श्रीकृष्ण भगवान ने गीताजी के माध्यम द्वारा, मानव जीवन को श्रेष्ठ बनाने का राजमार्ग हमें दिखाया है । उपरोक्त प्रश्न का उत्तर बहुत ही सरल है । परमात्मा के दिखाए हुए राजमार्ग पर चलें, तो सदनसीब, न चलें तो कमनसीब । कहहेतेकहेते हैं कि अमृत और विष में एक गुन समान गुन है । ईसे अनजाने में पीयेंपीएं या सोच समझ कर पीयेंपीएं, दोनों परिस्थितिपरिस्थिति में असर होती है । अमृत अनजाने मे पीयेपीए तो भी मनुष्य अमर हो जाता है । वैसे गीताजी का पठन, दिमाग पर ज्यादा जोर डाले बिलाबिना, साधारण रुप से करें तो भी, हमारा जीवन उन्नत हो सकता है । विशेष रुप से करें तो, जीवन उन्नत होगा ही उस में कोई शक नहीं । विष अनजाने में पीयेंपीएं या आत्महत्या करने के लिये पीयेंलिए पीएं, दोनों परिस्थिति में उस की बुरी असर होती है । फिल्म, टी.वी. या अखबार की असर चाहें या न चाहें, हमारे दिमाग पर उसकी बुरी असर होती ही है । हत्या, बलात्कार जैसी भयानक घटनाएं, ईस का ही बुरा नतीजा है ।
हमारे विद्वान लेखक श्री दिनकरभाई जोषी ने " ટચલી આંગળીએ ગોવર્ધન नाम" नाम की उनकी पुस्तककिताब में (भाग-1) लिखा है कि विद्वान आदमी भी, हमारी वर्मानवर्तमान हालात के लियेलिए सदैव चिंता प्रगट करते हैं । -- आतंकवाद के नाम पर, कई निर्दोष लोगों की बेवजह हत्या होती रहेती है, बलात्कार स्वाभाविक हो गए हैं, यह भी निर्दोष कन्या की, जिन्दा होने पर भी, हत्या ही है, महेंगाई से जीवन अतिशय दुष्कर होता जा रहा है । -- ऐसी कई शिकायतें हम सुनते हैं । ऐसे समय में जीने से वे अपने को कमनसीब समझते हैं ।
सभी दूसरोंदूसरों के सुधार की प्रतीक्षा करते हैं । लेकिन खुद को सुधारने के बारे में, कोई नहीं सोचता । किसी ने बहुत सुंदर कहा है - " दूसरों की छोटी छोटी गलतीयांगलतियां हमें बडे फल जैसी दिखती है और अपनी बडी बडी गलतीयांगलतियां, बीलोरी काच से ( मेग्नीफाईंग ग्लास से ) भी दिखती नहीं ।" एक अंग्रेज विद्वान ने कहा - " दुनीया के तमाम भ्रष्टाचारी लोगों का परिवर्तन तुम नहीं कर सकते । यह तुम्हारे वशकी बात नहीं । लेकिन उन भ्रष्टाचारिओं में से कम से कम, एक को तुम दूर कर सकते हो । यह तुम्हारे सामर्थ्य की बात है । "
हमारे विद्वान हास्यकार श्री शहाबुद्दीनभाई राठौडराठौड ने उन के एक कार्यक्रम दरम्यान बहुत सुंदर बात कही कि - " ईतिहास में से मनुष्य को ईतना ही सीखनासीखना है कि ईतिहास में से मनुष्य कभी कुछ सीखासीखा नहीं । यह सिर्फ हंसाने की बात नहीं, लेकिन हमारे जीवन की सच्ची वास्तविकता है । मुघल सल्तनत या मराठाओंमराठाओं का पतन आपसी कुसंप की वजह से हुआ । भारत के राजाओं के आंतरिक कलह की वजह से ही, अंग्रेजोंने अंग्रेजों ने हमारे देश पर 200 साल तक शासन किया । ईतिहास में जिसका जीक्र है ऐसी घटनाओं से अगर हम कुछ सीखेसीखे होते तो, भिन्न भिन्न राजकीय पक्षों के नेता, एक दूसरे की टांग खींचने के बजाय, प्रजा कल्याण के लियेलिए कार्य करते होते ।
धर्म की सीधी सरल परिभाषा के अनुसार धर्म माने दूसरों की सहायता करना । ईतनी छोटी सी बात अगर सब समझें तो हिन्दु मुस्लीम के बीच तनाव नहीं होता । बाबरी मस्जीद तोडने की घटना न होती । तपास पंच के नाम पर करोडों रुपये खर्च करने के बावजुद कोई सुखद परिणाम नहीं मिला । ऐसे अहेवाल सिर्फ राजकीय हेतु के लियेलिए होते हैं, जनता के हित के लियेलिए नहीं । ऐसे तपास पंच से क्या फायदा ?
ई.स. 2002 में गोधरा शहर (गुजरात) में हिन्दु धर्म के 60 निर्दोष लोगों को जिन्दा जला दिये गयेदिए गए । उस की प्रतिक्रिया के रुप में विभिन्न शहरों में 1000 मुस्लीमों की हत्या की गई । अपना धर्म ही श्रेष्ठ है, ऐसा सिध्ध करने के लियेलिए क्या निर्दोष लोगों के बलिदान जरुरी है ? उन के परिवार के बारे में कोई सोचता है क्या ? उन की मानसिक यातना का क्या ? उन के जीवन निर्वाह का क्या ? क्या धर्म मानवी को पागल बना देता है ? ऐसा ही है तो ऐसे धर्म की क्या जरुरत ? भारत पाकिस्तान के विभाजन के वक्त, भयानक हिंसा हुई । कई हिन्दु या मुस्लीम महिलाओं पर बलात्कार हुआ । आखिर ये सब क्यों ? ऐसे पागलपनपागलपन का त्याग, हम नहीं कर सकते क्या ? हम ईन्सान कब बनेंगे ? ईतिहास में यह सब लिखा गया होगा । हमने कोई सबक नहीं सीखासीखा । हिंसा और अहिंसा का मतलब हम कब समझेंगे ?
गीताजी के 17 वें अध्याय में श्लोक नंबर 14 में श्रीकृष्ण भगवान ने अहिंसा को शारीरिक तप कहेकर, अहिंसा की महिमा की है । वह तो गीताजी पढें तब ही पता चलेगा । अगर हम अहिंसा का अर्थ समझें तो कितने निर्दोष मानविओं की हत्या रोक सकें ? गीताजी गहन है ऐसा सोचकर न पढें, फिर भी महात्मा गांधीजी के जीवन संदेश अनुसार, अहिंसा का पालन करें तो, धर्म के नाम पर जो खून बहाया जाता है, उसे रोक सकें । जिन्हें लोग, बुध्ध, ईसु और महावीर स्वामी के अवतार मानते थे, वे गांधीजी का जीवन तो पुराना नहीं है । 60 साल के पहले का ही ईतिहास है । उन के जीवन में से हम कुछ नहीं सीखेसीखे । सच्ची करुणता तो यह है कि हम कुछ सीखनासीखना चाहते ही नहीं है ।
कई महात्मा हमारे जीवन को उज्वल बनाने के लिए धार्मिक कथाएं करते हैं । ये कथाएं उत्तम होती है, मगर हम विशाल सामियाना, बाहरी ठाठमाठ वगैरह से आकर्षित हो कर जाते हैं । बहुत भीड होती है । लेकिन जीवन को उज्वल बनायेबनाए ऐसी कोई बात हम सीखते नहीं । कई पाखंडी धर्मगुरु, जनता के धार्मिक पागलपन का गेरलाभ उठाकर बहुत -
गीताजी संपूर्ण रुप से समझ में न आयेआए तो कोई हर्ज नहीं । मगर अंगत स्वार्थ का त्याग करना, क्रोध का त्याग करना, ईच्छाओं का त्याग करना, जैसी छोटी छोटी बातें समझें, तो भी जीवन उज्वल होगा । ईस के लियेईसके लिए कोई पाखंडी धर्मगुरु के पास जाने की जरुरत नहीं । ऐसे लोगों से दूर रहेना ही बहेतर है । खुद परमात्माने परमात्मा ने जीवन को उन्नत बनाने के लियेलिए बहुत ही उपकारक बातें कही है । लेकिन गीताजी का ज्ञान बहुत कठिन और गहन है, ऐसा सोचकर हम पठन ही नहीं करते । जीवन में शांति नहीं मिलती ऐसी शिकायत करते हैं, मगर अशांति को छो़नाछो़डना नहीं चाहते । बिना परिश्रम धन मिले, बिना परिश्रम शांति मिले, ऐसी बेवकूफ विचार धारा की वजह से ही, धूर्त लोग हमारे साथ छल करते हैं । धूर्त लोगों की जाल में फंसने के बाद शिकायत का कोई मतलब नहीं ।
एक दफा, एक राजा और गुरु गोरखनाथ के बीच, धन का मोह और भोग विलास त्याग के जनता का कल्याण करने की बात हुई । राजाने कहा - "आप की बात सच्ची है, लेकिन वह अति कठिन है । ईन के त्याग का, कोई सरल मार्ग हमें दिखायेंदिखाएं ।" गुरु गोरखनाथ महल के एक खंभेको जकड कर चिल्लाने लगे । "यह खंभे ने मुझे जकड लिया है, यह मुझे छोडता नहीं । कोई मुझे बचाओ ।" राजा ने हंस कर कहा - "गुरुजी ! खंभे ने आप को नहीं जकडा, आप ने खंभे को जकड लिया है । आप ईसे छोड दें, छूट जायेगाजाएगा ।" गुरु ने समझाया - "राजन् ! धन के मोह और भोगविलास को आपने जकड रख्खा है, आप जब चाहें तब उसे छोड सकते हैं । यह नामुमकिन नहीं है । जनता का कल्याण आप की जिम्मेदारी है । कर्तव्य पालन अच्छी तरह करोगे तो मन की शांति भी अवश्य मिलेगी । "
हमे अपने आप का परिवर्तन करना पडे । रास्ता कठिन होने से कभी गिरने की भी संभावना है । फिर उठेने उठने की कोशिष करें । गिरना और संभलना यही तो जीवन है । अगर उठने में दिक्कत हो तो प्रभु की सहायता मांगें । वे बहुत दयालु है । हमें उठाने के लियेलिए वे अपना हाथ जरुर पसारेंगे । सूरदासजी की प्रार्थना हमें भूलनी नहीं चाहिये ।
" नैनहीन को राह दीखा प्रभु ! पग पग ठोकर खाउं मैं, प्रभु !
तेरी नगरीया की कठिन डगरीया, चलत चलत गिर जाउं मैं,
एक बार प्रभु ! हाथ पकड लो, एक बार प्रभु ! हाथ पकड लो ... ..."
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