श्रीकृष्ण भगवान ने श्रीमद् भगवद् गीताजी में अपने साकार और निराकार दोनों स्वरुपों की चर्चा की है, ईसी लिए परमात्मा साकार है या निराकार ? यह सवाल ही नहीं उठता । विभिन्न धर्म, भिन्न भिन्न स्वरुप को मानते हैं । कोई धर्म सिर्फ साकार को मानता है, कोई धर्म सिर्फ निराकार को मानता है, कोई धर्म दोनों को मानता है । रुचिभेद की वजह से, जिसे जो स्वरुप पसंद हो उसकी आऱाधना करे, ईसमें किसीको, कोई आपत्ति नहीं होनी चाहिये । धर्म को समझे बिना, किसी धर्म की निंदा करने का, हमें कोई अधिकार नहीं है । दुर्भाग्यवश हमें दुसरे धर्म की निंदा करने में बडा मजा आता है । ईतना ही नहीं लेकिन ऐसे मत मतांतर कौमी हुल्लड का कारन बने और कई निर्दोष लोगों की कौमी अशांति की वजह से जान चली जाए, यह तो हमारी मूर्खता ही है ।
हिन्दु धर्म मूर्तिपूजा में मानता है । करोडों लोग देवाधिदेव महादेवजी के शिवलिंग की भक्तिभाव से पूजा करते हैं । करोडों लोग श्रीराम, श्रीकृष्ण और अंबाजी, दुर्गा, गायत्री, लक्ष्मी ईत्यादि विभिन्न स्वरुप के द्वारा माताजी की पूजा करते हैं । मुस्लीम धर्म परमात्मा के निराकार स्वरुप को मानते हैं, ईसी लिए वे मूर्तिपूजा के विरोधी हैं । धर्मझुनुन की वजह से ही महम्मद गझनी ने सौराष्ट्र में सोमनाथ मंदिर पर 17 बार हमला किया । ईतना ही नहीं उसने शिवलिंग के टुकडे किए । यह ईतिहास में लिखी गई सत्य घटना है । आज भी आतंकवादीओं मंदिरों पर हमला करने की योजनाएं बनाते हैं । यह पागलपन ही है । बादशाह बाबर ने राममंदिर को तोडकर, बाबरी मस्जीद बनवाई । कुछ साल पहेले हिन्दुओं ने उस मस्जीद को तोड दी । अब वहां राममंदिर बनाने का आंदोलन चल रहा है । यह भी कट्टरवादीओं का पागलपन ही है ।
हम एक दूसरे के धर्म को आदर से देखना कब शीखेंगे ? दोनों धर्म के सज्जन लोग आपस में चर्चा करके, किसीकी धर्म भावना को ठेस न पहूंचे ऐसे, कुछ नहीं कर सकते क्या ? धर्मका सच्चा अर्थ है – दूसरों को सहायरुप होना । यह सीधी सरल बात हम क्यों नहीं समझते हैं ? धर्म माने परस्पर प्रेम और सहकार । मजहब नहीं सिखाता आपस में बैर रखना । जो नफरत और तिरस्कार से भरा हो उसे धर्म नहीं कहा जा सकता । यह सरल बात हम कब समझेंगे ? जो सच्चे धर्म को नहीं जानते वही लोग खून की नदीयां बहाते हैं ।
हिन्दु धर्म और वेदों के प्रखर प्रचारक स्वामी श्री दयानंद सरस्वतीजी, जब बालक थे तब, शिवरात्रि की रात को पूजा के समय, शिवलिंग पर चढाए हुए चावल खाने को चुहे को शिवलिंग पर घुमते देखा । ईसी लिए उन्हें मूर्तिपूजा पर श्रध्धा न रही । लेकिन ईश्वर के अस्तित्व को वे मानते थे, ईसी वजह से परमात्मा के निराकार स्वरुप की साधना करने पर उन्होंने जोर दिया । फिर भी, बिना सोचे समझे, मूर्तिपूजा छोड देने को नहीं कहा ।
एक दिन वे, हिमालय की गोद में, मा गंगामैया के तट पर, परमात्मा का ध्यान करते थे । पानी में किसी आवाज की वजह से, उनकी आंखें खुल गई । एक महिला ने, अश्रु भीगी आंखों से, अपने मृत बालक के शव को गंगाजी मे बहाकर, उस पर रख्खा हुआ वस्त्र वापस ले लिया । स्वामीजी ने वजह पूछने से महिला ने दर्दभरा उत्तर दिया – " क्या करुं ? मेरे पास अंग ढकने के लिए दूसरा वस्त्र नहीं है । " स्वामीजी के हृदय में खलबली मच गई । वे खुद संन्यासी थे, तो उनके पास भी दूसरा वस्त्र नही था, जो महिला को दे सके । अपने आत्मा की उन्नति के लिए तप करने के बजाय, दरीद्रों को सहायरुप होने की शुभ भावना से उन्होंने तप छोड दिया । पैदल घुमते घुमते, कई राजा महाराजाओं को मिले और अपने भोगविलास में धन व्यय न करके, दरीद्रों की सेवा के लिए धन व्यय करने को समझाया । स्वकल्याण नहीं लेकिन समाज कल्याण को विशेष महत्व देनेवाले, तप का त्याग करनेवाले वे महान संन्यासी, धर्म का और गीताजी का सच्चा अर्थ समझते थे ।
धर्म वादविवाद के लिए नहीं है । एक दूसरे को परेशान करने के लिए भी नहीं है । फिर भी कई विद्वान लोग, अपने अहंकार को संतुष्ट करने के लिए, परमात्मा का स्वरुप साकार है या निराकार है ? ऐसी मिथ्या चर्चा में उलझे रहेते हैं । ईस प्रश्न का उत्तर खुद परमात्मा ने ही बहुत सुंदर रुप से दे दिया है ।
श्रीकृष्ण, श्रीराम, श्रीमहादेवजी ईत्यादि एक ही परम तत्व के विभिन्न स्वरुप है । यह बात तो, गीताजी के अध्याय नंबर 10 ' विभूतियोग ' में बहुत स्पष्ट है । ये सभी साकार स्वरुप है । परमात्मा के निराकार स्वरुप के बारे में, उसी अध्यायमें श्लोक नंबर 25 में कहा है कि – " गिराम् अस्मि एकम् अक्षरम् " बानीमें एक अक्षर (ૐ) मैं हूं । ૐ निराकार है । उसका उच्चारण मन को कितनी शांति प्रदान करता है यह महसूस करना जरुरी है । ध्यान के वक्त, श्वास की गति को धीरे धीरे कम करके, याने गहन सांस लेके ૐ परम शांति, ૐ परम शांति, ऐसा मन में बोलने से मन जल्दी शांत होता है ।
ईसी अध्याय में परमात्मा ने कहा है कि – पवन मैं हूं (श्लोक नं. 21), अग्नि मैं हूं (श्लोक नं.23), सागर मैं हूं (श्लोक नं. 24), हिमालय मैं हूं ( श्लोक नं. 25), जाह्नवी माने गंगाजी मैं हूं (श्लोक नं. 31), स्थावर, जंगम में ऐसा कोई भी पदार्थ नहीं है जो मेरे बिना हो (श्लोक नं. 39) । ऐसे पवन, अग्नि, पानी, ये सभी परमात्मा के निराकार स्वरुप हैं ।
गीताजी के अध्याय नंबर 15 ' पुरुषोत्तमयोग ' में, श्लोक नंबर 12 में श्रीकृष्ण भगवान ने कहा है –
" यदादित्य गतं तेजो जगत भासयतेखिलम्,
यत्चन्द्रमसि, यच्चाग्नौ, तत् तेजो विध्धि मामकम्...."
तेज का कोई चोक्कस आकार नहीं होता । वह संपूर्ण निराकार है । ऐसे ही पानी, पवन, अग्नि, ये सभी परमात्मा के निराकार स्वरुप हैं । परमात्मा सर्वव्यापी है, ईसी लिए तमाम आकारवाले या बिना आकार के पदार्थ में परमात्मा है ही । सभी सजीव या निर्जीव पदार्थों में परमात्मा है ही । फुलों की खुश्बु को हम उंगली से छू नहीं सकते । फुल की किसी एक पंखुडी में, किसी एक जगह पर सुगंध छिपी हुई है, ऐसा नहीं कह सकते । सुगंध तो फुल की हर पंखुडी के कण कण में समान रुप से व्याप्त है । ईसकी सुमधुरता का अनुभव कर सकते हैं, बयान नहीं कर सकते । ईस तरह अद्भूत सुगंध, प्रभु का निराकार स्वरुप है ।
भक्त प्रह्लाद की कहानी अजीब है । उनके पिता को प्रभु का नाम पसंद नहीं था । बालक प्रह्लाद को प्रभु के नाम के सिवा कुछ पसंद नहीं था । " प्रभु कहां है ? " ऐसा पूछने से उन्होंने उत्तर दिया - " वे तो सर्वव्यापी हे ।" " यह जड खंभे में भी है क्या ? " पूछने पर उन्होंने हां कही । लोहे के खंभे को बहुत गर्म करके, उसे बाथ भीडने के को प्रह्लाद को कहा गया । बिना किसी हिचकिचाहट वे खंभे से लिपट गए । जड खंभे में से प्रभु प्रगट हुए ।
पौराणिक कथाएं शायद हम न मानें, लेकिन कुछ वक्त के पहेले महाराष्ट्र में एक असामान्य भक्त थे । भक्त नामदेवजी रोटी बना रहे थे । सहसा एक कुत्ता आया और एक रोटी लेके भागा । अगर हम वहां होते तो कुत्ते को मारने के लिए दंडा लेकर पीछे दौडते । लेकिन नामदेवजी घी की कटौरी लेके दौडे । कहेने लगे - "भगवान । कोरी रोटी मत खाना, आप के गले में दर्द होगा । मैं घी लगा दूं, बाद में रोटी खाना ।" ऐसे असामान्य भक्त को हमारा समाज पागल समझता होगा । लेकिन सभी सजीव, निर्जीव में परमात्मा के दर्शन करनेवाले ऐसे पागल मानवी ही प्रभु दर्शन पा सकता है । सिर्फ प्रेम चाहिये, और कुछ नहीं । साकार या निराकार ? ऐसे ज्ञान की भी आवश्यकता नहीं ।
ऐसी एक मान्यता है कि ध्यान के दरम्यान प्रकाश दिखता है । स्वामी विवेकानंदजी को प्रकाश दिखता था । कई सालों से गहन समाधि में डूबे रहेनेवाले महात्माओं को ऐसा अनुभव होता होगा । लेकिन हम जैसे आम आदमी को ऐसा अनुभव नहीं होता । ईसी वजह से परमात्मा हम पर प्रसन्न नहीं होंगे, ऐसा सोचकर चिंता करने की जरुरत नहीं है । कुछ समय पहेले एक महात्मा ने कहा - " परमात्मा प्रकाश में है, तो अंधेरे में भी है । दोनों उनके निराकार स्वरुप है । ध्यान दरम्यान प्रकाश दिखे या न दिखे, चारों ओर अंधेरा हो तो भी ध्यान मत छोडो । जब तेजपुंज हमारे हृदय में पधारेंगे तो प्रकाश ही प्रकाश होगा । अंधेरा कब मिट जाएगा, वह पता ही नहीं चलेगा । हम सिर्फ प्रार्थना करें -
" તેજપુંજ ! તમે વ્હેલા આવો, કૃષ્ણ વિના આ આંખ સુની છે ...."
अगर हमारी आंखें प्रेम से तरसेगी तो, कभी न कभी उनके दर्शन होंगे ।
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