श्रीकृष्ण भगवान ने बुध्धि और धृति के तीन प्रकार के बारे में समझाते हुए कहा –
" हे पार्थ ! जो बुध्धि, प्रवृत्ति–निवृत्ति, करने योग्य – न करने योग्य, भय–अभय, बंधन और मुक्ति को जानती है, वह सात्विक बुध्धि है । जिससे मनुष्य, धर्म–अधर्म को, कर्तव्य– अकर्तव्य को यथार्थ रुप से नहीं जान सकता, वह राजस बुध्धि है । हे पार्थ ! अहंकार से व्याप्त जो बुध्धि अधर्म को धर्म समझती है और सभी पदार्थों को विपरित रुप से देखती है, वह तामस बुध्धि है । "
" हे पार्थ ! जो एकनिष्ठा धृति से मनुष्य, मन, प्राण और ईन्द्रियों की क्रियाओं को आत्मयोग से धारण करता है, वह सात्विक धृति है । हे अर्जुन ! फल की आकांक्षावाले लोग, जो धृति से आसक्तिपूर्वक धर्म और अर्थ के कार्यों को धारण करती है, वह राजस धृति है । हे पार्थ ! जो धृति से, दुर्बुध्धिवाले मनुष्य, निद्रा, भय, शोक और जडता का त्याग नहीं कर सकता, वह तामस धृति है । "
सुख के भी तीन प्रकार समझाते हुए श्रीकृष्ण भगवान ने कहा – " जो सुख आरंभ में विष जैसा लगे, लेकिन अंत में अमृत समान हो ऐसा, आत्मज्ञान की प्रसन्नता से उत्पन्न हुआ सुख सात्विक है । विषयों और ईन्द्रियों के संयोग से उत्पन्न हुआ सुख, आरंभ में अमृत जैसा मधुर लगे, लेकिन अंत में विष समान हो, वह सुख राजस है । जो सुख आरंभ में और अंत में, आत्मा को मोह उत्पन्न करनेवाला और निद्रा, आलस और प्रमाद में से उत्पन्न होता है, वह सुख तामसी है । पृथ्वी पर ये तीनों गुनों से कोई मुक्त नहीं है । "
" हिन्दु धर्म की प्राचीन वर्ण व्यवस्था भी तीन गुनों के अनुसार, उनके भिन्न भिन्न स्वभाव को ध्यान में रखते हुए, निश्चित की गई है । ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य और शुद्र, ये चार वर्ण का स्वभावजन्य कर्म का वर्णन किया हुआ है । अपने अपने स्वाभाविक कर्म में ही रहेकर मनुष्य मोक्ष पाता है । अपने धर्म की तुलना में, दूसरों का धर्म लाभदायक लगने पर भी, अपना धर्म ही कल्याणकारक है । ईसी लिए अपने स्वाभाविक कर्तव्य का पालन करनेवाले को पाप नहीं लगता । जिस तरह अग्नि के साथ धुम्र होता ही है, ईसी तरह कीसी भी कर्म के साथ, दोष जुडा हुआ ही होता है । अपना कर्म यानि स्वधर्म, दोषयुक्त हो तो भी उसका त्याग नहीं करना चाहिये । "
" मन और ईन्द्रियों को जीतनेवाला, आसक्तिरहित बुध्धिवाला मनुष्य, जिसे कोई स्पृहा नहीं है वह, ज्ञानयोग द्वारा, कर्म करते हुए भी कर्मबंधन से मुक्त होता है । "
" परब्रह्मभाव को प्राप्त करनेवाला वह प्रसन्न चित्त मनुष्य, किसीका शोक नहीं करता । वह सर्व भूतों में समान भाव रख के, मेरी परम भक्ति को पाता है । वह यथार्थ रुप से मुझे जानता है । मेरे परायण रहेकर, सर्व कर्मों नित्य करने पर भी, मेरी प्रसन्नता से, अविनाशी शाश्वत पद को पाता है । हे अर्जुन ! ईसी लिए तू भी, सर्व कर्मों मुझे समर्पित कर के, मुझे पाने की एक निश्चयवाली बुध्धि से, कर्मयोग का आश्रय ले के, सदैव मेरे परायण चित्तवाला हो । मेरे में चित्त जोडने से, तेरी तमाम मुश्किलें आसान हो जाएगी । लेकिन अगर अहंकार को वश होकर, मेरा कहा नहीं सुनेगा, तो तेरा नाश होगा । अहंकार की वजह से, तू ऐसा सोचता है कि मैं युध्ध नहीं करुंगा, लेकिन तेरा स्वभाव ही, तेरी ईच्छा के विरुध्ध तुझे युध्ध करने को मजबूर करेगा । "
" हे कौंतेय ! मोहवश तू जो कार्य, अभी नहीं करना चाहता वह, तू तेरे स्वभावजन्य पूर्व कर्म से बंधा हुआ होने से, परवश हो के भी करेगा । हे भारत ! तू संपूर्ण भाव से परमात्मा की शरण में जा । उनकी कृपा से तुझे परम शांति मिलेगी । "
" ईति ते ज्ञानम् आख्यातम् गुह्याद् गुह्यतरम् मया,
विमृश्य एतद् अशेषेण, यथेच्छसि तथा कुरु ......" (गीता 18-63)
" ईस तरह गुप्त से गुप्त ज्ञान मैंने तुझे कहा । अब तू ठीक तरह से सोच विचार कर के, जैसा तू योग्य समझे वैसा कर । "
यह श्लोक का अंतिम चरन बहुत महत्वपूर्ण है । श्रीकृष्ण भगवान के बारे में कई लोग ऐसा सोचते हैं कि उन्होंने अर्जुन को युध्ध के लिए उकसाने से ही महाभारत युध्ध हुआ । लेकिन गीताजी का यह चरन, ईस बात का स्पष्ट खंडन करता है । श्रीकृष्ण भगवान युध्ध के हिमायती न थे । युध्ध से होनेवाला संभवित विनाश रोकने के लिए तो, वे राजा महाराजाओं से भी श्रेष्ठ होने के बावजुद एक शांतिदूत के रुप में हस्तिनापुर गए थे ।
हस्तिनापुर की राज्यसभा में, भिष्म पितामह, गुरु द्रोणाचार्य, राजा धृतराष्ट्र और अन्य कई महानुभावों की उपस्थिति में, युध्ध रोकने के लिए, पांडवों से न्याय करने का प्रस्ताव रख्खा । समाधान के रुप में, पांडवों को आधे राज्य के बजाय सिर्फ पांच गांव देने का प्रस्ताव भी रख्खा । लेकिन अभिमानी दुर्योधन ने, सुई की नोक जितनी जमीन भी देने का ईन्कार कर दिया । पुत्रमोह की वजह से, राजा होने पर भी, धृतराष्ट्र कुछ कह नहीं सके । ईसी वजह से युध्ध की संभावना हो गई ।
राज्य पाने की ईच्छा का त्याग कर के और महानुभावों की संभवित हत्या के शोक का त्याग कर के, अपने स्वभावजन्य कर्तव्य पालन के रुप में युध्ध करने को समझाया । लेकिन समग्र गीताजी के उपदेश के बाद भी, अर्जुन को स्वयं संपूर्ण सोच विचार कर के, युध्ध के बारे में अंतिम निर्णय लेने को कहा । यह बहुत महत्वपूर्ण है । उन्होंने अर्जुन को आंखें मुंदकर, अपना अनुसरण करने को नहीं कहा है ।
अंत:करण की शुध्धि पर परमात्माने बहुत जोर दिया है । परमात्मा की कृपा पाने के लिए, परमात्मा के दर्शन के लिए, यह पूर्व शर्त है, ऐसा कह सकते हैं । अगर परमात्मा की अखंड कृपा का अनुभव पाना हो, प्रभुदर्शन की तीव्र ईच्छा हो तो, अंत:करण को शुध्ध करना बहुत ही आवश्यक है ।
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