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28. उत्तम जीवन

श्रीकृष्ण भगवान ने अर्जुन को युध्ध करने के लिए उकसाने के लिए ही गीता उपदेश नहीं दिया है । वे युध्ध के हिमायती न थे । युध्ध रोकने के लिए, जितने भी संभव हो वे सभी प्रयत्न करने चाहिये, ऐसा वे मानते थे । ईसी लिए वे, शांतिदूत के रुप में कौरवों को समझाने के लिए, हस्तिनापुर गए थे । मूढ दुर्योधन समझा नहीं, ईसी लिए महाभारत युध्ध अनिवार्य बन गया । सचमुच भीम और द्रौपदी, द्रुपद राजा, (द्रौपदी के पिता), धृष्टद्युम्न (द्रौपदी के भाई), और कई राजाओं युध्ध रोकने के लिए बिल्कुल सहमत न थे, क्योंकि वे हस्तिनापुर की राज्यसभा में द्रौपदी की मानहानि हुई थी उसका बदला लेना चाहते थे । फिर भी श्रीकृष्ण भगवान ने युध्ध रोकने का प्रयत्न  किया ।

उत्तम जीवन के बारे में, अत्यंत रसप्रद और महत्वपूर्ण चर्चा गीताजी में हुई है, यह तो गीताजी पढें, तब ही पता चलेगा । ईसी लिए जिन्होंने गीताजी का अभ्यास किया है, वे विद्वान लोग, यह ग्रंथ को विश्वग्रंथ मानते हैं । " श्रध्धा त्रय विभागयोग " नाम के 17 वे अध्याय में श्लोक नंबर 3, 4, 8, 11, 14 से 19 तक ये सभी बहुत ही उत्तम श्लोक हैं । जीवन को संवारने के लिए खास पढनेलायक है ।

श्रीकृष्ण भगवान ने कहा है कि – " सभी मनुष्यों की श्रध्धा, उनके अंतकरण की शुध्धि के अनुसार होती है । जैसी जिनकी श्रध्धा, वैसे वे होते हैं । सात्विक श्रध्धावाले देवों की पूजा करते हैं, राजसी श्रध्धावाले यक्ष और राक्षसों की पूजा करते हैं और तामसी श्रध्धावाले भूत, प्रेत वगैरह की पूजा करते हैं । "

" आहार भी सभी को, अपनी अपनी प्रकृति अनुसार प्रिय होता है । आयुष्य, सात्विकता, बल, आरोग्य, सुख और रुचि बढानेवाला, रसयुक्त, पौष्टिक और मन को पसंद आनेवाला आहार, सात्विक लोगों को प्रिय होता है । कटु, खट्टा, नमकीन, खूब गरम, बहुत तीखा, सूखा और दाह करनेवाला आहार राजस लोगों को प्रिय होता है । लंबे अरसे से बना हुआ, उतरा हुआ, दुर्गंधयुक्त, बासी, उच्छिष्ट और अपवित्र आहार तामस लोगों को प्रिय होता   है । "

"फल की आकांक्षा नहीं रखनेवाले मनुष्य, कर्तव्य समझकर, विधिपूर्वक जो यज्ञ करते हैं, वह सात्विक यज्ञ है । फल की आकांक्षा ऱख के और दंभ से जो यज्ञ करते हैं वह राजस यज्ञ है । शास्त्रविधि रहित, अन्नदान रहित, मंत्र रहित, दक्षिणा रहित और श्रध्धा रहित, जो यज्ञ करते हैं वह तामस यज्ञ है । "

" देवता, ब्राह्मण, गुरु और ज्ञानीजनों का पूजन, पवित्रता, सरलता, ब्रह्मचर्य और अहिंसा, ( अहिंसा दैवी संपत्ति के लक्षण में एक है ) ये सब शारीरिक तप कहेलाते हैं । किसीको उद्वेग न करनेवाली, सत्य, प्रिय, हितकारक वाणी बोलना और सद्ग्रंथों का पठन करना, ये सब वाणी का तप कहेलाता है, मन की प्रसन्नता, सौम्यभाव, मौन, आत्मसंयम और भावनाशुध्धि को मन का तप कहेते है । "

" ईस प्रकार का तप, जब परम श्रध्धा से, फल की आकांक्षा के बिना किया जाता है, तब ईसे सात्विक तप कहेते हैं । किसीके सत्कार, खुशामत अथवा पूजा के लिए जो तप होता है वह क्षणिक और अनिश्चित फल देनेवाला होता है, ईसे राजस तप कहेते हैं । जो मूढता से, हठपूर्वक, मन, वाणी और शरीर को कष्ट देके, दूसरों का अनिष्ट करने के हेतु से, जो तप किया जाता है, ईसे तामस तप कहेते हैं । "

उपरोक्त तमाम बातें बहुत सरल है, फिर भी कुछ समझ में न आए तो, उसकी माथापच्ची किए बिना, जितना समझ सकें उतना आचरण करें तो भी जीवन धन्य हो   जाए । जीवन को उत्तम एवम् उज्वल बनाने के लिए, उपरोक्त तमाम बातें कितनी महत्वपूर्ण है, वह समझाने की जरुरत नहीं है । ओर ये स्वयं श्रीकृष्ण भगवान ने कही है, ईसी लिए ईसका महत्व सविशेष बढ जाता है । हमारे परंपरागत जीवन से हम संतुष्ट हैं, या हम हमारे जीवन को अधिक उज्वल बनाना चाहते हैं, यही सोचने की जरुरत है । अगर अधिक उज्वल बनाना हैं तो, गीताजी को कंठस्थ किए बिना, परमात्मा ने जो कही है उन बातों को जीवन में उतारें । गीताजी को सिर्फ कंठस्थ करने से कोई लाभ नहीं होगा।

धन से बहुत कुछ खरीद सकते हैं, लेकिन उत्तम संस्कार बाजार में नहीं बिकते । ईसके लिए मार्गदर्शन करनेवाली पुस्तकें बाजार में बिकती है, लेकिन संस्कार न मिले । हमारे जन्म के बाद तो ठीक, लेकिन जन्म के पहेले भी माता, उत्तम संस्कार दे सकती   है । भक्त प्रह्लाद की माता गर्भवती थी तब, संयोगवशात् उन्हें देवर्षि नारदजी के आश्रम में रहेना पडा । आश्रम के पवित्र और भक्तिमय वातावरण की अद्भूत असर से, असुरकुल में जन्म होने के बावजुद प्रह्लादजी परमात्मा के परम भक्त हुए।

श्रीकृष्ण भगवान की बहन सुभद्राजी को गर्भावस्था दरम्यान बहुत वेदना होती थी । उनका मन बहेलाने के लिए श्रीकृष्ण भगवान ने, युध्ध दौरान चक्रव्युह तोडने की अटपटी बातें कहेना शुरु किया । सुभद्राजी को नींद आ जाने से चक्रव्युह की बात अधूरी रह गई । गर्भावस्था में सुनी हुई बातों के आधार पर, अभिमन्यु ने महाभारत के युध्ध दौरान चक्रव्युह तोडने की कोशिष की । लेकिन अपूर्ण ज्ञान की वजह से उसे सफलता न मिली, और उसकी मृत्यु हो गई ।

ये सब तो पुराणों की बात हुई, लेकिन कहेते हैं कि, छत्रपति शिवाजी महाराज की माता जीजाबाई गर्भावस्था दरम्यान, रामायण, भागवत ईत्यादि धर्मग्रंथो का पठन करती थीं । ईसी लिए छत्रपति शिवाजी महाराज में, जन्म से पहेले ही, धर्म का रक्षण करने की तीव्र ईच्छाशक्ति जागृत हो गई थी ।
 

" પેટમાં પોઢીને સાંભળેલી બાળે, રામ-લક્ષ્મણની વાત,

માતાજીને મુખ જે દિથી, ઉડી એની ઉંઘ તે દિથી.... "

जिसके वाणी और वर्तन की ईतनी गहेरी असर, गर्भावस्था में माने, जन्म के पहेले होती हो, वह माता को अपने बच्चे को सुसंस्कारी बनाने के लिए, कितनी बडी जहेमत उठानी चाहिये । ऐसी ही जिम्मेदारी पिता और शिक्षकों की भी होती है ।

बचपन में मिले हुए संस्कार और वातावरण बच्चे के जीवन को संवारता है । जिस घर में परस्पर सद्भाव न हो, गालीगलौच होता हो, मारपीट होती हो, उस घर में बच्चे भी ऐसा सीखते हैं । माता पिता बच्चों के प्रति उदासीन हो, वे उन्हें संस्कारी न बनाएं, विद्यालय में शिक्षकों, विद्यार्थीओं के प्रति उदासीन हों, विद्यार्थीओं को पढाने के बजाय ट्युशन में ज्यादा रस हो, ये सभी छोटी छोटी बातें बच्चों के भावि जीवन पर गंभीर असर करती है । आझादी पहेले, मौजशोख के साधन कम थे । शिक्षको कर्तव्यनिष्ठ और संतोषी थे । लोगों में देशभक्ति थी । लेकिन आज आझादी के बाद, मौजशोख के साधन बढ गए हैं, धन के पीछे अंधी दौट की वजह से शिक्षण निम्नस्तर का हो गया । शिक्षक खुद ईम्तिहान में चोरी करने के लिए मदद करे,  धन के आधार पर, या लागवग के जोर पर पेपर्स में मार्कस मिल सकते हैं । जो डोनेशन दे सके, उसे एडमीशन मिले ऐसी कुप्रथा शुरु हुई । तेजस्वी विद्यार्थी शिक्षण से वंचित रहे और जिसको पढना नहीं है, उसको धन के आधार पर मौका मिले, क्या यह न्याय है ? हम सभी ने संस्कार के बजाय धन को ही अति महत्व दिया है, ईसका यह नतीजा है । ये सभी दूषणों के लिए हम खुद जिम्मेदार  हैं । अन्य किसीको दोष देने की जरुरत नहीं है । 

श्रीकृष्ण भगवान ने कही हुई, जीवन को उत्तम और उन्नत बनाने की रीत, अगर मातापिता और शिक्षक गण, शुभनिष्ठा से आचार में लाएं तो, बच्चों को सुसंस्कारी बना   सकें । समाज को स्वच्छ बनाने के लिए यह बहुत जरुरी है । ईसमें कोई खर्च करने की आवश्यकता नहीं है । किसीको दु:ख हो ऐसा नहीं बोलना चाहिये । किसीका अपमान हो ऐसी मजाक मश्करी नहीं करनी चाहिये । सदैव आनंद में रहेना । कभी निराश न होना । मुश्केली में भी हिम्मत नहीं हारना । छोटी छोटी बातों में भी दूसरों की सहायता करना । दूसरों को तकलीफ हो ऐसा कुछ नहीं करना चाहिये । क्या हम ईतना भी नहीं कर   सकते ? जीवन में बार बार कांटा चूभने की शिकायत करने की बजाय, परमात्मा के दिखाए हुए, फुल आच्छादित मार्ग पर चलें तो, जीवन फुलों की सुगंध से महक उठे ।

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