श्रीकृष्ण भगवान ने गीताजी में तीन योग को बहुत महत्व दिया है । ईनमें से भक्तियोग एक है । गीताजी के 12 वें अध्याय में श्रीकृष्ण भगवान ने, उनको कैसा भक्त प्रिय है ? यह बात बहुत सुंदर और सरल रुप से समझाई है ।
" जो प्राणी मात्र का द्वेष नहीं करता, जो सभीसभी से मित्र भाव से पेश आता है, जो दयालु, ममतारहित, अहंकाररहित, सुखदु:ख को समान माननेवाला, क्षमावान, सदा संतुष्ट, योगनिष्ठ, मनको वश करनेवाला, द्रढनिश्चयी और जिसने मन और बुध्धि मुझे अर्पित कियेकिए हैं, वह मेरा भक्त मुझे अतिप्रिय है । "
" जिससे लोगों को संताप नहीं होता और लोगों से जिसे संताप नहीं होता, जो हर्ष, शोक, क्रोध, भय और उद्वेग से रहित है, ऐसा भक्त मुझे अतिप्रिय है । "
" जो पुरुष, स्पृहारहित, पवित्र, नचिंत, बीनपक्षपातीबिनपक्षपाती, भयरहित और जिसने सर्व आरंभोंआरंभों का त्याग किया है, ऐसा मेरा भक्त मुझे अति प्रिय है । "
" जो हर्ष नहीं पाता या द्वेष नहीं करता, जो शोक नहीं करता या ईच्छा नहीं करता, जो शुभ और अशुभ कर्मों के फल को त्याग देता है, ऐसा भक्त मुझे अति प्रिय है । "
" जिन्हें शत्रु, मित्र, मान, अपमान, ठंड, धूप, सुख, दु:ख समान है, जो आसक्तिरहित है, जो निंदा और स्तुति को समान समझता है, जो मननशील है, जो कुछ सहज रुप से मिले ईसमें संतोष माननेवाला है, जो ममतारहित है, वह स्थिर बुध्धिवाला, भक्तिमान पुरुष मुझे अतिप्रिय है । "
" जो श्रध्धायुक्त भक्तों, मेरे परायण होकर, जो कुछ मैंने कहा है ईस प्रकार, यह धर्ममय अमृतका निष्काम भाव से सेवन करते हैं वे भक्तों मुझे अत्यंत प्रिय है । "
गीताजी की संस्कृत भाषा सरल होने पर भी, शायद हम समझ न सकें तो, श्री नरसिंह महेता ने, यही बात बहुत ही सरल शब्दों में, गुजराती भाषा में भजन के रुप में कही है । उसका जीवन में अनुसरण करें तो, प्रभु की कृपा पा सकते हैं । सभी सद्गुनों का अनुसरण कठिन लगे तो भी, कम से कम एक सद्गुन का अनुसरण करें तो, धीरे धीरे सभी सद्गुनों जीवन में अपने आप प्रगट होंगे और अपना जीवन अच्छा हो जाएगा । ये सभी सद्गुनों जीवन में कितनी बडी परम शांति देते हैं ? उसका अनुभव तो स्वयं ही कर सकते हैं । यही ईश्वरकृपा है ।
परम वैष्णव की परिभाषा नरसिंह महेता ने दी । वैष्णव किसे कहेत हैं ?
(1) જે પીડ પરાઈ જાણે રે.... दूसरों के दु:ख जानने की कोशिष करे ......
(2) પર દુ:ખે ઉપકાર કરે ....... दूसरों के दु:ख दूर करने की कोशिष करे .....
(3) તો યે મન અભિમાન ન આણે રે ... फिर भी अभिमान न करे ......
(4) સકળ લોકમાં સહુને વંદે ..... जो अत्यंत विनम्र हो ......
(5) નિંદા ન કરે કેની રે ...... किसीकी कभी निंदा न करे ........
(6) વાછ, કાછ, મન નિશ્ચલ રાખે.... वाणी, कार्य और मन निश्चल रख्खे ....
(7) મોહ માયા વ્યાપે નહીં જેને ...... जिसको मोह, माया की असर न हो ....
(8) પરસ્ત્રી જેને માત રે ...... जो परस्त्री को माता समान माने.....
(9) જિહ્વા થકી અસત્ય ન બોલે ...... जो कभी असत्य न बोले ....
(10) પરધન નવ ઝાલે હાથ રે .... परिश्रम के बिना किसीका धन न ले .....
(11) વણલોભી ને કપટ રહતિ છે..... जो लोभी और कपटी न हो ....
(12) કામ, ક્રોધ નિવાર્યા રે ...... जिसको काम और क्रोध की असर न हो ....
अगर हमारे मन में कई दोष हैं तो भी, यह कोई संकोच की बात नहीं । हम कोई संत नहीं है । ईसी लिए अवगुन माने दोष होना स्वाभाविक है । लेकिन ये गौरव की बात नहीं है, ईतना हमें समझना चाहिये । जो कोई दोष हमें मालुम हो, उसे दूर करने की कोशिष करें । हम अपने दोष किसीको न कह सकें, मगर परमात्मा को तो कह सकते हैं ।
परमात्मा के पास सच्चे दिल से ईकरार करना । हमारे दिल को निर्मल करने की प्रार्थना करना । सच्चे दिल की प्रार्थना प्रभु जरुर सुनते हैं । भक्ति माने हमारे मन को धोना – स्वच्छ करना । मन का मैल धुलने से धीरे धीरे मन निर्मल होगा । जैसे जैसे मन स्वच्छ होता जाएगा, वैसे वैसे मन की परम शांति का अनुभव होगा । हमें दूसरों का नहीं लेकिन अपने दोष देखना और निकालना जरुरी है । परमात्मा की कृपा पाने का यह श्रेष्ठ मार्ग है । परमात्मा की कृपा जीवन में जरुरी है या नहीं, वह तो हमें खुद सोचना पडेगा । ईतना कह सकते हैं कि परमात्मा की कृपा पाने के बाद, जीवन में और कुछ पाने की जरुरत ही नहीं रहेती ।
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