श्रीकृष्ण भगवान ने गीताजी के दूसरे अध्याय 'सांख्ययोग' में 66 वें श्लोक में एक अजीब विधान किया है । " अशान्तस्य कुत: सुखम् ? "
एक सज्जन ने कहा - ईस अद्भूत विधान के बारे में हम कुछ अधिक सोचें तो ? गीताजी के बारे में हम जितना भी सोचें, वह कम माना जाएगा । गीताजी को ज्ञानसागर कह सकते हैं । उनमें एक एक से बढकर कई रत्न हैं । कहेते हैं कि मरजीवा महासागर में बार बार गोता लगाकर बहुमूल्य मोती निकाल कर ले आते हैं । हम भी गीताजी बार बार पढें तो हमें भी बहुमूल्य मोती मिले ।
गीताजी में परमात्मा ने अविनाशी आत्मा और नाशवंत शरीर के बारे में हमे समझाया । मृत्यु का शोक करना उचित नहीं है, यह भी समझाया । ईच्छाएं ही सुख दु:ख की वजह होने से उसका त्याग करने को समझाया । क्रोध से बुध्धि नाश होता है, ईस लिए उसका त्याग करने को समझाया । कर्मयोग, ज्ञानयोग और भक्तियोग का अर्थ हमें समझाया । सात्विक दान और उत्तम जीवन के बारे में समझाया । अंतिम अध्याय में सब कुछ छोड कर परमात्मा की शरण में जाने को कहा । ये सभी जीवन उपयोगी उपदेश के बाद भी, आंखें मुंदकर, उनका अनुसरण करने को नहीं कहा, लेकिन शात चित्त से, संपूर्ण रुप से सोच विचार कर के, ठीक लगे तो, अनुसरण करने को कहा ।
गीताजी का गहन ज्ञान शायद हम समझ न पाएं, फिर भी, हमारे ईतिहास में जिनका जीक्र किया गया है ऐसी घटनाओं के आधार पर और अखबारों में छपते समाचार के आधार पर कुछ सोच सकते हैं ।
ईतिहास में महान सम्राट सिकंदर का नाम हमने पढा है । लखलूट धन ईकठ्ठा करने की लालसा से उसने भारत पर आक्रमण किया । कई राजाओं को पराजित कर के, कई निर्दोष लोगों की हत्या कर के, उसने बहुत ही धन ईकठ्ठा किया । भारत के किसी महान संत के बारे में उसने सुना । सामान्य साधु से वह कितना श्रीमंत है ? बडे बडे महाराजा भी उसके पांव छूते हैं ऐसा प्रदर्शन करने की ईच्छा से उसने महात्मा को महल में आने को आमंत्रित किया । साधु तो विरक्त महात्मा थे । वे कुछ नहीं चाहते थे । उन्होंने निमंत्रण का अस्वीकार किया । सिकंदर को बुरा लगा । सिकंदर उन्हें मिलने गया और वह एक महान सम्राट है, यह बात दुभाषिया के द्वारा समझाई । साधु को जो चाहिये वह देने की बात भी कही ।
" જે બાહુબળથી મેળવ્યું, તે ભોગવી પણ ના શક્યો,
અબજોની મિલ્કત આપતાં પણ, એ સિકંદર ના બચ્યો..."
ऐसी ही एक और घटना का ईतिहास में जीक्र है । दिल्ही में मुघल सल्तनत के अंतिम शहेनशाह बहादुरशाह झफर का राज्य था । अंग्रेज शासन के खिलाफ ई.स. 1857 में जो बगावत हुई, उसमें, बहादुरशाह बगावत करनेवालों को सहायता करते हैं, ऐसी माहिती मिलने पर अंग्रेजों ने उन्हें कैद करके रंगुन (बर्मा) भेज दिए । अपने को भारत वापस भेजने के लिए, उन्होंने बार बार बिनती की लेकिन किसीने न सुनी । मृत्यु की संभावना पर, उनके देह की दफन विधि, भारत के किसी कब्रस्तान में करने की बिनती की, वह भी ठुकराई गई । उन्होंने बेहद निराश हो कर लिखा -
"कितना है बदनशीब झफर !, दफन के लिए,
दो गज जमीं भी न मिली कोई दयार में ... "
एक शहेनशाह की सामान्य अतिम ईच्छा भी पूरी न हो सकी ।
अभी अभी एक महाठग के बारे में अखबार में रोज समाचार छपते हैं । निर्दोष मानविओं को समझा बुझा कर एक के तीन गुना रुपया कर देने की लालच दे कर, वह नराधम ने, 1800/- करोड रुपये का गबन किया । पुत्री के विवाह के लिए या मातापिता की सारवार के लिए ईकठ्ठी की हुई पुंजी, वह महाठग की जाल में फंस कर, लोगोंने उसे दे दी । शायद शहेनशाह बहादुरशाह झफर की भांति, उसे भी दहन या दफन के लिए, दो गज जमीन नहीं मिलेगी, ऐसे डर से, उसने कई एकर जमीन अपने नाम कर ली । करोडों रुपये का सुवर्ण अलंकार उसके पास है । किसी वजह से उसकी पोल खुल गई । आज वह जेल के सलाखे गिन रहा है, और कारागार से छूटने के लिए बेकरार है ।
सभी सुख के लिए छटपटाते हैं । लेकिन वह हाथताली देकर भाग जाता है । ईकठ्ठा किया हुआ धन सुख नहीं दे सकता । यह समझने पर भी धन के प्रति अंधी दौड चालु ही
धन या विषयों की कामना रखनेवाले को शांति नहीं मिलती । शांति पाने के लिए परमात्मा ने अध्याय नंबर 6 में ध्यान पर बहुत जोर दिया है । यह भूलना नहीं । ध्यान द्वारा परम शांति प्राप्त करने की बात हमने लेख नंबर 14 में की है । यह शांति महसूस करना जरुरी है । मन में से उठते हुए तरंगों को धीरे धीरे दूर कर के, संपूर्ण रुप से प्रभुमय हो जाना, यह परम शांति दायक है । ईस में शायद कई वर्ष लग जांए, कई जन्म भी बीत जाए, फिर भी ईस मार्ग पर चलना चाहिये । अशांत मानवी को कभी सुख नहीं मिलता और परम शांति का अनुभव करनेवाले को कभी दु:ख नहीं होता ।
यह उच्च स्थिति को, परमात्मा ने ब्राह्मी स्थिति कही है । यह पाने के बाद, मानवी निर्मोही हो जाता है । ब्रह्म को पाने के बाद, जीवन में कुछ भी पाने को शेष नहीं रहेता ।
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