श्रीकृष्ण भगवान ने गीताजी के सात वें अध्याय ' ज्ञानविज्ञानयोग ' में श्लोक नंबर 4 में कहा है कि - "पृथ्वी, जल, अग्नि, वायु, आकाश, मन बुध्धि और अहंकार - ईस तरह आठ प्रकार की मेरी प्रकृति है ।" दशवां अध्याय ' विभूतियोग ' में परमात्मा के साकार और निराकार दोनों स्वरुप का वर्णन है । श्रीकृष्ण भगवान, श्रीराम, महादेवजी, देवर्षि नारद, सप्त ऋषि वगैरह साकार स्वरुप और सूर्य, चन्द्र, वायु, हिमालय, सागर, गंगाजी वगैरह निराकार स्वरुप, ये सभी एक ही परमात्मा के विभिन्न स्वरुप ही हैं । ईस तरह पृथ्वी, धरती, धरा, भूमि, ( पृथ्वी के विभिन्न नाम) यह परमात्मा का ही निराकार स्वरुप है ।
श्री बंकिमचन्द्र चट्टोपाध्याय नाम के सज्जन ने भारतभूमि को धरतीमाता के रुप में वंदन करता हुआ सुंदर गीत लिखा । ईस गीत को हमारे देश ने राष्ट्रीय गीत के रुप में स्वीकार किया । यह गौरव की बात है । यह उत्तम गीत का भावार्थ समझे बिना, ईसे धार्मिक विवाद का रुप देकर, किसी मुस्लीम कमिटि ने, यह गीत नहीं गाने का, मुस्लीमों को आदेश देता हुआ फतवा प्रकाशित किया । धर्म का मतलब ही नहीं समझनेवाले कई धर्मझनुनी आदमीओं के, यह अयोग्य फतवे की कई मुस्लीम विद्वानों ने भी कडी आलोचना की । यह लेख नासमझ, नादान आदमीओं की आलोचना करने के लिए नहीं लिखा है । मुस्लीम समाज अल्लाह के निराकार स्वरुप की बंदगी करते ही हैं । तो अल्लाह का ही निराकार स्वरुप धरतीमाता को वंदन करने में हिचकिचाहट क्यों ? ऐसी संकुचितता क्यों ?
उपरोक्त सुंदर गीत धरतीमाता को वंदन करने के लिए लिखा गया है । जो धरती, जिनमे से उत्पन्न होती हुई फसल हमारे परिवार का जीवन निर्वाह करती है, जो धरती पर बहेती नदीयां हमे, जीवन के लिए अनिवार्य पानी देती है, जो धरती पर बहेता प्राणवायु हमें जीवन देता है - यह पवित्र धरती माता का आभार प्रगट करने के लिए, ईनके ऋण स्वीकार के रुप में, ईसे वंदन करने के लिए, यह गीत लिखा गया है । यह धरतीमाता भारतमाता हो सकती है, पाकिस्तान की भूमि हो सकती है, अमरिका की भूमि हो सकती है, चीन की धरती हो सकती है या किसी भी देश की धरती हो सकती है। यह धरती पर कौन सा धर्मवाले लोग रहेते हैं ? ईसे कोई मतलब नहीं है ।
प्राचीन काल से, मानव संस्कृति का विकास, किसी न किसी, नदी के तट पर ही हुआ है । नदी में बहेता हुआ पवित्र जल सभी मानवों के लिए बहुत ही उपकारक है, क्यों कि जल बिना जीवन संभव ही नहीं है । ईसी लिए, नदीओं को लोकमाता कहेते हैं ।
धरतीमाता की भांति लोकमाता नदियां भी हमारे वंदन की अधिकारीणी हैं । यह उपकारकता की महत्व पूर्ण बात समझे बिना, धर्म के नाम पर, अगर कोई नदी को वंदन करने की बात का विरोध करे तो वे मूर्ख लोगों की आलोचना करना व्यर्थ है । क्यों कि वे अज्ञानी हैं । अज्ञान होना कोई बुरी बात नहीं । पहेले उन्हें अपना अज्ञान दूर करने की कोशिष करनी चाहिये । लेकिन अपने अज्ञान का प्रसार करने के लिए फतवा प्रकाशित करना, यह अयोग्य है । ऐसे अज्ञानी लोग समझते नहीं और समझना चाहते भी नहीं ।
किसी विद्वान ने बहुत सुंदर कहा - "जो धरती तुम्हें पवित्र न लगती हो, उस पर खडा रहेने का तुम्हें अधिकार नहीं है ।" ईसी तरह "जो नदी का जल तुम्हें उपकारक न लगे, वह पानी तुम्हें पीना नहीं चाहिये ।" जो मुस्लीम भारत में शांति पूर्वक रहेना चाहते हैं, वे यहां शांति से रहे, अपना मुस्लीम धर्म पाले, ईस में किसी को कोई एतराज नहीं होना चाहिये । मगर जिन्हें भारतभूमि अपनी न लगती हो, उन्हें भारत में रहेने का कोई अधिकार नहीं । भारत की धरती पर से बहेती हुई नदी का जल पीने का अधिकार नहीं । भारतभूमि पर से बहेते हुए वायु में से सांस लेने का अधिकार नहीं है ।
हिन्दु धर्म की एक विशेषता सभी को याद रखनी चाहिये । उसमें, सूर्य, हिमालय, सागर, नदी, वृक्ष जैसे तमाम उपकारक तत्वों को परमेश्वर मान कर, उनको पूजा और वंदन के अधिकारी माने गए हैं। करोडों साल से प्रकाशित सूर्यदेव के बिना जीवन संभवित नहीं । सूर्य के तेज से कौन अनजान होगा ? उनकी गरमी से ही सागर जल में से भांप बनती है, जो बादल बन के सारी दुनीया को पानी देती है । तमाम वनस्पति की उत्पत्ति सूर्य की वजह से ही है । सभी स्थलचर, जलचर और खेचर -- मानवी, पशु और पंछी, माने संपूर्ण सजीवसृष्टि का अस्तित्व सूर्य पर ही निर्भर है । यह सनातन सत्य का स्वीकार, सिर्फ आम आदमी ही नहीं लेकिन महाविद्वान वैज्ञानिकों ने भी किया है । अन्य धर्म के लोग सूर्य को परमेश्वर का रुप माने या न माने, लेकिन हिन्दु धर्म, सूर्य को परमेश्वर मानता हैं, ईस लिए सूर्य का बहिष्कार करनेवालों को, महामूर्ख ही समझना चाहिये ।
धरतीमाता को हिन्दु लोग मा कहेते हैं । धरती में से मिलती हुई, मिट्टी, रेती, चूना वगैरह में से सीमेन्ट बनती है, उससे हमारे घर बनते हैं । धरती में से नीकलते कोयले में से बीजली बनती है, उसमें से नीकलती विभिन्न धातुओं में से सायकल, स्कूटर, कार, वगैरह बनते हैं । धरती को मा मानने से ईन्कार करनेवाले को ईन चीजों का ईस्तेमाल नहीं करना चाहिये ।
हिन्दु धर्म में माता को परमात्मा का स्वरुप माना जाता है । " मातृ देवो भव । " सिर्फ हिन्दु ही नहीं लेकिन मुस्लीम, शीख, ईसाई, कोई भी धर्म पालनेवाली माता परमेश्वर का ही स्वरुप है । उन की पूजा करनी ही चाहिये । अगर मां नहीं होती तो हमारा अस्तित्व ही नहीं होता ।
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