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38. दिपावली

श्रीकृष्ण भगवान के समय में, दिपावली का त्यौहार हमारे समय के मुताबिक मनाया जाता था, या नहीं, उसका कहीं जीक्र हो तो मालूम नहीं । गीताजी मे भी ईसके बारेमें कहीं जीक्र हो तो पता नहीं । शरदपूर्णिमा की धवल रजत चांदनी के अद्भूत और पवित्र वातावरण में, श्रीकृष्ण भगवान, कई रुप धारण करके, बांसुरी के सुमधुर सूर के गुंजन के साथ, हर गोप गोपी के साथ, आत्मीयता से महारास खेले थे, यह अप्रतिम भक्तिमय प्रसंग का जीक्र श्रीमद् भागवत में है । गोप गोपियां और श्रीकृष्ण का यह रास कोई सामान्य मानवी के मिलन जैसा न था । लेकिन वह तो आत्मा और परमात्मा के, अपूर्व, अवर्णनीय और अलौकिक मिलन का प्रसंग था । संभवित है कि गोकुल में रहेनेवाले गोप गोपिओं ने, आत्मा और परमात्मा के अलौकिक मिलन समान शरदोत्सव की पवित्र स्मृति में जो त्यौहार मनाया हो, वही दिपावली हो । क्योंकि यह प्रसंग ही अवर्णनीय आनंद का था । ईसमें विषाद हो ही नहीं सकता । जीवन की साधारण खुशी से हम कई बार बहुत आनंद महसूस करते हैं, तो जिन्हें परम आनंद स्वरुप श्रीकृष्ण भगवान साक्षात् मिले हो, उनके आनंद की सीमा कहां से होगी ?

 

ईसी तरह कहेते हैं कि भगवान श्रीराम ने रावण का वध किया, उस खुशी में जो उत्सव मनाया गया था, उस त्यौहार को हम आज भी दशहरा के नाम से मनाते हैं । यह त्यौहार, दैवी शक्ति का आसुरी शक्ति पर विजय के रुप में मनाया जाता है । तत्पश्चात्, चौदह वर्ष का बनवास पूर्ण करके भगवान श्रीराम अयोध्या वापस लौटे, उसकी खुशी में अयोध्या के लोगों ने जो उत्सव मनाया वह दिपावली । भगवान श्रीराम अत्यंत लोकप्रिय  थे । वे ज्येष्ठ और श्रेष्ठ होने पर भी, उन्हें राज्याभिषेक के बजाय चौदह वर्ष का बनवास मिला । प्रजा अत्यंत निराश हो गई । लेकिन श्रीराम ने परिस्थिति का बदलाव, किसी प्रकार की कटुता के बिना सहज रुप से स्वीकार लिया । चौदह साल के बनवास बाद, लोकलाडीला श्रीराम अयोध्या लौटने से, लोगों ने अत्यंत आनंदपूर्वक जो उत्सव मनाया वह दिपावली । आसोपालव के पत्ते के तोरण झुलाये गए । मीठाई बांटी गई । घर घर दीपमाला प्रगटाई  गई । लोगों ने अपना आनंद व्यक्त किया ।

गीताजी के 10 वें अध्याय ' विभूतियोग ' में श्रीकृष्ण भगवान ने कहा है - " शस्त्रधारीओंमें श्रीराम मैं हूं । " सुख दु:ख को समान समझने की बात श्रीकृष्ण भगवान ने गीताजी में की है । वही बात का उन्होंने श्रीराम के रुप में आचरण किया । यह सिर्फ उपदेश नहीं है । ईस तरह श्रीकृष्ण और श्रीराम एक ही है, यह बात हम समझ सकें तो दिपावली का उत्सव परमात्मा के दोनों अवतार दरम्यान मनाया गया, ऐसा कह सकते हैं । यह आनंद और उत्साह का पर्व है । दिपावली में विषाद का कोई स्थान नहीं ।

शरदपूर्णिमा के दूसरे दिन श्रीकृष्ण भगवान मथुरा गए । वहां कंस वध करने के बाद मथुरा का राज्य हडप करने के बजाय कंस के पिता उग्रसेन को सौंप दिया । धर्म संस्थापक ने अप्रतिम त्याग का आचरण कर के उत्तम उदाहरण प्रस्थापित किया । मथुरा जाने के बाद श्रीकृष्ण भगवान ने उध्धवजी को गोकुल भेज के, व्रजवासीओं को श्रीकृष्ण विरह में संतप्त और शोकमग्न न होने के लिए समझाने को कहा ।

व्रज में यशोदामैया, नंदबाबा, राधा और अन्य गोप गोपीओं की स्थिति अवर्णनीय थी । किसीकी आंख में आंसु न थे । कोई निराश न था । कहीं विषाद न था । विरह से व्याकुल होने के बजाय अकल्पनीय पागलपन हर व्यक्ति के वर्तन में से प्रगट होता था । कुछ समझ में न आए ऐसा पागलपन लगता था । श्रीकृष्ण न थे, फिर भी गोप बालक श्रीकृष्ण हमारे साथ खेलने नहीं आते हैं, ऐसी फरियाद करते थे । गोपीयां, "कानुडो हमारे घर में गुपचुप आकर माखन खा गयो," ऐसी शिकायत करती थीं । मा यशोदा श्रीकृष्ण के बारे में शिकायतें सुनकर, उसे बंधन से बांध देने के लिए, रस्सी खोज रही थी । श्रीकृष्ण गायें चराने के लिए जाए तब, स्नान करने के लिए यमुना में कूद न पडे, ऐसी चिंता नंदबाबा करते थे । राधा ऐसी शिकायत करती थी कि श्रीकृष्ण बांसुरी क्यों नहीं बजाते ? श्रीकृष्ण जब तक बांसुरी नहीं बजाएंगे, तब तक मैं उनसे बात ही नहीं करुंगी । बांसुरी के सूर के बिना मैं बेचैन हो जाती हूं, ऐसा कह कर राधा रुठी हुई थी ।

किसीने अजीब कहा – " उधो, आयो उधो, लेतिन गयो सीधो। " उध्धवजी आए थे, आश्वासन देने के लिए, लेकिन यहां तो किसीको आश्वासन की जरुरत ही नहीं थी । श्रीकृष्ण को भूलकर मन को अन्य कार्यों मे लीन करने की बात करने आए थे, लेकिन यहां तो सभी श्रीकृष्णमय ही थे । श्रीकृष्ण तो सर्वव्यापी है, उनके विरह में संतप्त होना उचित नहीं, ऐसा समझाने आए थे, लेकिन यहां तो श्रीकृष्ण गोकुल में ही है, ऐसा लगता था । उध्धवजी को ज्ञान से, हृदय की शुध्ध भक्ति ही श्रेष्ठ है, ऐसा अनुभव हुआ ।

हमारे विद्वान लेखक श्री हरीन्द्रभाई दवे ने अपनी पुस्तक " માધવ ક્યાંય નથી " में  एक बहुत सुंदर बात लिखी है । ( पेज नं. 103) श्रीकृष्ण ने कंसवध किया ईसी लिए, मथुरावासीओं को अपने उध्धारक के रुप में श्रीकृष्ण के प्रति बहुत आदर हुआ । " मथुरा में सभी श्रीकृष्ण का पूजन करते थे । कई महालयों पर श्रीकृष्ण की छबी अंकित कर दी   गई ।  लेकिन किसीके हृदय में श्रीकृष्ण की मूर्ति न थी । जब गोकुल में कोई भी घर में, श्रीकृष्ण की मूर्ति का पूजन नहीं होता था, कहीं श्रीकृष्ण की छबी नहीं थी, लेकिन कोई भी व्यक्ति ऐसी न थी जिसके हृदय में श्रीकृष्ण की छबी न हो । "

श्रीकृष्ण की मूर्ति जिनके हृदय में सदैव बसती हो, उनके आनंद की सीमा ही नहीं होगी । वहां सदैव दिपावली उत्सव ही होगा । सच्चे संत सदैव परम आनंद में ही रहेते हैं । सुख, दु:ख, लोभ, मोह, काम, क्रोध ये कोई उन्हें परेशान नहीं करते । अगर हमें सदैव आनंद में रहेना हो तो श्रीकृष्ण की शरण में रहेना चाहिये ।

दिपावली की रात को लक्ष्मीपूजन का विशेष महिमा है । दिपावली के दिन सिर्फ लक्ष्मीजी की ही आराधना करें और लक्ष्मीजी के पति, परमात्मा की आराधना न करें तो लक्ष्मीजी प्रसन्न नहीं होंगी, क्योंकि दिपावली प्रकाश का पर्व भी है । प्रकाश परमात्मा का ही निराकार स्वरुप है । हम सभी दीप जला के अमावस का अंधेरा दूर करने की कोशिष करते हैं, यह प्रकाश की माने परमात्मा की आराधना ही है । श्रीकृष्ण भगवान ने गीताजी के अध्याय नंबर 15 ' पुरुषोत्तम योग ' में श्लोक नंबर 12 में कहा है –

" यदादित्य गतं तेजो जगद् भासयतेखिलम्,

यच्चन्द्रमसि यच्चाग्नौ, तत्तेजो विध्धि मामकम् ...."

" सूर्य में रहा हुआ जो तेज संपूर्ण जगत को प्रकाशित करता है और जो तेज चन्द्र में और अग्नि में है, उसे तू मेरा ही तेज समझ । "

ईस तरह विश्व में जो कोई तेज है, वह परमात्मा का ही है । परमात्मा तेजपुंज है । छोटे से दिया का तेज भी परमात्मा का ही तेज है । छोटा सा दीप प्रगटाने से अंधेरा दूर हो जाता है, यह तो हम सब जानते हैं । अज्ञान का, धन लोभ का, विकारों का अंधेरा दूर करना हो तो परमात्मा की उपासना जरुरी है । जीवन में हम जिसे सर्वस्व समझते हैं, वह धन से विमुख होने की कोई बात नहीं है । धन का त्याग कर के दरीद्र हो जाने की बात नहीं है । लेकिन धन को अति महत्व नहीं देना चाहिये ।

हिन्दु शास्त्र के अनुसार लक्ष्मीजी तो भगवान विष्णु की पत्नी है । पति पत्नी के बीच कोई मनमुटाव नहीं है, लेकिन बहुत प्रेम है । ईसी लिए परमात्मा की उपासना करते करते, प्रकाश फैलाने से, लक्ष्मीजी रुठकर चली जाएगी ऐसा डर ऱखने की कोई जरुरत नहीं है । परमात्मा का पूजन माने लक्ष्मीजी का विरोध, ऐसा नहीं है । ईसी लिए तो दिपावली में धनतेरस और लक्ष्मीपूजन का विशेष महिमा है । भगवान श्री विष्णु ( माने श्रीराम – श्रीकृष्ण ) और उनकी पत्नी श्री लक्ष्मीजी में परस्पर बहुत प्रेम और आदर है । ईसी वजह से दिपावली,  दोनों का पूजन बहुत प्रेम से करने का, शुभ अवसर है । दोनों हम पर बहुत प्रसन्न रहेंगे ईसमें कोई शक नहीं ।

लक्ष्मीजी को छोडकर, सिर्फ परमात्मा का पूजन करें तो जीवन व्यवहार निभाना कठिन हो जाए और परमात्मा को छोडकर सिर्फ लक्ष्मीपूजन करें तो जीवन अंधकारमय हो जाए । यह भी कोई अच्छी बात नहीं । दिपावली के शुभ दिन परमात्मा और लक्ष्मीजी का पूजन, अर्चन शुभ भावना से करेंगे तो हमारा जीवन उत्तम और उन्नत होगा ही ।

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Kinjal   |2011-10-25 00:57:38
You should make it short and easy to understand. i hope you will focus on my opinion

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