अध्याय नंबर 4 श्लोक नंबर 38 में कहा है कि -
" न हि ज्ञानेन सदृशम् पवित्रम् ईह विद्यते ...."
"ईस जगत में ज्ञान जैसा पवित्र कुछ भी नहीं है ।" अध्याय दूसरा, श्लोक नंबर 50 में कहा है - " योग: कर्मसु कौशलम् । " कौशल्यपूर्ण कर्म करना यही योग है ।
ये दो छोटी सी बातें बहुत ही सरल है । ईसमें कुछ कठिन या समझ में न आए ऐसा कुछ नहीं है । अगर ये समझ में आ जाए तो गीताजी का महत्व समझाना नहीं पडेगा । ज्ञान पाने के लिए ही हम स्कूल या कोलेज जाते हैं और जो विषय में रुचि हो उसका अभ्यास कौशल्यपूर्ण करना चाहिये । जीवन मे जिसे सफलता पानी है ऐसे विद्यार्थी के लिए ईससे बढकर क्या बात हो सकती है ?
विद्यार्थी के लिए सब से अधिक महत्वपूर्ण बात है अथाक परिश्रम करना । प्रारंभ से ही सतत कोशिष करनेवाले को कठिन विषय भी सरल लगते हैं । धीरे धीरे वे और सरल हो जाते हैं । तुम्हारी प्रगति का आधार तुम्हारे परिश्रम पर ही है । जिसे अपने अभ्यास में रुचि न हो वह कभी प्रगति नहीं कर सकता । सतत प्रयत्नशील रहेने की आदत, हाल के अभ्यास में तो उपयोगी है ही, लेकिन भावि जीवन में भी श्रेष्ठ सिध्धि हासिल करने में उपयोगी है ।
विद्यार्थी के लिए दूसरा महत्वपूर्ण गुन है एकाग्रता । जो कठिन परिश्रम में से ही जन्म लेता है । जो कोई अभ्यास करते हो उसमें संपूर्ण लीन हो जाना, वही सर्वोत्तम बात है । एकाग्रता की आदत हमें सदैव उपयोगी होती है ।
विद्यार्थी के लिए तीसरी महत्वपूर्ण बात है विनम्रता । जो अच्छे संस्कार से जन्म लेती है । ईसका महत्व तो आचार्य रजनीशजी ने बहुत अच्छी और सरल भाषा में समझाया है । दो पनिहारी अपने अपने कुंभ लेकर नदी के तट पर जाती है । एक पनिहारी सोचती है - " मैं क्युं झुकुं ? " वह अक्कड रहेती है, झुकती नहीं । नदी में बहेते हुए पानी के पास खडी होने पर भी उसका कुंभ खाली रहेता है । दूसरी पनिहारी झुककर, बहेते हुए पानी में से अपना कुंभ पूर्णरुप से भर लेती है । विनम्रता बहुत ही श्रेष्ठ है ।
किसी विद्यार्थी को अपने अभ्यास में कुछ कठिन लगे या समझमें न आए तो पहेले अपने मित्रों के साथ चर्चा करनी चाहिये । जो बात तुम्हारी समझ में न आती हो, शायद वही बात तुम्हारे दोस्त के लिए आसान हो सकती है । दोस्तों के साथ निखालस चर्चा बहुत ही उपयोगी होती है । अकेले अकेले पुस्तक पढने से, मित्रों से चर्चा बहेतर है, कभी कठिन बात भी एकदम सरल हो जाती है । जरुरत हो तो अपने शिक्षक का भी मार्गदर्शन लेना चाहिये । ईससे आत्मविश्वास बढेगा और निर्भयता भी बढेगी । झुठी शर्म नहीं रहेगी । तुम्हें तुम्हारी बात ठीक तरह से कहेना आ जाएगा । भविष्य में यह गुन विशेष रुप से उपयोगी होगा । तुम निर्भयता से किसीसे भी नि:संकोच बात कर सकोगे ।
विद्यार्थी के लिए सर्वश्रेष्ठ गुन है आत्मश्रध्धा । अथाक प्रयत्न, एकाग्रता और विनम्रता में से जन्म लेती हुई आत्मश्रध्धा अहंकार नहीं है, लेकिन दिव्य शक्ति है । तुम्हारी शक्तिओं को कभी कम मत समझना । तुम्हारी शक्ति में तुम्हें विश्वास हो उसे ही आत्मश्रध्धा कहेते हैं । कोई भी कठिन कार्य करने के लिए तुम सक्षम हो । तुम्हारे लिए कुछ असंभव नहीं है । मुश्किल लगनेवाला कार्य, तुम आत्मश्रध्धा से आरंभ करोगे, तो मुश्किलें अपने आप आसान होती जाएगी । तुम्हें अपनी सफलता से आनंद मिलेगा, तुम्हारा उत्साह बढेगा और तुम्हारी शक्तिओं में तुम्हारा विश्वास बढता जाएगा । तुम्हारा द्रढ आत्मविश्वास, तुम्हें कल्पनातीत सफलता दिलाएगा । अगर कभी कोई विषय के बारे में, प्रारंभ में कुछ समझमें न आए तो हताश होने की जरुरत नहीं । निष्फलता से घबराकर कोशिष, नहीं छोड देनी चाहिये । कई बार, बार बार निष्फलता मिलने के बाद, अचानक सफलता मिल जाती है । तुम्हारा अप्रतिम आत्मविश्वास, तुम्हें सफलता के उच्चतम शिखर पर पहूंचाएगा ।
जो विद्यार्थी आलसी हो और आरंभ से ही परिश्रम न करे, उसे ही ईम्तिहान के वक्त चोरी करने की व्यर्थ कोशिष करनी पडती है । अगर कोई चोरी करने न दे तो, छूरी दिखानी पडती है । यह तो अपना अभ्यास के प्रति बेपरवाहपन और निष्फलता का स्पष्ट ईकरार है । कई दफा, खुद बुझर्ग अपनी संतान को ज्यादा गुन मिले, ईस हेतु से लागवग या रिश्वत का आधार लेते हैं । ऐसी अयोग्य राह से, ईम्तिहान में उत्तीर्ण हो सके, डीग्री भी मिले लेकिन ज्ञान न मिले । ऐसे युवा समाज के लिए बोज रुप है । चोरी के दूषण को प्रोत्साहन नहीं देना चाहिये । उसे कठोर दंड देना ही चाहिये । जिन्हें अभ्यास में रस न हो उन्हें मजबुरन पढाना नहीं चाहिये । समझाने पर भी न समझें, उन्हे जीवन में ठोकर खानी पडे तो कोई हर्ज नहीं । यह दूषण से परिश्रम करनेवाले विद्यार्थिओं को बहुत अन्याय होता है । अगर समाज को उपर उठाना है तो, ईम्तिहान में होती हुई चोरी को रोकने के लिए सरकार को सख्त कदम उठाने ही चाहिये । हर महत्व की बात में, उदासीनता अच्छी नहीं, वह समाज को पतन की ओर ले जाएगी ।
हर आदमी के जीवन में धूप छांव आती ही है । सुख, दु:ख, उन्नति, अवनति, सफलता, निष्फलता, लाभ, हानि, यश, अपयश, मान, अपमान ये सभी द्वंद जीवन के भाग रुप है । आसान परिस्थिति मे तो हर कोई आराम से जी सके, ईसमें कुछ नया नहीं है । लेकिन विषम परिस्थिति में भी आनंद से जी सके, मुश्किलों में भी हंसते हंसते जी सके, उसे ही सार्थक जीवन माना जा सकता है । गीताजी में उपरोक्त सभी द्वंदों में समान भाव रखने की बात है । क्रोध से होते हुए नुकशान की बात है । मन में से उठनेवाली ईच्छाओं का त्याग करने की बात है, -- ईस तरह, गीताजी जीवन को उज्वल और उन्नत कैसे बनाया जा सकता है, यह समझानेवाली पुस्तक है । ईसका अनुसरण करनेवाले को श्रीकृष्ण भगवान ने स्थितप्रज्ञ कहा है । यदि आर्थिक कठिनाई हो तो सादगी से जीना, कम खर्च करना, लेकिन किसीसे कुछ भी अपेक्षा न रख के, निष्काम कर्मयोगी बन के, परमात्मा की शरण में संपूर्ण आत्मसमर्पण करना, यही गीता संदेश है । अगर ईतना, ठीक तरह से समझ में आ जाय तो विद्यार्थी को गीताजी पढने की या कंठस्थ करने की आवश्यकता नहीं है । हर रोज मंदिर जाने की भी जरुरत नहीं है ।
| Comments |
|

