श्रीकृष्ण भगवान ने गीताजी के उपदेश दरमियान अर्जुन को, वे सर्वव्यापक हैं और सबकुछ उन्हींमें ही समाया हुआ है, यह समझाने के लिए, ' विभूतियोग ' नाम के 10 वें अध्याय में अपनी मुख्य मुख्य विभूतियों के बारे में कहा - " सर्व के हृदय में रहेनेवाला, सर्व का आत्मा मैं ही हूं । (श्लोक नंबर-20), सूर्य, चन्द्र और पवन मैं हूं । (श्लोक नंबर-21), समुद्र मैं हूं । (श्लोक नंबर-24), हिमालय मैं हूं । (श्लोक नंबर-25), पीपलवृक्ष मैं हूं । (श्लोक नंबर-26), गंगा नदी मैं हूं । (श्लोक नंबर-31), हे अर्जुन ! ये सब कुछ जानने की तुझे क्या आवश्यकता है ? तू सिर्फ ईतना समझ ले कि सिर्फ मेरे एक अंश से ही मैं ईस समग्र जगत को धारण करता हूं । (श्लोक नंबर-42)
श्री शिव महिम्न स्तोत्र में एक बहुत सुंदर श्लोक के द्वारा भगवान शिव को कहा है - "सूर्य और चन्द्र आप हैं । पवन और अग्नि आप हैं । पानी और आकाश आप हैं । पृथ्वी और आत्मा भी आप हैं । लेकिन ईस तरह एक एक विभूति गिनते गिनते मेरी वाणी थक जाएगी । ईसी लिए कम शब्दों में ईतना ही कह सकता हूं कि जिनमें आप न हो ऐसा कोई तत्व मेरी समझ में नहीं है । "
परमात्मा के परम भक्त श्री नरसिंह महेता ने एक भजन में परमात्मा से कहा -
"પવન તું, પાણી તું, ભૂમિ તું ભૂધરા ! વૃક્ષ થઈ ફુલી રહ્યો આકાશે,
વિવિધ રચના કરી અનેક રસ લેવાને, શિવનો જીવ થયો એજ આશે..."
जब विज्ञान की खोज या गहन अध्ययन के द्वारा सत्य को ज्यादा से ज्यादा जानने की शुरुआत नहीं हुई थी, तब यह सब कुछ लिखा गया है । गीताजी 5000 वर्ष पुराना ग्रंथ है । शिव महिम्न स्तोत्र कब लिखा गया मालुम नहीं । लेकिन विज्ञान की खोज के पहेले लिखा गया होगा । श्री नरसिंह महेता भी करीब 500 वर्ष पहेले हो गए, जब विज्ञान की प्रगति शुरु नहीं हो पाई थी । ऐसी स्थिति में, ये सब बातों को सच मानना या न मानना यह सोचना चाहिये । सामान्य रुप से हमारे पूर्वजों द्वारा कही गई ईन सब बातों को, हम श्रध्धा से स्वीकार लेते हैं । लेकिन ये सच है कि नहीं ? वह विज्ञान के माध्यम से कसौटी करने में कोई आपत्ति नहीं होनी चाहिये । अगर ये सब बातें सच साबित हो तो, हमें स्वाभाविक रुप से आनंद होना ही चाहिये ।
समग्र विश्व को अपने प्रकाश से प्रकाशित करनेवाले सूर्य के अद्भूत तेज से कौन अनजान होगा ? सूर्य में से ही, विभिन्न समय पर, विभिन्न नव ग्रह अलग हुए हैं । पृथ्वी भी ईसी प्रकार सूर्य से उत्पन्न हुआ एक ग्रह ही है । यह तो विज्ञान ने सिध्ध किया है । --
सूर्य में रहा हुआ, हिलियम वायु में से हाईड्रोजन वायु और पृथ्वी के आसपास के वातावरण में रहा हुआ ओझोन वायु में से ओक्सिजन वायु के संयोजन से, पानी बनता है, यह वैज्ञानिक सत्य है । ईस तरह पानी की उत्पत्ति भी सूर्य के कारन ही है । मतलब कि हिम, झरने, नदी, सरोवर, सागर, महासागर, ये सभीकी उत्पत्ति सूर्य के कारन ही है । ये सब के स्वरुप विभिन्न होने पर भी, वास्तविक रुप से ये सब एक ही है ।
विभिन्न स्थल पर, सूर्य की किरनें सीधी या टेढी पडने से, तापमान भी भिन्न भिन्न होते हैं । ईसकी वजह से हवा के दाब में फर्क रहेता है । ईसी वजह से हवा में गति उत्पन्न होती है । जिसे हम पवन के रुप में अनुभव करते हैं । ईस तरह पवन का उद्भव स्थान भी, सूर्य ही है । सूर्य की गरमी से ही पानी में से भांप बनती है । भांप के उर्ध्वगमन से बादल बनते हैं । पवन, बादलों को पृथ्वी के विभिन्न विस्तार में ले जाता है । भांप का तापमान कम होने से बारिश होती है । ये वैज्ञानिकों ने सिध्ध किया है ।
पृथ्वी में से ही हर किस्म की वनस्पति जन्म लेती है । बारिश से मिलते पानी से उनकी वृध्धि होती है । पृथ्वी और बारिश के पानी के बिना वनस्पति की उत्पत्ति का संभव ही नहीं है । जमीन में से मिलते पोषण की वजह से पौधे की वृध्धि होती है और सूर्य प्रकाश से ही प्रकाश संश्लेषण क्रिया द्वारा पत्ते हरे रंग के बनते हैं । ऐसे हर किस्म की वनस्पति माने फल, फुल, सब्जीयां, अनाज, दाल, चावल, सब सूर्य से ही उत्पन्न होते हैं ।
शाकाहारी -- मानवी, पशु, पंछी वगैरह वनस्पति के आधार पर अपना जीवन बिताते हैं । गेहुं, चावल, बाजरी, जुवार, मक्की ईत्यादि अनाज का प्रत्येक कण मानवी के जीवन के लिए अत्यंत आवश्यक है । घासफुस और पत्ते खाकर जीनेवाले गाय, भैंस, बकरी, घोडा, गध्धा ईत्यादि तमाम जानवर और अनाज के छोटे छोटे दाने पर जीनेवाले पंछी, वनस्पति के बिना जी नहीं सकते । जलचर प्राणी भी, पानी और उसमें से उत्पन्न होनेवाली वनस्पति के आधार पर ही जीते हैं । मांसाहारी -- मानवी, जंगली जानवर, मांसाहारी पंछी और जलचर प्राणी, अपने से निर्बल पशु, पंछी, मछली, ईत्यादि का भक्षण करके जीते हैं । ईस तरह शाकाहारी या मांसाहारी सजीव जीवसृष्टि आखिर तो सूर्य के आधार पर ही जीवीत रहेते हैं । वरना उन सभी का अस्तित्व ही नहीं रहेता ।
ईसी तरह निर्जीव सृष्टि के बारे में सोचें तो, पथ्थर, ईंट, सीमेन्ट वगैरह पृथ्वी के बिना संभव नहीं । ईसके बिना हमारा घर नहीं बन सकता । ईमारती लकडी वृक्षों को काटकर पायी जाती है । ईमारती लकडी से घर के दरवाजे, खिडकियां, फर्नीचर बनता है ।
ईतना ही नहीं, आगे सोचने से पता चलेगा कि तमाम धातु पृथ्वी में से ही प्राप्त होती है । मतलब कि साईकिल, स्कूटर, कार, ट्रेईन, एरोप्लेईन ईत्यादि जीवन उपयोगी सभी चीजें का उत्पादन पृथ्वी के बिना संभव नहीं । हमारे समग्र जीवन का आधार हवा, पानी, खुराक, घर, वस्त्र और जीवन उपयोगी तमाम चीजें के उत्पादन के लिए सूर्य का अत्यंत महत्व है । ये सभीका मूलभूत तत्व सूर्य ही है । ये बात का आधुनिक विज्ञान ने भी स्वीकार किया है ।
श्रीमद् भगवद् गीताजी मे श्रीकृष्ण भगवान ने स्वयं कहा है कि सूर्य, चन्द्र, पृथ्वी, नदी, सागर, हिमालय, पवन, वृक्ष ये सभी मेरे स्वरुप है । जो बात हम सिर्फ श्रध्धा से सच्ची मानते थे, ये 5000 वर्ष पूर्व कही गई बात को, हमारे अत्यंत आधुनिक विज्ञान ने, गहन संशोधन के बाद, सच्ची ठहरायी है । हमें ईस बात से अत्यंत आनंद और गौरव होना ही चाहिये ।
एक ही तत्व कई वस्तुओं में किस प्रकार व्याप्त हो सके ? सूर्य सभी वस्तुओं में व्याप्त है, ये बात अब हमारी समझ में आ जाएगी । (प्रकरण 7- अविनाशी आत्मा-पेज 19-20-21 में हमने विस्तृत चर्चा की है ।) फिर भी अगर समझ में न आए तो, ऐसे नास्तिक को समझाना मुश्किल होगा । जो समझना चाहता ही नहीं उसे समझाया नहीं जा सकता । परमात्मा के अस्तित्व के बारे में जो शंकाशील हो, वे भी विज्ञान की खोज के बारे में शंका नहीं कर सकते । क्योंकि ये श्रध्धा पर नहीं बल्के संशोधन आधारित सत्य है । गीताजी में जिसका वर्णन है यह विभूतियोग की बात हम न समझ सकें, उसकी वजह हमारी ज्ञान की मर्यादा हो सकती है । फिर भी हमें यह तो स्वीकारना ही पडेगा कि अखिल ब्रह्मांड में कोई ऐसा परम तत्व है, जो सजीव, निर्जीव सृ,ष्टिका कारन रुप है । वे परम तत्व माने परमात्मा ।
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