ઓનલાઇન / અન્ય રીતે લવાજમ ભરવા માટે...

CyberSafar Edumedia Store

24. भक्तियोग – 2

श्रीकृष्ण भगवान ने गीताजी के 1212 वें अध्याय में श्रेष्ठ भक्त के बारे में बहुत ही सरल शब्दों में समझाया है । यही बात परम भक्त श्री नरसिंह महेता ने " વૈષ્ણવ જન તો તેને રે કહીએ, જે પીડ પરાઈ જાણે રે ..." भजन द्वारा समझाई है । यह भक्तियोग की बात पर हम सविशेष चिंतन करें । भक्ति से मोक्ष मिलता है । मोक्ष माने मुक्ति । तो यह मोक्ष पाने के लिए क्या करना चाहिये ? कर्मफल की अपेक्षा से छूटना और ज्ञान के अहंकार से छूटना, माने मुक्ति । यही भक्ति है ।

कर्मयोग माने कर्म करना अनिवार्य है, लेकिन कर्मफल की आकांक्षा से छूटना, बहुत जरुरी है । निष्काम कर्म पर तो परमात्मा ने बहुत जोर दिया है । जीवन में छोटी मोटी ईच्छाएं ही दु:ख का मूल है । हम किराये के मकान में रहेते हों तब, स्वाभाविक रुप से, अपना निजी मकान हो तो बहुत अच्छा ऐसी आशा जन्म लेती है । अगर नया मकान खरीदने की हमारी क्षमता न हो तो, यह आशा बिना वजह बोज बन जायेगी । जो संभव नहीं है, उसकी व्यर्थ चिंता करना, उचित नहीं है । ऐसी आशा को छोड दें तो, चिंता में से मुक्ति मिल जाए । कार लेने को जी चाहे पर ले न शकें तो, यह व्यर्थ आशा हमें सतत परेशान करेगी । पत्नी या पुत्रवधू के मायके से दहेज के रुप में धन प्राप्त करने की ईच्छा जागृत हो, अगर यह संतुष्ट न हो सके तो, पत्नी या पुत्रवधू को शारीरिक हानि पहुंचाने की ईच्छा जागृत होती है । कभी वह निर्दोष कन्या को, अपनी धनभूख मिटाने के लिए, जला देने का कुविचार जन्म लेता है । धनलालसा का अति भयानक कुरुप के बारे में कुछ सोचे समझे बिना हत्या करने के बाद, जो प्रश्न सामने आते हैं, उससे हमारी नींद चली जाती है । यह धनलालसा का ही त्याग कर दें तो ?

परमात्मा ने तो कहा ही है कि मन में से उठनेवाली छोटी मोटी संपूर्ण ईच्छाओं का त्याग ही हितावह है । ईच्छा जागृत हो और पूरी न हो पाए, तभी दु:ख होता है ना ? कोई हमारी प्रशंसा करे, ऐसी ईच्छा मन में जागृत हो, लेकिन किसी वजह से कोई हमारी प्रशंसा न करे तो, हमें बुरा लगता है, अपमान लगता है । अगर मान की ईच्छा का त्याग करें तो, अपमान का सवाल ही नहीं उठता । ईसी तरह, मान-अपमान, जय-पराजय ये सभी मन की ईच्छाओं की वजह से ही उत्पन्न होनेवाली भावनाएं हैं । एक बार मन की ईच्छाओं पर काबू पा सकें तो कई प्रश्नों का समाधान हो सकता है । मन की परम शांति का अनुभव कर सकते हैं । परमात्मा ने कर्मत्याग करने का नहीं, लेकिन कर्मफलत्याग करने को कहा है ।

ज्ञान के लिए तो खुद श्रीकृष्ण भगवान ने ही कहा है – " ज्ञान जैसा पवित्र कुछ ही नहीं । "  चाहिये । वरना कर्म और ज्ञान दोनों बोज बन जाएंगे । ज्ञानी होना बहुत अच्छा है, लेकिन वह ज्ञान संपूर्ण अहंकाररहित होना, सविशेष आवश्यक है । कर्मत्याग नहीं करना है, उसी भांति ज्ञान का त्याग नहीं करना है, सिर्फ ज्ञान के अहंकार का त्याग करना है । एक कवि ने बहुत सुंदर पंक्तियां लिखी है – (गीता 4 -38) जैसे कर्म कामनारहित होना चाहिये, वैसे ज्ञान अहंकाररहित होना

" મારા જ્ઞાન ગુમાનની ગાંસડી, ઉતરાવો શિરેથી આજ,

મારાં પુસ્તક પોથાંની પોટલી, ઉતરાવો શિરેથી આજ,

બોજો ખેંચી ખેંચી માથું ફાટે છે ને, કાયામાં કળતર થાય,

હાંફી હાંફી મારું હૈયું થાક્યું છે ને, આંખે અંધારાં ઘેરાય ..."

ईस तरह कर्मयोग और ज्ञानयोग से विमुख नहीं होना है । लेकिन वे बोज न बन जाय यह खयाल रखना है । मैं ज्ञानी हूं, दूसरों की तुलना में मैं कुछ विशेष हूं, ऐसा मिथ्याभिमान हमारे मन में न आ जाए ईतनी सतर्कता बहुत महत्वपूर्ण है । आम्रवृक्ष में जैसे जैसे आम बढती जाए, वैसे वैसे वह विशेष रुप से ढलता है । विनम्रता भक्ति की पहेली निशानी है ।

एक सज्जन किसी संत को मिलने गए । संत की कुटिर का द्वार बंद था । उन्होंने द्वार को ठोकर मार के खोल दिया । पांव में से चप्पल ज्यों त्यों निकालकर वे संत के पास आए । संत ने आने की वजह पूछने से सज्जन ने कहा – " मैं आप से भक्ति के बारे में शिक्षा पाने आया हूं । आप मुझे उपदेश दें । " संत ने कहा – " मैं भक्ति के बारे में आप को उपदेश दूंगा, लेकिन पहेले आप को द्वार की क्षमा याचना करनी होगी । " द्वार की क्षमा याचना क्यों ? यह बात समझ में न आने से संत ने कहा – " आप ने द्वार को ठोकर लगायी, यह अच्छा नहीं हुआ । द्वार तो बहुत उपकारक है । द्वार हमें ठंड से, धूप से और बारिश से बचाता है । उसके साथ हमारा अनुचित वर्तन ठीक नहीं, ईसी वजह से आप द्वार के पास जाकर, हाथ जोडकर, क्षमायाचना करें, तत्पश्चात्, हम भक्ति के बारेबारे में बात करेंगे । "

अहंकार की वजह से सज्जन को संत की बात पसंद नहीं आयी, फिर भी संत की सूचना के अनुसार उन्होंने द्वार से क्षमायाचना की ।  फिर संत को भक्ति के बारे में उपदेश देने की बिनती करने से, संत ने अब चप्पल से क्षमायाचना करने को कहा । सज्जन दिग्मूढ हो  गए । संत ने शांति से समझाया । परमात्मा सजीव या निर्जीव सभी में समान रुप से व्याप्त हैं । सजीव या निर्जीव चीज हमें उपकारक हो या न हो, फिर भी, किसीसे भी, हमारा वर्तन थोडा सा भी, अपमानजनक नहीं होना चाहिये । चप्पल निर्जीव है फिर भी वह बहुत उपकारक है । हमारे पैरों को कंकर, कंटक से बचाते हैं, ईसकी ही बदौलत हम गर्म रास्ते पर चल सकते हैं । पांव में से चप्पल दूर करें तब भी, उसे संभल के दूर करना चाहिये ।    

तिरस्कार का आभास नहीं होना चाहिये । बात की गहराई समझने से सज्जन चप्पल के पास गए । अपने अविवेक बदल, खूब विनम्र होकर उन्होंने चप्पल से क्षमायाचना की । लौटकर संत के पास आए और विनम्रता के साथ भक्ति के बारे में उपदेश देनेदेने को संत को बिनती की । संत ने हंसते हंसते कहा – " आप को तो भक्ति आती ही है । जो मानवी द्वार या चप्पल जैसी निर्जीव चीज से, अपने अविवेक बदल क्षमायाचना करे वह, सामान्य मानवी नहीं हो सकता । वह संत ही हो सकता है । आप को अब भक्ति के उपदेश की कोई जरुरत नहीं है । मेरे कहेने पर भी आपने अक्कड रहेकर, क्षमायाचना न की होती, तभी आप को उपदेश देने की आवश्यकता रहेती । "

हमहम से किसीको भी असुविधा न हो ईतना खयाल रख्खें । फिर भी कभी, किसी प्रकार की गलती हो जाय तो, निसंकोच विनम्रता के साथ क्षमा याचना करनी चाहिये । क्षमा मांगने से कोई छोटा नहीं हो जाता । विशाल दिलवाले मानवी ही क्षमा मांग सकता है । ईतना ही नहीं, लेकिन क्षमा मांगने से हमारा अहंकार टूटता है । परमात्मा सभी में व्याप्त   हैं । ईसी लिए हमारा व्यवहार सभी के साथ सौजन्य पूर्ण हो, हम किसीका अपमान न करें, किसीको हम से किसी प्रकार का दु:ख न हो, यह बहुत महत्वपूर्ण है । अपने परिवार के हर सदस्य के साथ, सौजन्यपूर्ण व्यवहार से, अपने घर में कितनी शांति बनी रहेती है, वह खुद महसूस करें । हमारी गलती से परिवार के किसी छोटे सदस्य का भी अपमान हो जाए तो हमें तुरन्त क्षमा मांग लेनी चाहिये । मैं बडा हूं, मैं क्षमा कैसे मांग सकता हूं ? ऐसा कभी न सोचना । क्षमा मांगने से हमारा अहंकार टूटता है । यह बहुत जरुरी है ।

हमें पता चलेगा कि कर्मफल की आशा का त्याग करने से और ज्ञान के अहंकार का त्याग करने से हम मुक्ति पा सकते हैं । ऐसे ही, क्रोध, वासना, लोभ, लालसा, मृत्यु का भय ईत्यादि से छूटकारा पाने से भक्ति प्रगट होती है । जैसे जैसे एक एक से मुक्त होते जाएंगे, हमारा बोज कम होता जाएगा । सभी अवगुनों से मुक्ति पाने से भक्ति अपने आप बढती जाएगी । हमें अपना अहंकार छोडकर विनम्र बनना चाहिये, यही भक्तिमार्ग है । विनम्रता से भक्ति बढती है । हमें और कोई विशेष प्रयत्न करने की आवश्यकता नहीं  है । परमात्मा की कृपा ही हमारा मार्ग सरल बना देगी ।

सुप्रसिध्ध संत श्री रणछोडदासजी महाराज ने कहा है – " मछली जल बिन जी नहीं सकती, जल बिन वह छटपटा के मर जायेगी । ऐसी तीव्र झंखना, प्रभु प्राप्ति के लिएलिये जागे तो, प्रभु दर्शन असंभवित नहीं है । यही भक्ति है । "

Share with friends

Comments
Add New Search
+/-
Write comment
Name:
Email:
 
Website:
Title:
 

3.26 Copyright (C) 2008 Compojoom.com / Copyright (C) 2007 Alain Georgette / Copyright (C) 2006 Frantisek Hliva. All rights reserved."

 

ગમતાંનો ગુલાલ!

સાયબરસફર તમને ગમે છે? તો એની ભલામણ કરો મિત્રો અને સ્વજનોને. ટેલ-એ-ફ્રેન્ડ સર્વિસની મદદથી તમે તમારા વિવિધ ઇમેઇલ, બ્લોગ કે સોશિયલ નેટવર્કિંગ સાઇટના યુઝરનેમ, પાસવર્ડથી લોગ-ઇન થઈને તમારા કોન્ટેક્ટ લિસ્ટના અન્ય મિત્રોને સાયબરસફર વિશે જણાવી શકો છો.

SocialTwist Tell-a-Friend

પણ ગમશે