नाम की उत्तम पुस्तक खास पढने लायक है । उसमें श्री गुरुदेव नाम से जिनका जीक्र है, उन्होंने भी पुस्तक और गुरु के बारे में ऐसा ही अभिप्राय व्यक्त किया है । पुस्तक पढने से या कंठस्थ करने से परम शांति नहीं मिलती । पुस्तक संदर्भ ग्रंथ के रुप में उपयोगी हो सकती है । ईससे हमारा ज्ञान बढ सकता है, हमारी माहिती बढ सकती है, लेकिन ज्ञान का अनुभव किए बिना परम शांति तो नहीं मिल सकती ।
पुस्तक में लिखे हुए ज्ञान का अनुभव पाने के लिए, हमें खुद कोशिष करनी होगी ।
गीताजी में जो कुछ उत्तम उपदेश है, उसके मुताबिक हमें स्वार्थ का त्याग करना होगा, क्रोध का त्याग करना होगा, ईच्छाओं का त्याग करना होगा, जीवन के द्वंदोमें समान भाव रखने की कोशिष करनी होगी । गीताजी में बहुत ही उत्तम ज्ञान है, ईसमें कोई शक नहीं, मगर सिर्फ गीताजी पढने से या कंठस्थ करने से आत्म साक्षात्कार नहीं होगा, ईसमें भी कोई शक नहीं । परम शांति बहुत उच्च कोटि का अनुभव है । वह स्वयं करना अत्यंत आवश्यक है ।
ईसी तरह गुरु भी मार्गदर्शन कर सके, लेकिन वह मार्ग पर शिष्य को खुद चलना पडेगा । गुरु प्रेरणा दे सके, मगर आत्म साक्षात्कार नहीं करा सकते । श्री गुरुदेव के शब्दों में कहें तो – "परम शांति भेट सोगाद के स्वरुप में देने की या लेने की चीज नहीं है, कोई गुरु ईसे दे नहीं सकता, कोई शिष्य उसे ले नहीं सकता । शिष्य को खुद अनुभव करना आवश्यक है । अनुभव अनुभव ही है ।"परम शांति का ही दूसरा नाम है । "હિમ ગિરિ શિખરોનો આધ્યાત્મિક સાદ" पुस्तक में पेईज नंबर 32 से 37 तक श्री गुरुदेव का प्रवचन दिया है, वह बहुत ही उत्तम है । ईसका बयान नहीं हो सकता । आत्म साक्षात्कार यह
उन्होंने एक बहुत सुंदर बात कही कि कोई सभागृह में अगर सभी परस्पर बातें करते रहें तो वातावरण में कोलाहल हो जाएगा । सभी चिल्ला चिल्लाकर दूसरों को शांत रहेने को कहें, तो शांति नहीं होगी । अगर सभी खुद शात हो जाए तो तुरन्त शांति हो जाएगी । समाज में हम दूसरों को सुधारने की कोशिष करते हैं, मगर खुद सुधरना नहीं चाहते । सभी अपने आप अच्छे हो जाए तो, समाज भी अपने आप अच्छा बन जाएगा ।
श्री गुरुदेव ने दूसरी बात कही कि अगर सभागृह में किसी अन्य साधनों की वजह से कोलाहल होता हो और हमें अशांति लगती हो तो, कोलाहल उत्पन्न करनेवाले साधनों को दूर करें । हमारे जीवन में काम, क्रोध, लोभ, मोह, ये सभी अशांति को जन्म देनेवाले साधन हैं । यह हम जानते हैं । धीरे धीरे एक एक करके उन्हें हमारे जीवन से दूर करें तो, परम शांति का अनुभव होगा ही । यह बात तो श्रीकृष्ण भगवान ने गीताजी में हमें समझाई ही है ।
और गुरु के बारे में उन्होंने कहा कि आज तो जीवन की कठिनाईओं से और चिंताओं से मुक्ति या राहत पाने के लिए ही गुरु की खोज चलती है । अगर एक गुरु ईच्छित राहत न दे सके तो दूसरे गुरु की खोज होती है । आर्थिक या भौतिक राहत पाने -
के लिए, एक गुरु से दूसरे के पास या दूसरे से तीसरे गुरु के पास जाना, ऐसा चलता है । गुरु कोई बेंक नहीं है, जो तुम्हारे आर्थिक प्रश्नों को निपटाते रहे । वैसे ही, गुरु कोई ऐसी सत्ता नहीं है जो तुम्हारे भौतिक प्रश्नों को निपटाते रहे ।
आचार्य श्री रजनीशजी ने उनकी पुस्तक "ભજ ગોવિન્દમ્ મૂઢમતે " में (पेज नंबर 43-44) में बहुत सुंदर बात लिखी है कि – "तुम कहेते हो कि मैं सर्व गुण संपन्न हूं, मैंने कितनी प्रार्थना की, कितनी पूजा की, कितने दीप जलाए, कितनी अगरबत्तियां फूंक डाली, कितने पुष्प तुम्हारे चरनों पर चढाए, कितने उपवास किए, कितना ध्यान किया, कितना तप – सब कुछ कर चूका हूं, लेकिन तुम नहीं आए ।" बस, यह सब गिनती में ही अपना अहंकार छिपा हुआ है । हम सोचते हैं कि – "मैंने ईतना सब कुछ किया, ईसी लिए, मैंने योग्यता प्राप्त कर ली है, परम शांति प्राप्त करने के लिए मैं सुपात्र हो गया हूं । जिन्होंने कुछ नहीं किया, उनको तुम मिले हो, तो मुझे क्यों नहीं ? मुझे अन्याय हो रहा है।" ऐसा दावा करना यह भी अहंकार की ही निशानी है ।
मैंने योग्यता प्राप्त कर ली है, ऐसा सोचने के बजाय संपूर्ण शून्य हो जाओ, विचारविहीन हो जाओ । "खयाल रखना, परमात्मा का अवतरण होता है सिर्फ आपकी शून्यता में, जब तुम परिपूर्ण शून्य बन जाओगे तब पलभर की भी देर नहीं लगेगी । ईधर तुम शून्य हुए, उधर परमात्मा के दर्शन पा सकोगे । ये दोनों घटनाएं एक साथ होती है ।"
हम अपने आप मान लें कि मैंने बहुत ध्यान किया है, मगर वह परिपूर्ण न भी हो । गीताजी अध्याय नंबर 6 'आत्मसंयमयोग' में परम शांति प्राप्त करने के प्रयास को अभ्यास कहा है । वह अभ्यास माने ध्यान, उपासना, आराधना, साधना, जो भी कहो, वह विचारविहीन बनने की प्रक्रिया है । संपूर्ण विचारविहीन बननेवाले को परम शांति मिलेगी ही, यह तो श्रीकृष्ण भगवान का कथन है, ईसी लिए शंका से पर है । परमात्मा के दर्शन होंगे या नहीं, ऐसे असमंजस में रहने की जरुरत नहीं है । सतत ध्यान करते रहो । क्षेत्र में अलग अलग जगह पर 8-10 फुट गहेरा गढ्ढा खोदने के बाद,परम शांति अवश्य मिलेगी ही, यह निर्विवा प्रयत्न छोड दें तो पानी नहीं निकलेगा । एक ही जगह पर बहुत गहेरा कूंआ बनाएंगे तो पानी अवश्य निकलेगा । संपूर्ण विचारविहीन दशा ही हमारी योग्यता होगी । सतत नियमित गहेरा ध्यान करके विचारविहीन बनेंगे तो परमात्मा की कृपा के रुप में द है । फिर कुछ पाने की जरुरत ही नहीं रहेगी ।
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