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23. भक्तियोग – 1

श्रीकृष्ण भगवान ने गीताजी में तीन योग को बहुत महत्व दिया है । ईनमें से भक्तियोग एक है । गीताजी के 12 वें अध्याय में श्रीकृष्ण भगवान ने, उनको कैसा भक्त प्रिय है ? यह बात बहुत सुंदर और सरल रुप से समझाई है ।

" जो प्राणी मात्र का द्वेष नहीं करता, जो सभीसभी से मित्र भाव से पेश आता है, जो दयालु, ममतारहित, अहंकाररहित, सुखदु:ख को समान माननेवाला, क्षमावान, सदा संतुष्ट, योगनिष्ठ, मनको वश करनेवाला, द्रढनिश्चयी और जिसने मन और बुध्धि मुझे अर्पित कियेकिए हैं, वह मेरा भक्त मुझे अतिप्रिय है । "

" जिससे लोगों को संताप नहीं होता और लोगों से जिसे संताप नहीं होता, जो हर्ष, शोक, क्रोध, भय और उद्वेग से रहित है, ऐसा भक्त मुझे अतिप्रिय है । "

" जो पुरुष, स्पृहारहित, पवित्र, नचिंत, बीनपक्षपातीबिनपक्षपाती, भयरहित और जिसने सर्व आरंभोंआरंभों का त्याग किया है, ऐसा मेरा भक्त मुझे अति प्रिय है । "

" जो हर्ष नहीं पाता या द्वेष नहीं करता, जो शोक नहीं करता या ईच्छा नहीं करता, जो शुभ और अशुभ कर्मों के फल को त्याग देता है, ऐसा भक्त मुझे अति प्रिय है । "

" जिन्हें शत्रु, मित्र, मान, अपमान, ठंड, धूप, सुख, दु:ख समान है, जो आसक्तिरहित है, जो निंदा और स्तुति को समान समझता है, जो मननशील है, जो कुछ सहज रुप से मिले ईसमें संतोष माननेवाला है, जो ममतारहित है, वह स्थिर बुध्धिवाला, भक्तिमान पुरुष मुझे अतिप्रिय है । "

" जो श्रध्धायुक्त भक्तों, मेरे परायण होकर, जो कुछ मैंने कहा है ईस प्रकार, यह धर्ममय अमृतका निष्काम भाव से सेवन करते हैं वे भक्तों मुझे अत्यंत प्रिय है । "

गीताजी की संस्कृत भाषा सरल होने पर भी, शायद हम समझ न सकें तो, श्री नरसिंह महेता ने, यही बात बहुत ही सरल शब्दों में, गुजराती भाषा में भजन के रुप में कही है । उसका जीवन में अनुसरण करें तो, प्रभु की कृपा पा सकते हैं । सभी सद्गुनों का अनुसरण कठिन लगे तो भी, कम से कम एक सद्गुन का अनुसरण करें तो, धीरे धीरे सभी सद्गुनों जीवन में अपने आप प्रगट होंगे और अपना जीवन अच्छा हो जाएगा । ये सभी सद्गुनों जीवन में कितनी बडी परम शांति देते हैं ? उसका अनुभव तो स्वयं ही कर सकते हैं । यही ईश्वरकृपा है ।       

कर्मयोग, ज्ञानयोग और भक्तियोग परस्पर जुडे हुए हैं । किसी एक योग का सच्चे दिल से अनुसरण करें तो, दूसरे दो योगों की अलग साधना नहीं करनी पडती । ये साधना अपने आप हो जाती है । सच्चे दिल से भक्तियोग का अनुसरण करनेवाले को, अध्यात्म का ज्ञान सीखने की आवश्यकता नहीं है । ईसी तरह उसके तमाम कर्म निष्काम भाव से ही होते हैं । परमात्मा के परम भक्त श्री नरसिंह महेता ईसका ज्वलंत उदाहरण है । प्रभु की भक्ति करते करते वे परम तत्वज्ञानी हो गए । उन्होंने, किसी युनीवर्सीटीयुनीवर्सीटी में से, ज्ञान पाने की कोशिष नहीं की थी । फिर भी उनका, अध्यात्म ज्ञान बहुत गहेरा था । किसी यश पाने की अपेक्षा के बिना, अपयश पाकर भी, उन्होंने अस्पृश्यता निवारण का उत्तम कार्य, सहज भाव से, पाच सौ साल पहेले किया । ईसी तरह कुछ साल पहेले अस्पृश्यता निवारण का कठिन कार्य करनेवाले महात्मा गांधीजी को, श्री नरसिंह महेता के प्रति खूब आदर था ।

परम वैष्णव की परिभाषा नरसिंह महेता ने दी । वैष्णव किसे कहेत हैं ?

(1) જે પીડ પરાઈ જાણે રે....            दूसरों के दु:ख जानने की कोशिष करे ......

(2)   પર દુ:ખે ઉપકાર કરે .......        दूसरों के दु:ख दूर करने की कोशिष करे .....

(3)   તો યે મન અભિમાન ન આણે રે ... फिर भी अभिमान न करे ......

(4)   સકળ લોકમાં સહુને વંદે .....      जो अत्यंत विनम्र हो ...... 

(5)   નિંદા ન કરે કેની રે ......         किसीकी कभी निंदा न करे ........

(6)   વાછ, કાછ, મન નિશ્ચલ રાખે....    वाणी, कार्य और मन निश्चल रख्खे ....

(7)   મોહ માયા વ્યાપે નહીં જેને ......   जिसको मोह, माया की असर न हो .... 

(8)   પરસ્ત્રી જેને માત રે ......         जो परस्त्री को माता समान माने.....

(9)   જિહ્વા થકી અસત્ય ન બોલે ......   जो कभी असत्य न बोले ....

(10) પરધન નવ ઝાલે હાથ રે ....     परिश्रम के बिना किसीका धन न ले .....

(11) વણલોભી ને કપટ રહતિ છે.....    जो लोभी और कपटी न हो ....

(12) કામ, ક્રોધ નિવાર્યા રે ......       जिसको काम और क्रोध की असर न हो ....

हर रोज सिर्फ हवेली (वैष्णवों का मंदिर) जाने से, तिलक करने से या प्रभुकीर्तन करने से वैष्णव नहीं बन सकते । हमारे बारे में दूसरों का क्या खयाल है ? ये सोचे बिना,  उपरोक्त मापदंड के आधार पर, हम खुद अपना मूल्यांकन करें तो, हमें पता चल जाएगा कि हमारा मूल्य कितना है ? वैष्णव के लिए अत्यंत जरुरी, उपरोक्त सद्गुनों में से, हममें कितने सद्गुन है ?, ये हमें सोचना है । अगर बहुत कम हो तो फिर, मंदिर जाने से कोई फायदा नहीं । हम अपने आप से छल कर सकते हैं, हम समाज से भी छल कर सकते हैं, लेकिन  
 
हम परमात्मा से कभी भी छल नहीं कर सकते । क्योंकि वे तो अंतर्यामी हैं । हमारे दोष छिपाने की हम लाख कोशिष करें फिर भी, हमारे मन में क्या छिपा हुआ है ? वह अंतर्यामी परमात्मा को सब पता है ।

अगर हमारे मन में कई दोष हैं तो भी, यह कोई संकोच की बात नहीं । हम कोई संत नहीं है । ईसी लिए अवगुन माने दोष होना स्वाभाविक है । लेकिन ये गौरव की बात नहीं है, ईतना हमें समझना चाहिये । जो कोई दोष हमें मालुम हो, उसे दूर करने की कोशिष करें । हम अपने दोष किसीको न कह सकें, मगर परमात्मा को तो कह सकते हैं ।

परमात्मा के पास सच्चे दिल से ईकरार करना । हमारे दिल को निर्मल करने की प्रार्थना करना । सच्चे दिल की प्रार्थना प्रभु जरुर सुनते हैं । भक्ति माने हमारे मन को धोना – स्वच्छ करना । मन का मैल धुलने से धीरे धीरे मन निर्मल होगा । जैसे जैसे मन स्वच्छ होता जाएगा, वैसे वैसे मन की परम शांति का अनुभव होगा । हमें दूसरों का नहीं लेकिन अपने दोष देखना और निकालना जरुरी है । परमात्मा की कृपा पाने का यह श्रेष्ठ मार्ग है । परमात्मा की कृपा जीवन में जरुरी है या नहीं, वह तो हमें खुद सोचना पडेगा । ईतना कह सकते हैं कि परमात्मा की कृपा पाने के बाद, जीवन में और कुछ पाने की जरुरत ही नहीं रहेती ।

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