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श्रीकृष्ण भगवान ने गीताजी के 15 वे अध्याय ' पुरषोत्तमयोग ' में संसार की, उल्टे पीपल के वृक्ष के साथ तुलना करके कहा – " यह पीपल वृक्ष के मूल उपर है और शाखाए नीचे है । वेदसूक्तो उसके पत्ते हैं । ऐसा कहेने की वजह ये है कि संसार की उत्पत्ति परमात्मा से होने से जीवनसत्व खींचनेवाले मूल उपर की ओर है । यह संसार वृक्ष को परमात्मा ने ही उत्पन्न किया है, फिर भी उसे द्रढ वैराग्यरुप कुल्हाडी से काट डालने की सलाह भी परमात्मा ने ही दी है । तत् पश्चात् ऐसे पद की खोज करनी चाहिये, जहां जानेवाले जीव, जन्म मृत्युरुप संसार में वापस नहीं लौटते । वह परम पद प्राप्त करने के लिए उसे, पूर्ण पुरुषोत्तम परमात्मा की शरण में जाना चाहिये ।
हमारे जन्म के पहेले यह जगत हमारे लिए अद्रश्य था । जन्म के बाद, कुछ समय तक ही वह दिखाई देता है, हमारी मृत्यु के बाद, यह जगत का अस्तित्व होने पर भी, हमारे लिए तो वह, अद्रश्य ही हो जाएगा । संत श्री कबीरजी ने बहुत सुंदर बात कही कि "आप मुआ पीछे, डूब गई दुनीया ।" कुछ लोग, अल्प जीवन की वजह से, जितनी मौजमस्ती लूट सके ईतनी लूट लेने की, विचारधारा वाले होते हैं । कदाचित खुद की मौजमस्ती के लिए, दुसरों को नुकशान हो तो भी कोई एतराज नहीं, ऐसी स्वार्थी वृत्तिवाले होते हैं । एक भाई ने तो कहा – ' ऋणं कृत्वा घृतं पीबेत । ' माने कर्ज करके भी घी पी लेना । यह स्वार्थी वृत्ति है । परमात्मा स्वयं, निष्काम कर्म के उपदेशक हैं, ईसी लिए ऐसी स्वार्थी वृत्ति को उनका अनुमोदन नहीं है, यह तो स्पष्ट है । कुछ विचारवंत सज्जन, अल्प जीवन को सिर्फ मौजमस्ती में गंवा देने के बजाय, उसे अमूल्य मौका समझकर, प्रभुमय जींदगी बसर करके, परम पद प्राप्त करने की कोशिष करते हैं । किसीको पथ्थर में रस होता है, किसीको बहुमूल्य रत्न में रस होता है, ईसी लिए किसीकी निंदा करना उचित नहीं है । फिर भी श्री अखा भक्त ने कहा – " મૂકી હીરો, ઉપાડ્યો પહાણ. "
एक दफा, श्री जनक राजा ने, वे स्वयं दरीद्र भिक्षुक है, ऐसा स्वप्न में देखा । वे तो राजा थे फिर ऐसा स्वप्न क्युं आया ? ऐसा सोचकर उन्होंने गुरु श्री अष्टावक्रजी से पूछा – " यह सच है या वह सच है ? " संपूर्ण बात सुनकर गुरुजी ने उत्तर दिया । " यह भी सच है, वह भी सच है । यह भी गलत है, वह भी गलत है । " सविस्तर चर्चा करते करते गुरुजी ने समझाया – " आप राजा हैं, यह सब जानते हैं, ईस लिए यह सच है । और स्वप्न में आप दरीद्र भिक्षुक हैं, यह स्वयं आपने देखा है, ईस लिए वह भी सच है । ईस तरह दोनों बातें सच है । "
" आप के जन्म के पहेले आप राजा न थे । मृत्यु के बाद भी आप राजा नहीं होंगे । ईस लिए आप राजा हैं यह बात गलत है । ईसी तरह स्वप्न के पहेले आप भिक्षुक न थे, स्वप्न के बाद भी भिक्षुक नहीं है । ईस लिए आप भिक्षुक हैं वह बात भी गलत है । ईस तरह दोनों बातें गलत है । " जैसे स्वप्न सच न होने पर भी, रात्रि मे निद्रा दरम्यान हमें सच लगता है । वैसे ही यह जगत सच न होने पर भी जीवन दरम्यान हमें सच लगता है । ईसी लिए ही संसार को असार, नाशवंत और भ्रमरुप कहा है । यह सच्चा लगता है, लेकिन सच्चा नहीं है ।
संसार असार है यह बात सच है, ईसी लिए सर पर हाथ ऱखकर विषादमय रहेने की जरुरत नहीं है । आनंद का त्याग करके विषादमय जीवन जीने का कोई मतलब नहीं है । मौजमस्ती, आनंद प्रमोद, भोगविलास, सबकुछ छोडकर संन्यासी हो जाना, यह तो जीवन से पलायन होने की बात हुई । जीवन में आनंद का स्थान महत्वपूर्ण है । सदैव आनंद में रहेना, यह तो अति उत्तम है । सिर्फ हमें ईतना खयाल रखना चाहिये कि हमारे आनंद के लिए किसीको भी तकलीफ न दें । ऐसे आनंद को आनंद ही नहीं कहा जा सकता । हो सके तो दूसरों के जीवन में भी आनंद हो ऐसे कार्य हमें करने चाहिये । अगर हम किसीके आंसु पोंछ सकें तो यह उत्तम है, अगर यह न कर सकें तो भी किसीको हम परेशान न करें, ईतना काफी है । यह हमें नहीं भूलना चाहिये ।
प्रामाणिक रुप से हम जो कुछ धन प्राप्त करें यह, हमारे निजी स्वार्थ को ध्यान में रखकर, सिर्फ हमारे परिवार के लिए ही खर्च करें, ईसमें कोई बुराई नहीं है । लेकिन निजी स्वार्थ के लिए हम अप्रमाणिक बनें, अपने भोगविलास के लिए, दूसरों को परेशान करके रिश्वत मांगें, न मिलने पर काम न करें, ये सब अनुचित है । नियमों का गेरलाभ उठा के, झुठे बील बनाकर, अपनी ओफिस से रकम प्राप्त करें, अगर हमें खरीदने की सत्ता हो तो, बीनजरुरी चीजें खरीद कर, व्यापारी से कमीशन लें । अगर हमें कोन्ट्रेक्ट देने की सत्ता हो तो, हमारे निजी संबंधी को, उसके भाव ज्यादा होने पर भी, उसको लाभ हो, और हमें भी लाभ हो, ईसी वजह से उसे कोन्ट्रेक्ट दें । काम की गुणवत्ता चैक किए बिना, बील पास कर दें । ऐसे कई अनैतिक ढंग से हमारी संस्था को, समाज को और देश को नुकशान करें । ईतना ही नहीं लेकिन हम कितने होशियार हैं, ईसका अभिमान भी रखते हैं ।
संसार की असारता जिन्होंने अच्छे रुपसे जान ली है, वे भोगविलास में समय गंवाने के बजाय, परमात्मा के शरण में जाकर, परमात्मा के परम धाम को पाने की कोशिष करते हैं । - क्षर माने नाशवंत शरीर, अक्षर माने अमर अविनाशी आत्मा और आत्माओं में श्रेष्ठ माने पुरुषोत्तम परमात्मा, - यह बात ईस अध्याय नंबर 15 में समझाई है । उनका परमधाम कैसा होगा ? वह परम धाम ईतना अति उज्वल है कि सूर्य, चन्द्र और अग्नि का प्रकाश भी ईसे प्रकाशित नहीं कर सकता । परमात्मा ने कहा है कि – " सूर्य, चन्द्र और
अग्नि में जो तेज है, वह मेरा है । मैं तो ईससे भी ज्यादा प्रकाशित हूं । जो मेरे परमधाम को प्राप्त करते हैं, वे वहां से वापस कभी नहीं लौटते । " माने कि उनका जन्म मृत्यु का चक्कर नहीं रहेता ।
परमात्मा के अस्तित्व को मानना या न मानना, यह हर आदमी की अंगत श्रध्धा पर निर्भर है । पूर्वजन्म या पुनर्जन्म में भी हम मानें या न मानें, कोई एतराज नहीं । मृत्यु के उस पार क्या है ? वह तो कोई जानता नहीं । दूसरों के कल्याण की हमारी जिम्मेदारी नहीं है, ऐसा मानने में भी कोई एतराज नहीं । लेकिन सिर्फ अपने कल्याण की बात तो सोचने लायक है कि नहीं ?
क्रोध से हम दूसरों को नुकशान पहुंचाते हैं, या स्वयं अपने को ? किसी पर क्रोध करने से उसे हम पर क्रोध आएगा । धिक्कार होगा । ईतना ही नहीं, लेकिन हम बारबार क्रोध करें तो, हमें भी बडा नुकशान होगा । सतत टेन्शन की वजह से गंभीर रोग हो सकता है । हाईपर टेन्शन माने हाई ब्लड प्रेशर, हो सकता है । कभी हृदयरोग भी हो सकता है । कभी हार्ट फेईल भी हो सकता है । हाई ब्लड प्रेशर से लकवा या एसीडीटी हो सकती है । अगर हम क्रोध को काबूमें रख्खें तो भी ईन सभी दर्दों से बच सकते हैं ।
जब तक हमारे शत्रु का अहित नहीं होता हमें चैन नहीं मिलता । लेकिन किसीका अहित सोचने से उसका अहित नहीं होता । फिर बेकार सोचने से क्या फायदा ? यह द्वेष हमें ही नुकशान पहुंचाता है । ईसी लिए किसीका बुरा मत सोचो । जीवन निर्वाह के लिए और भावि जीवन के लिए भी थोडा धन संचय जरुरी है । आकस्मिक प्रसंग पर थोडा धन संचय उपयोगी होता है । लेकिन जिनके पास बहुत धन होने पर भी, जो लोग और धन संग्रह के लिए करोडों रुपये का कौभांड करते हैं, ईन्हें जेल के सलाखे गिनने पडते हैं । या तो ऐसी सजा से बचने के लिए सतत टेन्शन में ही जिना पडता है । ईस तरह जीवन की शांति छीन जाती है । धन की अति लालसा अच्छी नहीं ।
हमें नुकशान करनेवाले परिबलों से बचना हो तो मनकी शांति बहुत ही जरुरी है । अध्यात्म मार्ग हमें राह दिखाता है । ईस राह पर चलना या नहीं चलना, यह तो खुद हमें ही तय करना पडेगा । गीताजी का अभ्यास ईस द्रष्टि से बहुत महत्वपूर्ण है ।