कर्मयोग माने कर्म करना अनिवार्य है, लेकिन कर्मफल की आकांक्षा से छूटना, बहुत जरुरी है । निष्काम कर्म पर तो परमात्मा ने बहुत जोर दिया है । जीवन में छोटी मोटी ईच्छाएं ही दु:ख का मूल है । हम किराये के मकान में रहेते हों तब, स्वाभाविक रुप से, अपना निजी मकान हो तो बहुत अच्छा ऐसी आशा जन्म लेती है । अगर नया मकान खरीदने की हमारी क्षमता न हो तो, यह आशा बिना वजह बोज बन जायेगी । जो संभव नहीं है, उसकी व्यर्थ चिंता करना, उचित नहीं है । ऐसी आशा को छोड दें तो, चिंता में से मुक्ति मिल जाए । कार लेने को जी चाहे पर ले न शकें तो, यह व्यर्थ आशा हमें सतत परेशान करेगी । पत्नी या पुत्रवधू के मायके से दहेज के रुप में धन प्राप्त करने की ईच्छा जागृत हो, अगर यह संतुष्ट न हो सके तो, पत्नी या पुत्रवधू को शारीरिक हानि पहुंचाने की ईच्छा जागृत होती है । कभी वह निर्दोष कन्या को, अपनी धनभूख मिटाने के लिए, जला देने का कुविचार जन्म लेता है । धनलालसा का अति भयानक कुरुप के बारे में कुछ सोचे समझे बिना हत्या करने के बाद, जो प्रश्न सामने आते हैं, उससे हमारी नींद चली जाती है । यह धनलालसा का ही त्याग कर दें तो ?
परमात्मा ने तो कहा ही है कि मन में से उठनेवाली छोटी मोटी संपूर्ण ईच्छाओं का त्याग ही हितावह है । ईच्छा जागृत हो और पूरी न हो पाए, तभी दु:ख होता है ना ? कोई हमारी प्रशंसा करे, ऐसी ईच्छा मन में जागृत हो, लेकिन किसी वजह से कोई हमारी प्रशंसा न करे तो, हमें बुरा लगता है, अपमान लगता है । अगर मान की ईच्छा का त्याग करें तो, अपमान का सवाल ही नहीं उठता । ईसी तरह, मान-अपमान, जय-पराजय ये सभी मन की ईच्छाओं की वजह से ही उत्पन्न होनेवाली भावनाएं हैं । एक बार मन की ईच्छाओं पर काबू पा सकें तो कई प्रश्नों का समाधान हो सकता है । मन की परम शांति का अनुभव कर सकते हैं । परमात्मा ने कर्मत्याग करने का नहीं, लेकिन कर्मफलत्याग करने को कहा है ।
" મારા જ્ઞાન ગુમાનની ગાંસડી, ઉતરાવો શિરેથી આજ,
મારાં પુસ્તક પોથાંની પોટલી, ઉતરાવો શિરેથી આજ,
બોજો ખેંચી ખેંચી માથું ફાટે છે ને, કાયામાં કળતર થાય,
હાંફી હાંફી મારું હૈયું થાક્યું છે ને, આંખે અંધારાં ઘેરાય ..."
ईस तरह कर्मयोग और ज्ञानयोग से विमुख नहीं होना है । लेकिन वे बोज न बन जाय यह खयाल रखना है । मैं ज्ञानी हूं, दूसरों की तुलना में मैं कुछ विशेष हूं, ऐसा मिथ्याभिमान हमारे मन में न आ जाए ईतनी सतर्कता बहुत महत्वपूर्ण है । आम्रवृक्ष में जैसे जैसे आम बढती जाए, वैसे वैसे वह विशेष रुप से ढलता है । विनम्रता भक्ति की पहेली निशानी है ।
एक सज्जन किसी संत को मिलने गए । संत की कुटिर का द्वार बंद था । उन्होंने द्वार को ठोकर मार के खोल दिया । पांव में से चप्पल ज्यों त्यों निकालकर वे संत के पास आए । संत ने आने की वजह पूछने से सज्जन ने कहा – " मैं आप से भक्ति के बारे में शिक्षा पाने आया हूं । आप मुझे उपदेश दें । " संत ने कहा – " मैं भक्ति के बारे में आप को उपदेश दूंगा, लेकिन पहेले आप को द्वार की क्षमा याचना करनी होगी । " द्वार की क्षमा याचना क्यों ? यह बात समझ में न आने से संत ने कहा – " आप ने द्वार को ठोकर लगायी, यह अच्छा नहीं हुआ । द्वार तो बहुत उपकारक है । द्वार हमें ठंड से, धूप से और बारिश से बचाता है । उसके साथ हमारा अनुचित वर्तन ठीक नहीं, ईसी वजह से आप द्वार के पास जाकर, हाथ जोडकर, क्षमायाचना करें, तत्पश्चात्, हम भक्ति के बारेबारे में बात करेंगे । "
अहंकार की वजह से सज्जन को संत की बात पसंद नहीं आयी, फिर भी संत की सूचना के अनुसार उन्होंने द्वार से क्षमायाचना की । फिर संत को भक्ति के बारे में उपदेश देने की बिनती करने से, संत ने अब चप्पल से क्षमायाचना करने को कहा । सज्जन दिग्मूढ हो गए । संत ने शांति से समझाया । परमात्मा सजीव या निर्जीव सभी में समान रुप से व्याप्त हैं । सजीव या निर्जीव चीज हमें उपकारक हो या न हो, फिर भी, किसीसे भी, हमारा वर्तन थोडा सा भी, अपमानजनक नहीं होना चाहिये । चप्पल निर्जीव है फिर भी वह बहुत उपकारक है । हमारे पैरों को कंकर, कंटक से बचाते हैं, ईसकी ही बदौलत हम गर्म रास्ते पर चल सकते हैं । पांव में से चप्पल दूर करें तब भी, उसे संभल के दूर करना चाहिये ।
हमहम से किसीको भी असुविधा न हो ईतना खयाल रख्खें । फिर भी कभी, किसी प्रकार की गलती हो जाय तो, निसंकोच विनम्रता के साथ क्षमा याचना करनी चाहिये । क्षमा मांगने से कोई छोटा नहीं हो जाता । विशाल दिलवाले मानवी ही क्षमा मांग सकता है । ईतना ही नहीं, लेकिन क्षमा मांगने से हमारा अहंकार टूटता है । परमात्मा सभी में व्याप्त हैं । ईसी लिए हमारा व्यवहार सभी के साथ सौजन्य पूर्ण हो, हम किसीका अपमान न करें, किसीको हम से किसी प्रकार का दु:ख न हो, यह बहुत महत्वपूर्ण है । अपने परिवार के हर सदस्य के साथ, सौजन्यपूर्ण व्यवहार से, अपने घर में कितनी शांति बनी रहेती है, वह खुद महसूस करें । हमारी गलती से परिवार के किसी छोटे सदस्य का भी अपमान हो जाए तो हमें तुरन्त क्षमा मांग लेनी चाहिये । मैं बडा हूं, मैं क्षमा कैसे मांग सकता हूं ? ऐसा कभी न सोचना । क्षमा मांगने से हमारा अहंकार टूटता है । यह बहुत जरुरी है ।
हमें पता चलेगा कि कर्मफल की आशा का त्याग करने से और ज्ञान के अहंकार का त्याग करने से हम मुक्ति पा सकते हैं । ऐसे ही, क्रोध, वासना, लोभ, लालसा, मृत्यु का भय ईत्यादि से छूटकारा पाने से भक्ति प्रगट होती है । जैसे जैसे एक एक से मुक्त होते जाएंगे, हमारा बोज कम होता जाएगा । सभी अवगुनों से मुक्ति पाने से भक्ति अपने आप बढती जाएगी । हमें अपना अहंकार छोडकर विनम्र बनना चाहिये, यही भक्तिमार्ग है । विनम्रता से भक्ति बढती है । हमें और कोई विशेष प्रयत्न करने की आवश्यकता नहीं है । परमात्मा की कृपा ही हमारा मार्ग सरल बना देगी ।
सुप्रसिध्ध संत श्री रणछोडदासजी महाराज ने कहा है – " मछली जल बिन जी नहीं सकती, जल बिन वह छटपटा के मर जायेगी । ऐसी तीव्र झंखना, प्रभु प्राप्ति के लिएलिये जागे तो, प्रभु दर्शन असंभवित नहीं है । यही भक्ति है । "
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