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36 निष्काम गुरु

श्रीकृष्ण भगवान को जगतगुरु कहेते हैं । श्रीमद् भगवद् गीता द्वारा सारे जगत को निष्काम कर्मयोगी और ज्ञानवान बनने का और अन्याय, अत्याचार और अधर्म के सामने झुझते रहेने का अनन्य बोध देनेवाले, ये विरल व्यक्तित्व के लिए जगतगुरु शब्द संपूर्ण रुप से यथार्थ है । अधर्म को साथ देनेवाले व्यक्ति हमारे पूज्य महानुभाव हो, अन्य संबंधी हो या कोई भी हो, फिर भी लागणीशील हुए बिना, या उसकी शेहशर्म की परवाह किए बिना, अपना कर्तव्य पालन करना ही चाहिये, ऐसा स्पष्ट मंतव्य व्यक्त करनेवाला परम तत्व विश्ववंद्य ही होगा । अपने कर्तव्य पालन में विनम्रता होनी चाहिये, साथसाथ मक्कमता भी उतनी ही होनी चाहिये । अपने कर्तव्य पालन से शायद गेरलाभ हो, अपयश मिले, या किसीको बुरा लगेगा, ऐसा नहीं सोचना चाहिये । संपूर्ण निष्काम भावना से कर्तव्य पालन करना चाहिये । ऐसा अद्भूत उपदेश देनेवाले श्रीकृष्ण भगवान सच्चे अर्थ में जगतगुरु है ।

समाज में विद्यार्थीओं को ज्ञान देनेवाले सज्जन को हम गुरु मानते हैं । शिक्षक, आचार्यश्री, प्राध्यापकश्री, प्रीन्सीपालश्री ये सभी गुरु हैं । गुरु का अर्थ ही महान । गुरु कोई साधारण आदमी हो ही नहीं सकता । कई साल पहेले एक सज्जन ने गुरु के तीन प्रकार बताये थे –

(1) तुंबडा जैसा गुरु –   तुंबडा खुद तैरता है और आधार लेनेवाले को तारता है ।

(2) पत्ते जैसा गुरु   –   पत्ता खुद तैरता है, लेकिन आधार लेनेवाले को डूबोता है ।

(3) पथ्थर जैसा गुरु –   पथ्थर खुद डूबता है और आधार लेनेवाले को डूबोता है ।

तुंबडे जैसे गुरु को हम सदगुरु कहेते हैं । परमहंस स्वामी श्री रामकृष्णदेवजी ने अपने प्रिय शिष्य नरेन्द्रनाथ को आत्मसाक्षात्कार कराया था, तभी तो अमेरिका में शिकागो में सर्वधर्म परिषद में स्वामी श्री विवेकानंदजी ने गौरव से कहा था – " मैंने परमात्मा के दर्शन किए हैं । "

हर गुरु अपने शिष्यों को परमात्मा के दर्शन न करा शकें, क्योंकि शिष्य की योग्यता और उसकी परमात्मा के दर्शन की तीव्र झंखना बहुत जरुरी है । फिर भी अपने शिष्यों का जीवन उज्वल, संस्कारी और गोरवशील बनाने की सतत कोशिष करते रहें । अपने विद्यार्थीओं का योग्य मार्गदर्शन करके, उन्हें अथाक परिश्रम करने की प्रेरणा दें, एकाग्रता के बारे में समझायें, विनम्र बनाने की कोशिष करें और आत्मश्रध्धा से सभर बनाए, ऐसे गुरु को सदगुरु कहेना ही चाहिये ।

पत्ते जैसे गुरु खुद विद्वान हो, लेकिन निष्क्रिय हो और विद्यार्थी को विद्या प्राप्त करनी हो तो करे वरना मुझे क्या ? ऐसे निराशावादी हो तो, ऐसे गुरु शिष्यों का जीवन उज्वल नहीं बना पाएंगे । सिर्फ अपने उत्कर्ष का कोई महत्व नहीं । अपने शिष्यों का जीवन उन्नत बनाने की कोशिष तो करनी ही चाहिये । सफलता या निष्फलता गौण है । अपना कर्तव्य ही न करे उसे कर्मयोगी तो कैसे कह सकते हैं ? वे विद्वान हो तो भी सामान्य मानवी ही है ।

पथ्थर जैसे गुरु जो खुद डूबे और आधार लेनेवाले को भी डूबो दे, उसे तो गुरु ही नहीं कह सकते । सामान्य मानवी भी नहीं कह सकते । वे तो पामर मानवी ही है । ऐसी व्यक्ति समाज के लिए बोज रुप है ।

समाज में दूसरों की परवाह न करके, खुद सुखी होने का अजीब पागलपन है । ईसी लिए भ्रष्टाचार, अनीति, अन्याय, दहेज, बलात्कार, रिश्वत, लागवग, कामचोरी, चोरी, लूट, हत्या, दरीद्रों का शोषण और निरक्षर मानविओं की निरक्षरता का गेरलाभ उठाना, ऐसे कई दूषण हमारे जीवन में हैं । जैसे चेपी रोगों से शरीर में से बदबू नीकलती है, उसी प्रकार समाज में से भी बदबू फैलती है । ये सभी दूषणों की निंदा करने से कोई भी दूषण कम नहीं होगा । अगर समाज मे से बदबू दूर करनी है तो विद्यार्थीओं को बचपनसे ही संस्कारी बनाने चाहिये । सिर्फ अभ्यासक्रम में लिखा गया मर्यादित और तोता जैसा ज्ञान देने से कुछ नहीं होगा । अगर विद्यार्थी संस्कारी और सुशिक्षित होंगे तभी उनका जीवन उज्वल होगा और समाज मे से दूषण कम होने से दुर्गंध कम होगी । यह महत्व की जिम्मेदारी गुरु की है । 

सौराष्ट्र की धरती के सपूत स्वामी श्री दयानंद सरस्वतीजी ने सन्यास लेने के बाद स्वामी श्री वीरजानंदजी से ज्ञान संपादन किया । गुरुजी अत्यंत क्रोधी भी थे और अजीब प्रेमवाले भी थे । गुरु श्री वीरजानंदजी प्रज्ञाचक्षु माने अंध थे । आंखों की रोशनी न होने से उनके चारों ओर घना अंधेरा था । लेकिन अपने प्रिय शिष्य स्वामी श्री दयानंद सरस्वतीजी को उत्तम ज्ञान देकर उन्हे परम तेजस्वी बना दिए । विदा होते वक्त, गुरु के चरण स्पर्श कर के दयानंदजी ने अत्यंत विनम्र भाव से कहा –

     "गुरुजी मैं तो सन्यासी हूं, मेरे पास कुछ नहीं है । मैं आप को गुरुदक्षिणा क्या दूं ?"

     एक सदगुरु ही कह सके ऐसे प्रेमभरे शब्दों में गुरु श्री वीरजानंदजी महाराज ने कहा –

"बेटा ! मुझे कुछ नहीं चाहिये । मैंने तुझे जो ज्ञान दिया है उसका प्रकाश समाज में   फैलाना । अंधश्रध्धा और वहेम से पीडीत जनता को सच्ची राह दिखाना ।"

     ईसीका नाम निष्काम कर्मयोग, जिसका गीताजी में बार बार जीक्र किया है ।

पूज्य श्री वीरजानंदजी महाराज तो निर्धन थे । आंखों की रोशनी भी न थी । फिर भी, अपनी मुश्किलों के बारे में न सोचते हुए, समाज कल्याण के लिए सविशेष चिंतीत थे ।

लेकिन जिन शिक्षकों को धन के सिवा कुछ दिखता ही न हो ऐसे, आंखें होने पर भी अंध जैसे धनलोभी शिक्षकों, अपने विद्यार्थीओं को, भ्रष्टाचार, रिश्वत और दहेज जैसे दूषणों से झुझने का कहां से सीखा सकते ? ईम्तहान के दरम्यान जो चोरी होती है उसे रोकने की जिनकी जिम्मेदारी है, वे खुद चोरी करने में मदद करते हैं, ऐसे अखबारी अहेवाल हम पढते हैं । ऐसे लेभागु शिक्षकों समाज मे से चोरी, कामचोरी जैसे दूषण कम करने में कैसे योगदान दे सकते हैं ? पाटण शहर में, छ शिक्षकों ने एक साथ मिलकर, अपनी विद्यार्थीनी पर बार बार बलात्कार किया, ऐसे अत्यंत हीन और घृणाजनक समाचार, हम सभी ने अखबार में पढा है । ऐसे अधम और असंस्कारी शिक्षकों, विद्यार्थीओं को कैसे संस्कारी बनाएंगे ? ऐसे नराधमों को अदालत ने जन्मटीप की सजा दी, लेकिन यह बहुत कम है । बलात्कार को निर्दोष कन्या की हत्या ही माननी चाहिये और गुनहगार को फांसी की सजा होनी चाहिये ।                     

कई कोलेजों में, रेगींग जैसी जंगली प्रथा द्वारा सीनीयर विद्यार्थिओं, जुनीयर विद्यार्थिओं को बेहद परेशान करते हैं । कोई जुनीयर विद्यार्थी विद्याभ्यास छोड देता है, कोई आत्महत्या कर लेता है । हमारी सुप्रीम कोर्ट ने भी, ईसके खिलाफ अत्यंत कडक रुख अपनाया है । यह मानसिक त्रास को कोलेज के प्रीन्सीपाल और प्राध्यापक गण क्यों नहीं रोक पाते ? क्या उन्हें निर्दोष मजाक और मानसिक त्रास के बीच का फर्क मालूम नहीं ? जो ऐसी बेशर्म और असंस्कारी घटनाओं को रोक न सकें, वैसे लाचार और डरपोक प्रीन्सीपाल विद्यार्थीओं को अन्याय के खिलाफ लडने का साहस कहां से सीखाएंगे ?

श्रीकृष्ण भगवान वज्र से भी कठोर थे और फुल से भी सुकोमल थे । श्रीकृष्ण भगवान आततायिओं, अधर्मिओं और नराधमों की हत्या के खिलाफ न थे । ऐसी हत्या करने से वे कभी हिचकिचाये नहीं थे । कंस, शिशुपाल, भौमासुर का वध उन्हों ने ही किया था । उनके जीवन दर्शन से यह स्पष्ट होता है कि निर्धन सुदामा का प्रेम भरा स्वागत करनेवाले भी वे ही थे ।

आचार्य या प्रीन्सीपाल शिस्त पालन के लिए अत्यंत कठोर होने चाहिये । उनको जरुरी सत्ता भी देनी चाहिये । ईतना ही नहीं लेकिन हर विद्यार्थी के प्रति उन्हें बहुत प्रेम होना चाहिये । ऐसे गुरु, कठोर होने पर भी, विद्यार्थिओं के मन में उनके प्रति आदर होता  है । यह भूलना नहीं चाहिये । डरपोक आदमी युध्ध नहीं कर सकता । ईसी लिए प्रीन्सीपाल को निर्भय बनना पडे । तभी वे शिस्तपालन करा सकेंगे । सभी शिक्षकगण, गीताजी के अध्ययन द्वारा निष्काम कर्मयोगी बनें, निर्भय बनें और जरुरत पर कठोर भी बन सकें, यह जरुरी है । ये सभी सज्जन ही, समाज में से दुर्गंध दूर करने के लिए बहुत कुछ कर सकते हैं । ये बल गीताजी के आचरण में से ही मिल सकता है ।

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