श्रीकृष्ण भगवान माने साक्षात प्रेममूर्ति । श्रीकृष्ण भगवान का जीवन निर्दोष, निरवधि और निर्व्याज प्रेम से छलकता है । उन्होंने धन से कहीं अधिक महत्व प्रेम को दिया है । ईसी लिए तो भक्तकवि श्री सूरदासजी ने गाया कि –
" प्रेम के वश अर्जुन रथ हांक्यो, भूल गए ठकुराई, सब से उंची प्रेम सगाई ..."
श्रीकृष्ण भगवान अर्जुन के सारथी बनकर, चार सुंदर श्वेत अश्वोंवाले रथ को, युध्ध के लिए सज्ज दो सैन्यों के बीच लाते हैं । अर्जुन दोनों सैन्यों में उपस्थित अपने स्वजनों को देखकर गहेरे विषाद में डूब जाता है । जिनकी पूजा करनी चाहिये ऐसे बुझर्ग महानुभावों की हत्या मैं कैसे कर सकता हूं ? और यह युध्ध में तो दोनों पक्षों में स्वजनों का ही संहार होनेवाला है, ईसी लिए मैं युध्ध नहीं करुंगा ऐसा कहकर रथ में बैठ जाता है । विषाद का त्याग करने और कर्तव्य पालन के लिए, स्वयं श्रीकृष्ण भगवान ने अर्जुन को जो उपदेश दिया वह श्रीमद् भगवद् गीता ।
" चिदानंदेन कृष्णेन प्रोक्ता स्वमुखतोर्जुनम्,
वेदत्रयी, परानंदा, तत्त्वार्थ ज्ञानसंयुता...."
यह गीताजी कोई साधारण पुस्तक नहीं है । श्रीकृष्ण भगवान ने स्वयं अर्जुन को जो उपदेश दिया वह, तीनों वेद स्वरुप, परम आनंद देनेवाली और तत्वार्थ ज्ञान से सभर श्रीमद् भगवद् गीता । अठारह पुराणों के रचयिता महर्षि वेदव्यासजी ने ' महाभारत ' लिखा, ईनके अंतर्गत श्रीमद् भगवद् गीताजी है । महाभारत युध्ध के दौरान, श्रीकृष्ण भगवान और अर्जुन के बीच जो मौखिक संवाद हुआ, वह गीताजी । यह दोनों में से किसीने लिखी नहीं है और व्यासजी युध्ध के मैदान में हाजिर न थे तो, यह वर्णन को सच्चा कैसे मानें ? कुछ समझ में न आए ऐसी अटपटी बात है । महर्षि वेदव्यासजी त्रिकालदर्शी ऋषि और महान योगी होने की वजह से, युध्ध के मैदान में हाजिर न होने पर भी, युध्ध की गतिविधि से संपूर्ण माहितगार थे । उन्होंने ही संजय को दिव्य द्रष्टि देकर, महल में बैठे बैठे महाभारत युध्ध देखकर, उसका वृतांत अंध धृतराष्ट्र को सुनाने की व्यवस्था की थी । यह बात भी हमारी समझ में न आए ऐसी है । जो बात समझ में न आए उसे सिर्फ अंधश्रद्धा से सच्ची मान लेना, उचित नहीं ।
हम सब का अनुभव है कि दुनिया के किसी दो देशों के बीच खेली गई, क्रीकेट मैच के एक एक गेंद को, हम हमारे घर में देख सकते हैं और उसके वर्णन का एक एक शब्द
पौराणिक युग की बातें शायद हम न मानें पर, कुछ साल पहेले ही, श्री रामकृष्ण परमहंस और स्वामी विवेकानंदजी के बारे में सोचें । श्रीमद् भगवद् गीताजी के अध्याय नंबर 10 विभूतियोग में श्रीकृष्ण भगवान ने कहा है – " मैं सर्व प्राणीओ में रहेनेवाला आत्मा हूं । (श्लोक–20) और मैं समस्त जगत को मेरे एक अंश से ही व्याप्त करता हूं । (श्लोक-42) यह बात जब श्री रामकृष्ण परमहंसजी ने स्वामी विवेकानंदजी को समझाई तब, वह बात वे समझ नहीं पाये । उन्होंने सोचा – " मैं भी ब्रह्म, और तू भी ब्रह्म । यह थाली ब्रह्म और यह कटोरा भी ब्रह्म । ईससे बडी मूर्खता की बात क्या हो सकती है ? " लेकिन स्वामी रामकृष्ण परमहंसजी के स्पर्श करने पर विवेकानंदजी को अलौकिक अनुभव हुआ और सब कुछ ब्रह्ममय है, परमात्मा हर जगह व्याप्त हैं, ईनका उन्हें स्वयं अनुभव हुआ ।
स्वामी रामकृष्ण परमहंसजी को मृत्यु के पहेले केन्सर हुआ था । बहुत वेदना होती थी । विवेकानंदजी ने मन में सोचा – " गुरु परमात्मा का अवतार या अंश है तो उनके शरीर को वेदना क्युं ? " ऐसी आशंका होने पर भी वे कुछ नहीं बोले । लेकिन योगविद्या से उनके मन की बात को जानकर गुरु ने कहा – " बेटा ! अभी भी तुझे आशंका है ? मैं शरीर नही हूं, मैं आत्मा हूं । जो राम थे, जो कृष्ण थे, वही मैं रामकृष्ण हूं । "
जो बात हमारी समझ में न आए वही हकीकत, योगविद्या से संभवित है । यह बात ईन महानुभावों ने सिध्ध की है, जो गत सदी के अंतभाग में ही जीवीत थे । हमें योगविद्या का ज्ञान न हो, यह हमारी मर्यादा है । लेकिन हम योगविद्या को गलत नहीं कह सकते ।
महाराष्ट्र के श्री जी. के. प्रधान नाम के सज्जन को ई. स. 1942 में (करीब 70 साल पहेले) श्री शंकर महाराज नाम के परम योगी का मिलाप हुआ । श्री प्रधान संपूर्ण नास्तिक थे, लेकिन ईस परम योगी ने, ईनका जीवन परिवर्तन कर दिया । तत्पश्चात् श्री प्रधान ने ईंग्लीश भाषा में " Towards The Silver Crests of The Himalayas " नाम की एक पुस्तक लिखी । उसका मराठी भाषा में अनुवाद हुआ । ई.स. 1963 मे श्री प्रधान की मृत्यु
के बाद पुस्तक का 1978 में श्री गुलाबराय मंकोडी नाम के सज्जन ने " હિમગિરિ શિખરોનો આધ્યાત્મિક સાદ " नाम से गुजराती भाषा में अनुवाद किया । यह बहुत अद्भूत पुस्तक है । ईसके लेखन अनुसार श्री शंकर महाराज का निधन 1948 में हुआ । मतलब कि यह कोई बहुत पुरानी बात नहीं है ।
उपरोक्त पुस्तक की प्रस्तावना में, पेज नंबर 16 पर एक कल्पनातीत प्रसंग का जीक्र है । एक बार श्री प्रधान ने अपने आध्यात्मिक गुरु से कहा - " कुरुक्षेत्र मे जब दोनों सैन्य आमने सामने खडे थे तब श्रीकृष्ण ने अर्जुन को गीता कही, यह बात मैं नहीं मान सकता । श्री गुरु महाराज ने कहा - " कोई बात नहीं, मेरे सामने बैठ । बाद में उन्होंने प्रधान की ओर ईस तरह देखा कि प्रधान को समाधि लग गई । दो- ढाई घंटे तक समाधि दशा में रहे । जागृत होने के बाद, प्रधान ने अपने गुरु के चरणों में शिर झुकाकर कहा -" महाराज ! आज मैं धन्य हो गया । प्रत्यक्ष श्रीकृष्ण के मुख से मुझे आपने गीता सुनाई । पूरे कुरुक्षेत्र का द्रश्य मैंने आज सदेहे, अपनी ही आंखों से देखा । " उपरोक्त घटना ई.स. 1942 से 1948 के बीच की है, माने सिर्फ 60-70 साल पहेले की सत्य घटना है ।
योगविद्या से एक संत दो काया धारण कर सकते थे, ऐसा श्री परम हंस योगानंदजी ने अपनी आत्मकथा में लिखा है । यह पुस्तक में योगविद्या की कई आश्चर्यकारक घटनाओं का जीक्र है ।
गीताजी कोई रसप्रद नवलकथा नहीं है फिर भी, संत ज्ञानेश्वर, महात्मा गांधीजी, पूज्य विनोबाजी, पूज्य रवीशंकरदादा जैसे कई महानुभावों के मत अनुसार यह बारबार पढने लायक पुस्तक है । हर दफा कुछ विशिष्ट ज्ञान का अनुभव होता है । हमारे जीवन को उज्वल और उन्नत बनाने के लिए गीताजी को कंठस्थ करने की आवश्यकता नहीं है, लेकिन सच्चे दिल से आचरण जरुरी है ।
| Comments |
|

