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30. मोक्षसंन्यासयोग - 1

श्रीकृष्ण भगवान ने अर्जुन को उद्बोधित किया हुआ, गीताजी का यह अंतिम अध्याय है । अर्जुन ने संन्यास और त्याग का तत्व, भिन्न भिन्न समझाने की प्रार्थना करने से परमात्मा ने समझाया – " काम्य कर्मों के त्याग को सन्यास और कर्मफल के त्याग को त्याग कहेते हैं । " ईस तरह दोनों त्याग ही है । कई विद्वान मानते हैं कि जीवन के बंधन की मुख्य वजह कर्म है, ईसी लिए कर्म नहीं करने चाहिये । लेकिन कई विद्वान मानते हैं कि दान, तप, यज्ञ ईत्यादि कर्म का त्याग उचित नहीं है । जीवन की उन्नति के लिए ये जरुरी है । ईस तरह कर्मत्याग माने कि सन्यास के बारे में विद्वानों में मतमतांतर है । ईस बाबत अपना निर्णय देते हुए, श्लोक नंबर 5 और 6 में परमात्मा कहेते हैं कि – " यज्ञ, दान और तप जैसे कर्मों का त्याग नहीं करना चाहिये । वे तो बुध्धिमान मनुष्यों को भी पावन करनेवाले हैं । लेकिन हे पार्थ ! ये कर्म आसक्ति और फल की आशा को छोडकर ही करने चाहिये । ऐसा मेरा निश्चित और उत्तम अभिप्राय है । "

गीताजी का सच्चा प्रारंभ दूसरे अध्याय सांख्ययोग से होता है । परमात्मा ने ईसमें कहा है कि – " तुझे फक्त कर्म करने का ही अधिकार है । फल की आशा तुझे नहीं रखनी   चाहिये । " यह हमें अच्छी तरह से याद रखने का है । गीताजी के प्रारंभ में जो बात हुई थी, वही बात पर परमात्मा ने अंतिम अध्याय में भी बहुत जोर दिया है ।

नियत कर्मों का कभी त्याग नहीं करना चाहिये । फिर भी मोहवश, अगर हम ईनका त्याग करें तो, उसे तामस त्याग कहेते हैं । जो कुछ कर्म है, वे सभी ही दु:खरुप हैं, ऐसा सोचकर शारीरिक कष्ट के भय से, जो कर्म का त्याग करें तो वह राजस त्याग कहेलाता है । ऐसे त्याग का कोई फल नहीं मिलता । " हे अर्जुन ! कर्तव्य के रुप में नियत कर्म, जिसे अपना धर्म समझकर, आसक्ति और फल की ईच्छा का त्याग करके, किया जाता है, वह त्याग सात्विक त्याग कहेलाता है । ऐसा त्यागी बुध्धिमान और संशयरहित होने से मुश्किल कार्य को धिक्कारता नहीं है, और कल्याण कारक कार्यों में आसक्त नहीं होता है । कर्मों का संपूर्ण त्याग देहधारी मानव के लिए संभव नहीं है । ईसी लिए जो मनुष्य कर्मफल का त्यागी है, वही सच्चा त्यागी है, ऐसा कहेते हैं । "

कर्मफल का त्याग न करनेवाले को मृत्यु के बाद (भी) कर्म का अच्छा, बुरा और मिश्र फल मिलता है । लेकिन जो कर्मफल का त्यागी है, ऐसे कर्मफल सन्यासी को ऐसे फल कभी भुगतने नहीं पडते । कर्मों में जिसे ' मैं कर्ता हूं, ' ऐसा अहंकार नहीं है, उसकी बुध्धि को कर्म की सिध्धि-असिध्धि का कोई असर नहीं होता । अगर वह, ये सभी लोगों की हत्या कर दे तो भी सच्चे अर्थ में, वह किसीकी हत्या नहीं करता, माने कि यह कर्म उसे बंधनकारक नहीं होता । (यह बात युध्ध के संदर्भ में होने से ऐसा कहा है लेकिन सामान्य अर्थ में ' मैं कर्ता हूं ' ऐसे अहंकार के बिना जो कर्म किया जाए वह कर्म बंधनकारक नहीं होता ।)

ज्ञान के तीन प्रकार समझाते हुए कहा – ' जो ज्ञान से मनुष्य, भिन्न भिन्न दिखते हुए सर्व भूतों में, जो परम तत्व है, उसे अविनाशी भाव से एकरुप देख सके, उस ज्ञान को सात्विक ज्ञान कहेते हैं । जो ज्ञान से मनुष्य, भिन्न भिन्न दिखते हुए सर्व भूतों में, परम तत्व को बंटा हुआ माने वह राजस ज्ञान है । जो ज्ञान, एक ही कार्य में लाभ है ऐसा मानकर, उसका स्वरुप समझे बिना, कुछ सोचे समझे बिना, आसक्त हो जाए उसे तामस ज्ञान कहेते  हैं । '   

कर्म के तीन प्रकार समझाते हुए कहा – ' कर्तव्य के रुप में जो नियत हुआ है ऐसा कर्म, रागद्वेष और आसक्ति से रहित होकर, फल की आकांक्षा के बिना करे, वह सात्विक कर्म  है । जो कर्म ' मैं कर्ता हूं ' ऐसे अहंकारपूर्वक, कामनावाला मनुष्य, फल के लिए बहुत परिश्रम करके करे वह राजस कर्म है । नतीजे के बारे में, वस्तुओं के दुर्व्यय के बारे में, हिंसा के बारे में, और अपनी शक्ति के बारे में, कुछ सोचे बिना मनुष्य, अज्ञान से जो कार्य का आरंभ करता है, वह तामस कर्म है ।'

'जो कर्ता आसक्तिरहित, अहंकाररहित, कार्य सिध्ध हो या न हो उसमें समान भाववाला, हर्ष और शोक करनेवाला नहीं है, वह सात्विक कर्ता है । जो कर्ता आसक्तियुक्त,  कर्मफल की ईच्छावाला, लोभी है और दूसरों को कष्ट देने का स्वभाववाला, और हर्ष शोक में आवेशवाला है, वह राजस कर्ता है । जो कर्ता अव्यवस्थित, असंस्कारी, शठ, अज्ञानी, जक्की, आलसी, शोक करनेवाला और दीर्घसूत्री है, वह तामस कर्ता है । '

ये तमाम बातों के बारे में, गहन रुप से सोच विचार करेंगे तो, स्पष्ट रुप से समझ में आ जाएगा कि परमात्मा ने जीवन में सद्गुनों को कितना बडा महत्व दिया है । परमात्मा का अवतार कार्य ही धर्म संस्थापना का है । अच्छे गुनों का समाज में महत्व बढे तभी, धर्म की संस्थापना हो सके । सात्विक ज्ञान, राजस ज्ञान, तामस ज्ञान, सात्विक कर्म, राजस कर्म और तामस कर्म, ये सभी बातें गीताजी में पहेले जो कुछ कहा गया है, उसकी पुनरोक्ति ही है । परमात्मा ये बात पर अत्यंत जोर देते हैं कि तुम्हारे सभी कार्य निष्काम, माने कि कर्मफल की आकांक्षा के बिना होने चाहिये ।

सात्विक ज्ञान माने परमात्मा सभी में समान रुप से व्याप्त है, यह बात को सही अर्थ में समझना । सात्विक ज्ञान को जीवन में उतारें, सात्विक कर्म करें तो, भक्ति अपने आप हो जाएगी । प्रभु दर्शन संभव होंगे । पूण्य पाने, आर्थिक लाभ पाने, यश पाने, या तो कोई भी हिसाब से, कुछ अच्छा कार्य करना, यह गलत बात है । ईसी तरह पाप, आर्थिक नुकशान, अपयश, या किसीके डर से भी, अपना नियत कार्य न करना, यह गलत बात है ।

अपने नियत कर्म करते करते प्रभुमय हो जाना, यही जीवन का ध्येय होना चाहिये । किसी सज्जन ने सिर्फ दो पंक्ति में गीता का सार समझा दिया है –
 

" સંસારમાં સરસો રહે, ને મન મારી પાસ,

સંસારથી લેપાય નહીં તે જાણ મારો દાસ....."

संसार में रहे, माने संसार का त्याग न करे, फिर भी संसार से अलिप्त रहेकर सदैव प्रभुमय रहे, वही प्रभु भक्त है ।

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cfoutarocri     |2011-07-17 11:58:45
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