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29. उत्तम दान

 

श्रीकृष्ण भगवान ने गीताजी के ' श्रध्धात्रयविभागयोग ' नाम के 17 वें अध्याय में श्लोक नंबर 20-21-22 मे दान के तीन प्रकार के बारे में बात की है । 

दान देना ये कर्तव्य है ऐसी बुध्धि से, बदला मिलने की आशा बगैर, योग्य समय पर, योग्य व्यक्ति को, जो दान दिया जाता है, वह सात्विक दान है । लेकिन जो बदला मिलने के लिए, या फलकी आशा से, हिचकिचाहट से, दान दिया जाता है, वह राजस दान है, और जो बिना सत्कार से, तिरस्कार से, अयोग्य देशकाल में और कुपात्र को दान दिया जाता है, वह तामस दान है ।

संस्कृत साहित्य में धन की तीन गति बताई गई है । दान, भोग, विनाश । जो धन दूसरों के हित के लिए खर्च किया जाय वह, दान है । जो धन अपने लिए या अपने परिवार के लिए खर्च किया जाय, वह भोग है । जो धन किसीके लिए खर्च न किया जाय माने कि सिर्फ संग्रह के रुप में पडा रहे, या अयोग्य कार्य के लिए खर्च किया जाय, वह धन का विनाश है ।

निजी स्वार्थ बिना, दूसरों के दु:ख दूर करने के लिए, धन का सदउपयोग हो, वह उत्तम है । धन का उपभोग करना अनुचित नहीं है । दूसरों का अहित किए बिना, स्वयं जो धन प्राप्त करे वह, सिर्फ अपने परिवार के लिए ही खर्च करे, उसमें कुछ अनुचित नहीं है, लेकिन वह जीवन का श्रेष्ठ लक्षण नहीं है । हिन्दी के सुप्रसिध्ध कवि श्री मैथीलीशरण गुप्तजी ने तो अजीब कह दिया –

"यही पशु प्रवृत्ति है कि आप आप ही चरे,

वही मनुष्य है कि जो मनुष्य के लिए मरे ...."

गलत कार्य के लिए छोटी मोटी रिश्वत दे के, या सुपारी के नाम से किसीकी हत्या कराने के लिए, जो धन खर्च होता है, वह धन का विनाश ही है । गलत कार्य कराने से हमें शायद थोडा आर्थिक लाभ होता हो, लेकिन हम समाज को गंभीर नुकशान पहुंचाते हैं । रिश्वतखोर कर्मचारी, रिश्वत न मिलने से कार्य नहीं करते, ईस तरह कामचोरी बढती है और रिश्वत न देनेवाले आदमी को, उसका कार्य न होने से अन्याय होता है ।

भविष्य में उपयोगी हो, ईस द्रष्टि से धन का थोडा संचय भी जरुरी है । आकस्मिक बीमारी या किसी सामाजिक कर्तव्यपालन के लिए धन की जरुरत हो तो चिता न हो, ईसी लिए यह जरुरी है । लेकिन सिर्फ बेंक बेलेन्स बढाने की द्रष्टि से, धन संचय की वृत्ति अयोग्य है । अयोग्य मार्ग से, धन संचय करके स्वीस बेक मे जमा करायें यह देशद्रोह है ।

पशु की तुलना में मनुष्य ज्यादा बुध्धिमान है । ईस लिए वह धन, धान्य, पानी ईत्यादि का संग्रह करता है । एक बार संग्रहवृत्ति शुरु हो जाए बाद मे, सुवर्ण, चांदी, रुपये सब कुछ संग्रह करने लगता है । यह असंतोषवृत्ति और संग्रहवृत्ति पतन की वजह होती है ।

संत धन का संग्रह नहीं करते, फिर भी वे अजीब सेवा कर सकते हैं । सद्गुरु श्री रणछोडदासजी महाराज के पास बील्कुल धन न था । फिर भी बीहार में अकाल की वजह से, उन्होंने वहां अन्नक्षेत्र शुरु किया । सामाजिक सहयोग से, हर रोज करीब 35,000 लोगों को  वे भोजन खिलाते थे । यह केम्प छ महिने तक कार्यरत रहा । धन न होने पर भी, एक सच्चे संत क्या कर सकते हैं, यह जानने के लिए " मानव द्रष्टि " नाम की पुस्तक सभी को पढने लायक है । कई सज्जनों ने स्वेच्छा से यथाशक्ति धनदान और श्रमदान   दिया । उनकी सुव्यवस्थित सेवा से प्रभावित होकर, अरविंद मील्सवाले श्री अरविंदभाई मफतलाल ने  स्वेच्छा से, राहत केम्प के छ महिने के संपूर्ण खर्च की जिम्मेदारी ली । भोजन के अलावा पुरुषों को धोती और महिलाओं को साडी दी गई ।

पूज्य श्री रणछोडदासजी महाराज, अपने उपदेश में कहेते थे कि, जिनके पास अमाप धन हो वही दान कर सकता है, ऐसा नहीं है । अगर तुम श्रीमंत न हो तो भी थोडा सा दान जरुर कर सकते हो । तुम्हें सीनेमा देखने का शौख हो तो, एक सीनेमा न देख के एक टिकट जितना दान करें । सीगरेट की आदत हो तो, थोडी सीगरेट कम करके, एक पैकेट की किमत जितना दान करें । दूसरों के हित के लिए, अपने मौजशौख मे थोडी कटौती करके, तुम दूसरों के लिए तकलीफ उठाकर दान करें यही श्रेष्ठ दान है । अगर तुम्हें कोई व्यसन न हो और तुम्हारे पास धन भी न हो, फिर भी आप तन से अन्य की सेवा कर सकते हैं । श्रमदान भी दान ही है । शायद धन न हो और परिवारवाले दुष्काल राहत केम्प में जाने की ईजाजत न दें, तो धनदान या श्रमदान के बिना भी, अपने घर में रहेकर भी अन्य की सेवा कर सकते हैं । दुष्काल पीडीत मानवीओं के कल्याण के लिए, सच्चे दिल से परमात्मा से प्रार्थना करें । तुम्हारी प्रार्थना प्रभु जरुर सुनेंगे । यह मन से हो सकनेवाली सेवा है । सेवा तन, मन या धन कोई भी रुप से कर सकते हैं ।

दूसरों के हित के लिए जो धन दिया जाता है वह दान है । फिर भी, श्रीकृष्ण भगवान ने ईस बात पर बहुत जोर दिया है कि, बदला मिलने की आशा बिना, जो दान दिया जाए वही सात्विक दान है । गीताजी में कई दफा, फल की आशा के बिना ही कर्म करने पर जोर दिया गया है । दान लेनेवाली व्यक्ति आभार प्रगट करे ईतनी अपेक्षा भी नहीं होनी चाहिये । संपूर्ण निष्काम भाव से, प्रभु की पूजा करने की शुभ भावना के रुप में दान करना चाहिये ।  

श्रेष्ठ दान किसे कहेते हैं ईस विषय में, महाभारत में एक बहुत सुंदर कथा है । यह कथा भावनगर के श्री नानाभाई भट्ट नाम के सज्जन ने, " હિન્દુ ધર્મની આખ્યાયિકાઓ " नाम की उत्तम पुस्तक में लिखी है ।

युधिष्ठिर ने राजसूय यज्ञ किया तब, अच्छे कार्य के लिए काफी धन खर्च किया । श्रीकृष्ण भगवान, महामुनि वेदव्यासजी, पांडवो और कई महानुभावों भोजन करके बातें करते थे तब, आधा सुवर्ण का और आधा नकुल जैसा, एक विचित्र प्राणी को देखा । वह कूडे में लुढकता था । सभी को आश्चर्य हुआ । महर्षि वेदव्यासजी ने मंत्र पढकर उस पर पानी छिडकने से वह चिल्ला उठा – " यह यज्ञ झूठा है, यह यज्ञ झूठा है। "पांडव क्रोधित होकर उसकी हत्या करने जा रहे थे तब, श्रीकृष्ण भगवान ने उन्हें रोका और वजह जानने को कहा । प्राणी ने बात कही  -

" एक ब्राह्मिन परिवार, भिक्षान्न पर जीवन निर्वाह करता था । मिली हुई भिक्षा में से रसोई बना के, भोजन करने के लिए बैठने के वक्त, एक वृध्ध अतिथि आए । वे बहुत भूखे  थे । सारा अन्न उनको देकर परिवार भूखा रहा । ऐसा एक महिना तक हुआ । किसीके मनमें कोई दु:ख न था । भूखे अतिथि को भोजन कराने का परम संतोष  था । आखिर, अतिथि के रुप में आते हुए परमात्मा ने उन्हें दर्शन दिए । अतिथि ने भोजन करके जहां हाथमुंह धुए थे, उस जगह पर हुए कूडे में से पसार होने से मेरा शरीर ऐसा हो गया । उसके बाद मैं कई जगह से गुजरा, लेकिन मेरा आधा शरीर सुवर्ण का नहीं हुआ । यहीं भी नहीं हुआ, ईसी लिए मैंने कहा कि यह यज्ञ झूठा है । खुद भूखे रहकर दूसरों को अन्नदान देनेवाले का सेवायज्ञ ही सच्चा है । "

हमारे पास अमाप धन होने पर भी, उसमें से थोडा धन, दूसरों के लिए खर्च करने के लिए हम हिचकिचाते हैं । हमारे पास कितना धन है, यह बात महत्वपूर्ण नहीं  है । अखूट धन होने पर भी हम दरीद्र हो सकते हैं । मन से कंगाल होना और ज्यादा से ज्यादा धन ईकठ्ठा करने के लिए, बेवजह कोशिष करते रहेना, यह अनुचित है । हमारे पास अखूट धन हो और उसमें से थोडा धन दूसरों के लिए खर्च करें ईसमें भी कोई बडप्पन नहीं है । हमारे दान की बात जानकर कोई हमारी प्रशंसा करे, हमारे नाम की तख्ती कहीं लग जाय, हम श्रीमंत हैं, ऐसी बात समाज में फैल जाय, ईतनी अपेक्षा हमारे मनमें रहेती है । हम मुश्किलें झेलकर, खुद तकलीफ उठाकर, दूसरों का कल्याण करें, ऐसी भावना हमारे मनमें उठती है क्या ? हम भूखे रहकर, किसीको अन्नदान करें, किसी भूखे मानवी को भोजन कराएं, ऐसा कभी सोचते हैं क्या ? श्रीकृष्ण भगवान ने ऐसे दान को ही श्रेष्ठ माना है ।

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