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32. मोक्षसंन्यासयोग – 3

श्रीकृष्ण भगवान ने श्रीमद् भगवद् गीताजी के यह अंतिम 18 वें अध्याय में अर्जुन से कहा – " तू मुझे प्रिय होने से यह मेरा परम हितकर वचन सुन कि - तू मुझ में ही मन रखनेवाला हो, मेरा ही भक्त हो, मुझे ही नमस्कार कर, ईससे तू मुझे ही पाएगा । सर्व धर्मों का त्याग कर के मेरी ही शरण में आ जा । मैं तुझे सर्व पापों से मुक्ति दिलाउंगा । तू फिक्र मत कर । " परमात्मा का यह अभय वचन बहुत ही सोचने योग्य है । जो सब कुछ छोडकर परमात्मा की शरण में जाता है, परमात्मा प्रेम से उसका स्वागत करते हैं । उसकी तमाम मुश्किलें प्रभु दूर कर देते हैं ।

गीताजी की चर्चा के बाद, अंत में प्रभु पूछते हैं – " हे पार्थ ! मैंने जो उपदेश तुझे दिया, वह तूने एकाग्र चित्त से सुना क्या ? ईससे तेरा मोह नष्ट हुआ या नहीं ? " तब अर्जुन ने उत्तर दिया – " हे अच्युत ! आप की कृपा से मेरा मोह नष्ट हो गया है और मुझे सत्य का ज्ञान हुआ है । अब मेरा संदेह मिट गया है । मैं आप के वचन अनुसार कार्य करुंगा । " यहीं गीताजी पूर्ण होती है ।

महर्षि वेदव्यासजी की कृपा से जिन्हें महल में बैठे बैठे, महाभारत का युध्ध देखने के लिए दिव्य द्रष्टि मिली थी वह संजय, धृतराष्ट्र के पास बयान करते करते अपना अभिप्राय कहेते हैं – " यह परम गुप्त योग को मैंने सुना है । भगवान श्रीकृष्ण और अर्जुन के यह रहस्ययुक्त, कल्याणकारक, अद्भूत संवाद का बार बार स्मरण कर के मैं हर्षित होता हूं । " हे राजन ! श्री हरि के वह अत्यंत अद्भूत रुप का ( विश्वरुप दर्शन की बात ) स्मरण करते करते मेरे चित्त में महान आश्चर्य हो रहा है और मैं बार बार आनंद का अनुभव कर रहा हूं । हे राजन ! जहां योगेश्वर भगवान श्रीकृष्ण है और जहां धनुर्धारी अर्जुन है वहां श्री, विजय, वैभव और अविचल नीति है ही, ऐसा मेरा अभिप्राय है । "

तत्पश्चात्, महाभारत युध्ध शुरु होता है । भीष्म पितामह, कौरवों के सेनापति होने पर भी, अपने पौत्रों पांडवों की हत्या नहीं करने के लिए, उन्होंने मन में ठान रख्खी थी । ईसी तरह मोह नष्ट होने पर भी अर्जुन भी पूज्य भीष्म पितामह की हत्या नहीं करता । नौ दिवस बित जाने के बाद भी, दोनों पक्षो में बहुत जानहानि होने के बावजुद, कोई ठोस परिणाम नहीं आता । अगर ऐसे ही युध्ध चलता रहे तो, जानहानि बढती जाय, ईसके सिवा कोई अर्थ नहीं रहेता । ईसी लिए दुर्योधन, भीष्म पितामह को और आक्रमक बनने को कहेता है ।

युध्ध के दौरान, वे शस्त्र ग्रहण नहीं करेंगे, ऐसी प्रतिज्ञा श्रीकृष्ण भगवान ने ली थी । लेकिन दसवें दिन भीष्म पितामह ने - वे श्रीकृष्ण भगवान को शस्त्र उठाने के लिए मजबूर करेंगे, ऐसी प्रतिज्ञा ली थी । भीष्म पितामह का अत्यंत आक्रमक रुप देख के, पांडवों की रक्षा करने के लिए, श्रीकृष्ण भगवान, रथ पर से कूद के, नजदीक में पडे हुए तूटे हुए रथ का पहिया लेकर, भीष्म पितामह की हत्या करने दौड पडे । यह प्रसंग अद्भूत है ।

भीष्म पितामह ने अपने शस्त्र फेंक दिए और दो हाथ जोडकर कहा – " प्रभु ! आप के हाथों मेरी मृत्यु हो, ईससे अधिक उत्तम क्या हो सकता है ? आप शस्त्र उठाने के लिए मजबूर हो जाएं, ईसी लिए मैं उग्र युध्ध करता था । आपने अपनी प्रतिज्ञा तोडकर मेरी प्रतिज्ञा की रक्षा की है । ईतना ही नहीं, आपने अपनी प्रतिज्ञा का भी पालन किया है । "

 

" वास्तविक रुप में, रथ का पहिया शस्त्र नहीं है, ईस प्रकार आपने अपनी प्रतिज्ञा की भी रक्षा की है । लेकिन हत्या करने के लिए जिसका प्रयोग हो, वह शस्त्र न होने पर भी,  शस्त्र ही माना जाता है, ईस तरह आपने रथ के पहिये को उठाकर, मेरी प्रतिज्ञा की रक्षा की है । मैं आप को कोटि कोटि प्रणाम करता हूं । "

 

श्री शिव महिम्न स्तोत्र महादेवजी की स्तुति है । ईसमें एक श्लोक में श्रीकृष्ण भगवान के लिए एक शब्द है – " रथचरणपाणि ".चरण माने पांव । रथचरण माने रथ का पहिया । पाणि माने हाथ । रथचरणपाणि माने रथ का पहिया जिन्होंने हाथ में धारण किया है, वे श्रीकृष्ण भगवान । उपरोक्त बात में जिस प्रसंग का जिक्र किया है, उसके अनुरुप ऐसा सुंदर नाम संस्कृत साहित्य में ही मिलेगा।

उसके बाद, अर्जुन व्यथित होकर, श्रीकृष्ण भगवान को भीष्म पितामह की हत्या नहीं करने के लिए बिनती करता है और

वह मोह का संपूर्ण त्याग कर के युध्ध करेगा, ऐसा वचन देता है । ईस लिए श्रीकृष्ण भगवान रथ के पहिये को फैंककर, अपने रथ पर विराजमान हो जाते हैं । श्रीकृष्ण भगवान की सूचना के अनुसार, शिखंडी के पीछे रहेकर अर्जुन ने तीरों की बौछार बरसाकर भीष्म पितामह को बाणशैया पर सुला दिया ।

आचार्य द्रोण नये सेनापति नियुक्त हुए । उनको रोकने के लिए, श्रीकृष्ण भगवान ने भीम को अश्वत्थामा नाम के हाथी की हत्या कर के अश्वत्थामा मर गया ऐसी घोषणा करने को कहा । गुरु द्रोण, अपने पुत्र अश्वत्थामा की मृत्यु हो गई, ऐसा सुनने पर वे विचलित हो गए । उन्होंने शस्त्र त्याग दिए । वह मौके का फायदा उठाकर, धृष्टद्युम्न ने अपने पिता के बैर का बदला लेने के लिए गुरु द्रोण का शिर काट डाला ।

महारथी कर्ण सेनापति नियुक्त होने के बाद, युध्ध के दौरान उनके रथ का पहिया जमीन में फंस गया । वे रथ से नीचे उतरकर, रथ के पहिये को बाहर नीकालने की कोशिष कर रहे थे तब, श्रीकृष्ण भगवान ने अर्जुन को कर्ण की हत्या करने को कहा । वह

स्वयं रथ में नहीं है, उनके हाथ मे शस्त्र भी नहीं है, ऐसी स्थिति में उन पर शस्त्र से प्रहार

करना अधर्म है, ऐसा कहकर कर्ण ने विरोध प्रगट किया । तब श्रीकृष्ण भगवान ने अजीब बात कही – " द्रौपदी के वस्त्रहरण की कलंकित घटना के समय मौन रहेनेवाले को, धर्म की बात करने का अधिकार नहीं है । " ईस तरह कर्ण की भी मृत्यु हो गई ।

युध्ध के अंत भाग में, भीम और दुर्योधन के बीच गदायुध्ध हुआ तब, भीम अत्यंत पराक्रमी होने के बावजुद, दुर्योधन को पराजित करना, उसके लिए नामुमकिन था । माता गांधारी के आशीर्वाद की वजह से, दुर्योधन का जांघ के अतिरिक्त शरीर वज्र जैसा हो गया  था । युध्ध के नियम अनुसार, शरीर के नीचे के हिस्से में गदा प्रहार करना अनुचित था । फिर भी, दुर्योधन की जांघ पर प्रहार करने के लिए, भीम को सूचित करने को, श्रीकृष्ण भगवान ने अर्जुन को कहा । ईस तरह भीम की प्रतिज्ञा का भी पालन हो सकता था । फिर से धर्म - अधर्म की चर्चा हुई । लेकिन अधर्म का आचरण करनेवाले को धर्म की चर्चा करने का अधिकार नहीं है, ऐसा कहकर उसकी हत्या में कुछ अनुचित नहीं है, ऐसा श्रीकृष्ण भगवान ने जोर देकर कहा । ईस तरह दुर्योधन की भी मृत्यु हो गई । ऐसे तो महाभारत में कई उदाहरण हैं ।

ईस तरह, उपलक द्रष्टि से देखें तो, हर दफा, श्रीकृष्ण भगवान ने, कुछ अधर्म कह सकें ईस तरह, दुश्मनों की हत्या कराने में महत्व का प्रदान दिया, ऐसा लगता है । लेकिन एक बहुत ही महत्वपूर्ण बात हमें लक्ष्य में लेनी चाहिये । सामान्य रुप से हर आदमी, अपने निजी स्वार्थ को लक्ष्य में रखकर सच्चे झुठे का अर्थघटन करता है और उसके आधार पर अपना निर्णय लेता है । लेकिन श्रीकृष्ण भगवान का कोई भी निर्णय अपने निजी स्वार्थ पर आधारित न था । धर्म संस्थापना के शुभ हेतु से, समाज कल्याण के लिए, अधर्मिओं के या उनको साथ देनेवाले मानविओं के विनाश के लिए, अगर जरुरत हो तो अधर्म का आचरण भी जायज है, ऐसा उनका स्पष्ट मंतव्य था । अधर्मी को अधर्म से मारने में कुछ भी अनुचित नहीं है । श्रीकृष्ण भगवान ने कभी भी, किसी निर्दोष की हत्या करने की या कराने की कोशिश नहीं की है । यह अत्यंत महत्वपूर्ण बात हमें नहीं भूलनी चाहिये । 

ईस तरह संजय का मंतव्य सही नीकला । अगर श्रीकृष्ण भगवान पांडवों के साथ न होते तो, उनके अमूल्य मार्गदर्शन के बिना, पांडवों का महाभारत युध्ध में विजय पाना नामुमकिन होता । अर्जुन महासमर्थ योध्धा थे । फिर भी, श्रीकृष्ण भगवान के देहोत्सर्ग के बाद, द्वारिका से हस्तिनापुर जाते हुए, रास्ते में कई सामान्य लूटेरों ने उन्हें और उनके साथ जो यादव परिवार थे, वे सभी को लूट लिया । ईसी लिए तो किसीने कहा -

" काबे अर्जुन लूटीयो, वही धनुष्य, वोही बाण..."

श्रीकृष्ण भगवान के बिना अर्जुन की शक्ति क्षीण हो गई । ऐसे अद्भूत, अप्रतिम और विरल व्यक्तित्ववाले गीतागायक श्रीकृष्ण भगवान को कोटि कोटि वंदन ।

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