(1) कर्मयोग -
श्रीकृष्ण भगवान ने गीताजी में कई बार निष्काम कर्म पर बहुत जोर दिया है । दूसरे अध्याय ' सांख्ययोग ' में श्लोक नंबर 47 में कहा है कि -
" कर्मण्येवा धिकारस्ते मा फलेषुं कदाचन,
मा कर्मफलहेतुर्भूर्मा ते संगोस्त्वकर्मणि..."
" हे अर्जुन ! कर्म करते रहेना, यही तेरे अधिकार की बात है, कर्म का क्या फल मिलेगा ?, यह तेरे अधिकार की बात नहीं है । तू फल की प्राप्ति के लिए कर्म करनेवाला न हो । और कर्म का त्याग करनेवाला भी न हो । "
ईच्छा हो या न हो, फिर भी हर मनुष्य को कर्म करना ही पडता है । यह कुदरती नियम है । लेकिन यह कर्म करने से मुझे आर्थिक लाभ होगा या नहीं ? ईस कर्म करने से मुझे यश मिलेगा या नहीं ? यह नहीं सोचना चाहिये । हर कर्म कर्तव्य पालन के रुप में करना चाहिये । कोई रिश्वत दे तो ही कार्य करना, कोई प्रशंसा करे तो ही कार्य करना, यह कर्मयोग नहीं है । अपने निजी स्वार्थ का खयाल किए बिना कर्म करना, वही सच्चा कर्मयोग है । उसी तरह जो कार्य करने से लाभ न हो, या तो यश न मिले, स्वजनों को परेशानी हो, हमारे संबंध में तनाव पैदा होने की आशंका हो, ऐसा कार्य, अपना कर्तव्य होने पर भी नहीं करना, यह भी कर्मयोग नहीं है । कर्मत्याग को प्रभु बल नहीं देते। अपना कर्तव्य किसी भी अपेक्षा के बिना या तो किसी नुकशान की परवाह किए बिना करना ही चाहिये । यह बात गीताजी में बार बार दोहराई गई है । कर्मत्याग नहीं लेकिन स्वार्थत्याग का महत्व है । लाभ-गेरलाभ या यश- अपयश के बारे मे सोचे बिना, कर्म करने का मतलब यह नहीं है कि बिना कुछ सोचे समझे, कोई व्यवस्थित आयोजन किए बिना कार्य करना । सिर्फ कर्तव्य पालन में हमारा निजी स्वार्थ नहीं होना चाहिये ।
श्रीकृष्ण भगवान ने ज्ञानयोग को भी विशेष महत्व दिया है । ज्ञान से अधिक पवित्र कुछ नहीं है, ऐसा कहेकर ज्ञान की महिमा की है । अध्याय नंबर 6' आत्मसंयमयोग ' मे श्लोक नंबर 30 में कहा है कि –
" यो माम पश्यति सर्वत्र, सर्वम् च मयि पश्यति,
तस्याहम् न प्रणश्यामि, स च मे न प्रणश्यति......"
" जो मुझे सर्वत्र देखता है और मैं सभी में व्याप्त हूं, ऐसा समझता है, उससे मैं अद्रश्य नहीं हूं और वह मुझसे अद्रश्य नहीं है । "
ये शब्द श्रीकृष्ण भगवान के हैं । परमात्मा सर्वव्यापी है । यह ज्ञान ही सर्वश्रेष्ठ ज्ञान है । यह ज्ञान से विशेष पवित्र कुछ नहीं है । अगर हम हर ईन्सान में परमात्मा को देखें तो फिर दूसरों को छलने का विचार ही न उठे । अन्य किसीको दु:ख हो, ऐसा वर्ताव हमसे नहीं होना चाहिये । किसीसे रिश्वत न लें । किसीका जानबुझकर अहित न करें । हर मानवी में परमात्मा है, ऐसा सोचकर, हो सके ईतनी दूसरों की सहायता करें, तो धरती पर स्वर्ग आ जाए । खुद परमात्मा ने कहा है – " जो मुझे सर्वत्र देखता है, मैं उससे अद्रश्य नहीं हूं और वह मुझसे अद्रश्य नहीं है । " माने कि अगर यह ज्ञान जीवन में उतारें तो, परमात्मा के दर्शन संभव है । ईतना ही नहीं, परमात्मा की अखंड कृपा हम पा सकें ।
कोई प्रधान, कलेक्टर या पुलीस कमीश्नर, जैसे आम आदमी की पहेचान से भी, हम गर्व महसूस करते हैं तो, अगर सकल विश्व के नियंता परमात्मा के साथ हमारा गहेरा संबंध हो तो, वह कितना गौरवप्रद होगा ! परमात्मा की कृपा का आनंद कितना बडा अवर्णनीय हो सकता है । यह समझा नहीं सकते ।
(3) भक्तियोग –
श्रीकृष्ण भगवान ने, भक्तियोग का आचरण करनेवाले को, गीताजी में अजीब अभय वचन दिया है । 18 वें अध्याय ' मोक्षसंन्यासयोग ' में, श्लोक नंबर 66 में कहा है –
" सर्व धर्मान् परित्यज्य, माम एकम् शरणम् व्रज,
अहम् त्वा सर्व पापेभ्यो मोक्षयिश्यामि मा शुच:.... "
" सर्व धर्मों का त्याग करके मेरी शरण में आ जा । मैं तुझे हर पाप से मुक्त करुंगा । तू फिक्र मत कर ।"
श्रीकृष्ण भगवान ने गीताजी में भक्तियोग के बारे में बहुत ही सरल भाषा में समझाया है । भक्ति के लिए कोई कठिन शर्तें नहीं है । सब कुछ छोडकर, सिर्फ परमेश्वर की शरण में जाना । कर्मयोग और ज्ञानयोग का सही अर्थ समझकर, उसका आचरण करें, यही श्रेष्ठ --
भक्ति है । हमारा जीवन उन्नत बनाएं, अपेक्षारहित जीवन जीएं, किसीका द्वेष न करें, दूसरों
को सहायरुप बनने की कोशिष करें तो, भक्ति सीखने की आवश्यकता नहीं है । सच्चे अर्थ में प्रभु को आत्म समर्पण करें तो, प्रभु कृपा का अनुभव कर सकें । यह वर्णन का विषय नहीं है । स्वयं अनुभव करने की बात है । भक्ति प्रेम से भरपूर होती है । भक्ति कोई खुशामत नहीं है, माने कि बिना प्रेम के, प्रभु की झुठी प्रशंसा करने का कोई मतलब नहीं है । दिखावे की भक्ति से बहेतर है कि हम प्रभुभक्ति न करें । प्रभु की शरण में जाना, माने संपूर्ण प्रभुमय हो जाना ।
विश्व की श्रेष्ठ पुस्तक श्रीमद् भगवद् गीताजी, हिन्दु धर्मग्रंथ महाभारत का एक भाग है । फिर भी वह सिर्फ हिन्दुओं के लिए नहीं है । किसी क्षत्रिय या ब्राह्मिन के लिए नहीं है । सिर्फ पुरुषों या महिलाओं के लिए नहीं है । किसी देश के लिए नहीं है । ज्ञान को किसी धर्म या संप्रदाय की सीमा नहीं होती । जिनको अपना जीवन उन्नत और उज्वल बनाना हो, वह गीताजी का आचरण करें । गीताजी ज्ञान की चर्चा या वादविवाद के लिए नहीं है । ज्ञान का प्रदर्शन करने के लिए भी नहीं है । ईसी लिए गीताजी कंठस्थ करने की आवश्यकता नहीं है । खुद श्रीकृष्ण भगवान ने अर्जुन को, अपना उपदेश आंखें मुंदकर अनुसरण करने को नहीं कहा है । शांति से सोच विचार कर के, योग्य निर्णय करने को कहा है ।
कोई कहेगा कि गीताजी संस्कृत भाषा में है । उसका पठन ही बहुत कठिन है । कंठस्थ करना अति मुश्किल है । परिणाम स्वरुप समझने में तो ज्यादा तकलीफ है । यह बात सही है । हमारे जैसे आम आदमी को, संस्कृत भाषा का विशिष्ट ज्ञान न हो, ईसी लिए कठिनाई होगी । ईनके 700 श्लोक हम फटाफट बोल न सकें, यह स्वाभाविक है । उनके 18 अध्याय में से, शायद एक अध्याय भी ठीक तरह समझ न सकें, तो कोई बात नहीं । 10-12 श्लोक भी याद न रहे, तो कोई बात नहीं । लेकिन कर्मयोग, ज्ञानयोग और भक्तियोग के बारे में सिर्फ एक एक श्लोक का सही अर्थ ठीक तरह से समझ लें और उसका सच्चे दिल से आचरण करें तो, पूरे गीताजी कंठस्थ करने की कोई आवश्यकता नहीं है । पूज्य श्री रवीशंकरदादा के प्रवचनों पर आधारित लिखा गया " गीताबोधवाणी " नामका उत्तम ग्रंथ हम पढें तो ईन तीन श्लोकों का अर्थ सरल रुप से समझ सकें ।
हमारा आचरण अच्छा करते करते हमसे कोई गलती भी हो जाय तो फिर से कोशिष करें । प्रभु हमारी गलती जरुर क्षमा कर देंगे । वे तो परम दयालु और क्षमाशील हैं । परमात्मा के परम भक्त श्री सूरदासजी ने बहुत सुंदर प्रार्थना की है -
" नैनहीन को राह दिखा प्रभु !, पग पग ठोकर खाउं मैं,
तेरी नगरीया की कठिन डगरीया, चलत चलत गिर जाउं मैं,
एक बार प्रभु ! हाथ पकड लो, एक बार प्रभु ! हाथ पकड लो .."
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