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19. सर्जनहार का श्रेष्ठ सर्जन - मा

श्रीकृष्ण भगवान ने गीताजी के अध्याय नंबर 10 ' विभूतियोग ' में श्लोक नंबर 34 में दूसरे चरणमें कहा है  -

" कीर्ति:, श्रीर्वाक् च नारीणाम् स्मृतिर्मेधा धृति: क्षमा ..."

" नारी में कीर्ति, लक्ष्मी, वाणी, स्मृति, बुध्धि, धीरज और क्षमा मैं हूं ।" जगत के सर्जनहार ने खुद ने महिलाओं के लिए कितना बडा श्रेष्ठ विधान किया है । जो महिला में उपरोक्त गुन हो, माने कि जो स्त्री परिवार की कीर्ति बढानेवाली हो, लक्ष्मी जैसी मंगलकारी हो, जिसकी वाणी संयमशील और मृदु हो, तीव्र यादशक्तिवाली, बुध्धिशाली, धीरजवाली और क्षमाशील हो, वह स्त्री मेरा स्वरुप है । श्रीकृष्ण भगवान ने गीताजी में, कर्मयोगी, ज्ञानी और भक्त की प्रशंसा की है, उसी तरह नारी की भी प्रशंसा की है । जो नारी में ऐसे अद्भूत गुन हो, वह नारी ही अपने बच्चे में उत्तम गुनों का सिंचन कर सकती है ।

सर्जनहार का श्रेष्ठ सर्जन मा है । किसी विद्वान ने बहुत सुंदर कहा – " परमात्मा हर जगह पहूंच नहीं पाते, ईसी लिए उन्होंने माता का सर्जन किया । " ईस तरह मा परमात्मा का ही स्वरुप है । बहन, पुत्री, भाभी ईत्यादि मा के ही अलग अलग स्वरुप है । ईन सभी स्वरुप में परमात्मा ने अजीब प्रेम, सुकोमलता और सुंदरता भर दिए हैं । अगर मा न होती तो जगत का अस्तित्व ही न होता । जगत के सर्जन के बाद, उसका सुचारु रुप से संचालन हो यह भी बहुत जरुरी है । समाज व्यवस्था अच्छी तरह बनी रहे, यह बहुत ही आवश्यक है । उसको नुकशान करनेवाली संतान तो अभिशाप रुप है । ईसी लिए कोई लोककवि ने बहुत अजीब बात कही –

" જનની ! જણ તો ભક્ત જણ, કાં દાતા, કાં શૂર,

નહીંતર રહેજે વાંઝણી, મત ગુમાવીશ નૂર......"

हे मा ! परमात्मा को पाने के लिए जो अपना आत्म समर्पण कर दे, ऐसे परम भक्त को जन्म देना । वरना, सभी में परमात्मा छिपे हुए हैं, ऐसा समझकर, दूसरों के कष्ट दूर करने के लिए अपनी संपत्ति का त्याग करे माने अपनी संपत्ति प्रभु चरण में अर्पित करे, ऐसे दानवीर को जन्म देना । क्योंकि गीताजी के अर्थ के मुताबिक वही सच्चा ज्ञानी है । वरना, निर्बल की रक्षा के लिए, दूसरों के कल्याण के लिए अपनी शक्ति का उपयोग करे ऐसे शूरवीर को जन्म देना । क्योंकि गीताजी के अर्थ के मुताबिक वही सच्चा कर्मयोगी   है । अगर तुम भक्त, दाता या शूरवीर को जन्म न दे सको तो बांझ रहेना । यही बहेतर होगा । तुम अपना नूर फिजुल गंवाना नहीं ।

संस्कृत में एक बहुत अच्छा शुभाषित है –

"विद्या विवादाय, धनम् मदाय, शक्ति: परेशाम् परिपीडनाय,

खलस्य, साधोर्विपरीतमेतत, ज्ञानाय, दानाय च रक्षणाय.. "

दुर्जन लोग अपनी विद्या का उपयोग वादविवाद करने के लिए, धन का उपयोग अभिमान के लिए और शक्ति का उपयोग दूसरों को परेशान करने के लिए करते हैं । जब सज्जन लोग, विद्या का उपयोग ज्ञान के लिए, धन का उपयोग दान के लिए और शक्ति का उपयोग दूसरों के रक्षण के लिए करते हैं । दुर्जन लोग, दूसरे लोगों को परेशान करके खुद सुखी होने की कोशिष करते हैं । वे समाज के लिए बोज है । सज्जन लोग, खुद तकलीफें झेलकर, दूसरों को सुखी करने की कोशिष करते हैं । वे समाज के लिए उपकारक है ।

क्या मा अपनी ईच्छा के मुताबिक संस्कारी संतान को जन्म दे सकती है ? उत्तर है- हां । बालक के जन्म पश्चात् तो, संभालपूर्वक परवरिश से मा अपनी संतान को संस्कारी बना सकती है । ये बात समझ सकते हैं क्योंकि कई विद्वान केलवणीकारों ने कहा है कि, एक मा सौ शिक्षकों के समान होती है । लेकिन आश्चर्यकारक बात तो यह है कि बालक जब मा के गर्भ में होता है तब भी मा के विचारों और वातावरण की असर उस पर होती  है । भक्त प्रह्लाद का जन्म तो असुर परिवार में हुआ था, फिर वे परमात्मा के भक्त कैसे  बने ? ईसकी बहुत सुंदर कथा है । देवराज ईन्द्र ने अपने शत्रु हिरण्यकशिपु की पत्नी का अपहरण किया । देवर्षि नारदजी, ईन्द्र के पास से उन्हें छुडाके, अपने आश्रम में ले गए । आश्रम के पवित्र भक्तिमय वातावरण की शुभ असर, गर्भस्थ शिशु पर हुई । असुर कुल में जन्म के बावजुद प्रह्लाद, परमात्मा के परम भक्त के रुप में, प्रसिध्ध हुए ।

कुछ समय पहेले की ही बात करें तो हमारे लोकशायर श्री झवेरचंद मेघाणी का लिखा हुआ ' શિવાજીનું હાલરડું '  याद करने योग्य है ।

" પેટમાં પોઢીને સાંભળેલી  બાળે, રામ લક્ષ્મણની વાત,

માતાજીને મુખ જે દિ થી, ઉડી એની ઉંઘ તે દિ થી ..."

छत्रपति श्री शिवाजी महाराज अपनी मा के गर्भ में थे, तब उनकी मा रामायण की कथा पढती थी । गर्भावस्था के दरमियान ही राम-लक्ष्मण की बातें सुनकर श्री शिवाजी महाराज को पराक्रमी बननेके शुभ संस्कार मिले थे । माता के अद्भूत संस्कार का समाज को क्या शुभ फल मिला ? यह तो ईतिहास में लिखा है ।

समग्र गुजरात जिन के लिए गौरव अनुभव कर सके, वे पूज्य श्री रवीशंकरदादा को अपनी माताकी ओर से, बचपन से ही दूसरों को सहायरुप होने की, भावना मिली थी । उन्होंने अपना सारा जीवन समाज को समर्पित कर दिया । " मूठी उंचेरा मानवी " के नाम से जिनको आम जनता पहेचानती थी ऐसे पूज्य रवीशंकरदादा की खुदको घीसकर उज्वल बनो जैसी सोनेरी सलाह, अगर मा अपने बच्चेको बचपन से सीखाती हो तो जवान होने के बाद उस बालक का जीवन उज्वल होगा ही । छोटी छोटी बातें बच्चे  का जीवन बनाती है और                          

ये सब बातों की अच्छी या बुरी असर, उस बालक का जीवन निर्माण करती है, यह निर्विवाद है । ईस तरह मा सिर्फ अपने बच्चे का जीवन नहीं संवारती लेकिन सारे समाज को संवारती है ।

सौराष्ट्र के सुप्रसिध्ध लेखक श्री झवेरचन्द मेघाणी ने ' સોરઠી બહારવટીયા ' नाम की अपनी पुस्तक में, भावनगर राज्य के खिलाफ बगावत करनेवाले श्री जोगीदास खुमाण के जीवन की एक घटना के बारे में बहुत सुंदर लिखा है । खून, लूट जिनके लिए सामान्य माने जाते थे, ऐसे ये आदमी ने, परस्त्री को माता समान मानते हुए, उन पर नजर न डालने की प्रतिज्ञा ली थी । एक दफा, कहीं कुछ महिलाएं गरबे घुम रही थी तब गलती से वे वहां खडे रहे और सभीको देखते रहे । रात्रि को सोने के वक्त, गलती से अपनी प्रतिज्ञा भंग होने का स्मरण हुआ । अपने दोनों हाथो में मिर्ची का चूर्ण लेकर अपनी आंखों पर लगा दी । सुबह एक साथीदार ने देखा कि जोगीदास की दोनों आंखों में सुझन आ गई है तो उसने वजह जानने की कोशिष की । उसने पूछा – " जोगीदास ! ये क्या हुआ ? " – " आँख में से विकार को निकाल दिया । " जोगीदासने उत्तर दिया

कोई मलिन भावना से उन्होंने प्रतिज्ञा भंग नहीं की थी । वह सिर्फ एक छोटी सी गलती ही थी । लेकिन अपनी प्रतिज्ञा के शब्दो का बहुत उच्च मूल्य समझनेवाले उन्होंने, अपनी गलती का अहेसास होने से, स्वेच्छा से कडी सजा अपने आप भुगत ली । जोगीदास खुमाण को लोग प्रेमसे ' लक्ष्मण जति ' का अवतार कहेते थे, वह सही था । गीताजी मे ऐसे विरल मानवीओं के लिए ही ' योगी ' शब्द है । मातापिता अपने बच्चे को ऐसे उच्च संस्कार दें, तभी जीवन सार्थक माना जाय । वरना, कीडी, मकोडे जैसा जीवन तो सभी जीते हैं ।

जिस घर में आनंद से भरा संस्कारी वातावरण हो, उस घर में बच्चे अपने आप संस्कारी बनते हैं । और जिस घर में युवान और बुझर्ग आदमी गाली गलौच करते हो, या मारामारी करते हो, उस घर के बच्चे भी ऐसा ही सीखकर असंस्कारी बनते हैं । संस्कार बाजार में बेचे नहीं जाते । मुख्य रुप से मा अपने बच्चे का जीवन कैसे संवारती है, उस पर संस्कार का आधार है । मा जितनी ज्यादा संस्कारी होगी, बच्चा उतना ही संस्कारी बनेगा । मा खुद सादगी से जिए और कम खर्च से जीवन निर्वाह करे तो, उसका बच्चा भी ऐसा सीखेगा । उसका बच्चा भविष्य में स्वमान से जी सकेगा । उसे रिश्वत लेने की जरुरत  नहीं पडेगी । वह किसीके आगे अपना हाथ नहीं फैलायेगा । परमात्मा की अनन्य कृपा से वह अपना शिर उठा के जी सकेगा । अगर हर मा, गीताजी का अध्ययन करे और उसका आचरण करे तो, अपने लाडले बच्चे को, निष्काम कर्मयोगी, परम ज्ञानी और परमात्मा का परम भक्त बना सकती है । ईसमें कोई भी संदेह नहीं है ।

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