श्रीकृष्ण भगवान को पाना अत्यंत कठिन है और अत्यंत सरल भी है । परस्पर विरोधी ये दोनों बातें मानने में दिक्कत हो ऐसा लगता है, लेकिन ये संपूर्ण सत्य है । गीताजी में स्वयं श्रीकृष्ण भगवान ने कहा है कि ज्ञानी भी मुझे पहेचान नहीं सकते । वादविवाद में कुशल, कई महा विद्वान लोग, ज्ञानी होने के बावजुद, कभी भी परमात्मा के दर्शन नहीं पा सकते । पूजा, पाठ और धर्म का उपदेश देनेवाले कई संत, महंत, पूरा जीवन बीत जाए तब तक, कभी भी परमेश्वर के दर्शन नहीं पा सकते । ऐसा क्युं ?
हमारा जीवन दंभ से भरा हुआ है । हम अच्छा दिखने की जितनी कोशिष करते है, उतनी अच्छा बनने की नहीं करते । विभिन्न प्रकार के तिलक करना, माला लेकर जाप करना, नित्य पूजा करना, नियमित रुप से मंदिर जाना, ये सभी क्रियाएं लोग हमें अच्छा मानवी समझें, ऐसी प्रतिभा उत्पन्न करने का सभान प्रयत्न ही है । ऐसा हो सकता है कि, लोग हमें धार्मिक समझें, समाज मे एक अच्छा आदमी समझकर, हमें मान भी मिले, लेकिन बाह्य आडंबर से परमात्मा नहीं मिल सकते ।
ज्ञान की भांति अकेले तप से भी, परमात्मा नहीं मिलते । 'ध्रुवाख्यान' में यह बात अच्छी तरह से समझायी है -- अपर मा के कठोर वचनों से मानहानि होने से, ध्रुवजी ने द्रढ निर्धार किया कि बन में जाकर, कठिन तप कर के, परमात्मा के दर्शन पाने की कोशिष करुंगा । अगर परमात्मा नहीं मिले तो, बलपूर्वक प्राणत्याग करुंगा । वे बन में जा रहे थे तब, रास्ते में देवर्षि नारदजी मिले । ध्रुव की सभी बात ध्यान से सुनकर नारदजी ने कहा -
" બળ કીધે હરિ નહીં મળે, તમે માનોને મારા તન !
જન્મ થકી જોગી દેહ દમે, તેને સ્વપ્ને નહીં દર્શન,
દર્શન તમને કેમ આપશે ? વન જઈને વિમાસણ થાશે ..."
लेकिन ध्रुव के मन में प्रभु दर्शन की तीव्र झंखना थी । वे अपने निर्णय में अटल रहे । बन में गए, तीव्र झंखना के साथ, कठोर तप किया । आखिर परमात्मा ने प्रसन्न होकर दर्शन दिए । तीव्र झंखना का शुभ फल मिला । असंभव बात संभव हो गई । अकेला उग्र तप नहीं लेकिन अनन्य प्रेम होना भी जरुरी है । उसके बिना प्रभु न मिले ।
प्रभु के दर्शन पानेवाले भक्तकवि सूरदासजी ने अजीब बात कही -
" अजामिल, गीध, व्याध, उनमें कहो कौन साध ?
पंछी को पद पढात, गनिका सी तारी । ......"
व्याध माने शिकारी । अपने जीवन निर्वाह के लिए, निर्दोष पशुओं की हत्या करनेवाले को साधु तो कैसे कह सकते हैं ? अपने समग्र यादव कुल के विनाश के बाद, श्रीकृष्ण भगवान एक वृक्ष के नीचे आंख बंद करके बैठे थे, तब अंधकार की वजह से दूर से, उनको हिरन मानकर, जरा नाम के पारधी ने तीर मारा । नजदीक आकर उसने देखा कि उसने गलती से हिरन को नहीं बल्कि मानवी को तीर मारा है । उसने सच्चे दिल से क्षमा याचना की और खुद को सजा करने को कहा । कंस, शिशुपाल जैसे महासमर्थ योध्धाओं का वध करनेवाले श्रीकृष्ण भगवान के लिए जरा पारधी का वध करना मुश्किल नहीं था । सुदर्शन चक्र उनके पास ही था । लेकिन अत्यंत क्षमाशील श्रीकृष्ण भगवान ने उसे कहा - "तुम निष्पाप हो, तुमने अनजाने में गलती की है । तुमने जानबुझकर मेरी हत्या करने की कोशिष नहीं की । तुम्हारा कल्याण हो ।" अपने को तीर मारनेवाले व्याध को सजा करने के बजाय, क्षमा करनेवाले और उसका कल्याण हो ऐसी शुभ भावना व्यक्त करनेवाले श्रीकृष्ण भगवान की यह विरल घटना का बयान श्रीमद् भागवत में है ।
परमात्मा की भक्ति के लिए कोई कठिन शर्तें नहीं है । ज्ञान, धन, दान, पुण्य, ऐसा कुछ भी जरुरी नहीं है । विभिन्न प्रकार के तिलक करना, हर रोज मंदिर जाना, घर में नियमित रुप से पूजा करना, धून, भजन, कीर्तन करते रहेना, संस्कृत के कठिन श्लोक बोलना, ऐसा कुछ भी करने की जरुरत नहीं । ईसी प्रकार हमारी भी कोई शर्तें नहीं होनी चाहिये । अगर मुझे धन मिलेगा तो, छोटी सी रकमका दान करुंगा । नौकरी मिलेगी तो, श्रीफल चढाउंगा । मेरा या मेरे स्वजन का स्वास्थ्य अच्छा हो जाय तो, यात्रा करेंगे । ऐसी कोई भी शर्त रखना उचित नहीं है । भक्ति कोई व्यापार नहीं है । यह खुशामत भी नहीं है । प्रभु के गुणगान गाने से वे प्रसन्न नहीं होते । भक्ति माने संपूर्ण रुप से प्रभुमय हो जाना । किसी भी अपेक्षा के बिना प्रेम, संपूर्ण आत्म समर्पण । प्रभुदर्शन से आनंद पाने के लिए ही मंदिर जाना । प्रभु के पास बैठना अच्छा लगता है, ईसी लिए पूजा करना ।
" अपिचेत् सुदुराचारो भजते माम अनन्यभाक्,
साधुरेव स मन्तव्य: सम्यग् व्यवसितो हि स: .. " (गीता 9-30)
" क्षिप्रं भवति धर्मात्मा, स: च शांतिम् निगच्छति,
कौन्तेय ! प्रतिजानीहि, न मे भक्त: प्रणश्यति.... " (गीता 9-31)
परमात्मा ने दुराचारी होने का परवाना नहीं दिया । लेकिन अत्यंत दुराचारी भी अनन्य भाव से परमात्मा को भजे तो ईसे साधु समझने को कहा है । किसी संयोग वश कोई आदमी में कितने भी दोष हो, लेकिन अगर वह सुधरना चाहे तो ईसे भी मौका देने की बात है । परमात्मा के शरण में जानेवाला दुराचारी रहे नहीं सकता । हमारे सुप्रसिध्ध कवि कलापी ने बहुत सुंदर पंक्तियां लिखी है -
" હા પસ્તાવો વિપુલ ઝરણું, સ્વર્ગથી ઉતર્યું છે,
પાપી તેમાં ડૂબકી દઈને પૂન્યશાળી બને છે ..."
लेकिन पापी या दुराचारी किसे मानना ? आम आदमी की ये फितरत होती है कि अगर कोई कार्य अच्छा हुआ तो वह मैंने किया है । अगर कोई गलती हुई तो वह दूसरों की है । सभीको यश पसंद है, किसीको अपयश पसंद नहीं । और हर आदमी को दूसरे लोगों की छोटी छोटी गलतियां भी बडे फलकी तरह दिखती है । खुद की बडी बडी गलतियां भी नजर नहीं आती । सभी दूसरों का ही दोष नीकालते हैं, अपने दोष किसीको नहीं दिखता । अपने दोष दूर करके खुद को सुधारने का कार्य, किसीको पसंद नहीं है । परमात्मा को निखालसता प्रिय है । अतिशय दुराचारी को भी क्षमा करने के लिए वे तैयार है । सिर्फ निखालसता के साथ अपने दोष का स्वीकार करने की हिम्मत जुटानी चाहिये ।
संत कबीरजी ने कहा - "बुरा देखन मैं गयो, मुझसे बुरा न कोई..."
संत सूरदासजी ने तो अजीब कह दिया -"मो सम कौन कुटिल, खल, कामी,
जिसने तनु दियो ताहि बिसरायो, ऐसो निमक हरामी..."
ध्रुवाख्यान में एक बहुत सुंदर बात है । अपर मा के कठोर वचन से ही आहत होकर ध्रुवजी बन गए थे । अत्यंत कठिन तप करके उन्होंने परमात्मा के दर्शन किए । जब वापस लौटे तब अपर मा को प्रणाम करते बोले - " आपकी कृपा से ही मुझे परमात्मा के दर्शन हुए । अगर आप कटु वचन न कहेती तो मैं बन नहीं जाता, न तप करता और न मुझे परमात्मा के दर्शन होते ।" कितना सरल भाव ! अपर मा के प्रति कोई कटुता नहीं !
अन्य की निंदा या दोषदर्शन करने के बजाय अपने दोष देखनेवाले और परमात्मा को पाने की तीव्र झंखनावाले ऐसे महानुभावों को परमात्मा मिलते हैं । अगर यह शर्त हमें कठिन लगे तो परमात्मा को पाना कठिन है । अगर यह शर्त हमें सरल लगे तो परमात्मा को पाना सरल है । ईसी लिए वे पतितपावन परमात्मा श्रीकृष्ण भगवान को, सभी भक्त, सबसब से निराला मानते हैं ।
| Comments |
|

