'आत्मसंयमयोग' नाम के अध्याय नंबर 6 में, श्लोक नंबर 37 में अर्जुन ने बहुत सुंदर प्रश्न किया - " हे भगवान ! जो मानवी योग में श्रध्धावाला हो, लेकिन पूरा संयमी न होने की वजह से उसका मन योग से चलित हो गया हो, उसे योगसिध्धि तो न मिले, लेकिन कौन सी गति उसे प्राप्त होती है ? योगभ्रष्ट मानवी को सिध्धि तो न मिले, लेकिन ब्रह्ममार्ग से विमुख होने की वजह से, बादलों की तरह तितरबितर होकर उसका नाश होता है क्या ?"
परमात्मा ने अजीब अभय वचन देते हुए कहा -
"न हि कल्याणकृत् कश्चिद्, दुर्गतिम् तात ! गच्छति..." (गीता 6-40)
"हे पार्थ ! शुभ कर्म करनेवाले किसी मनुष्य का ईस लोक में या परलोक में विनाश नहीं होता । हे तात ! शुभ कर्म करनेवाले किसीकी भी, कभी भी दुर्गति नहीं होती ।" ईतना बडा श्रेष्ठ अभय वचन, दुनिया के किसी अन्य धर्मग्रंथ में नहीं होगा । योगभ्रष्ट मानवी, सत्कर्म करनेवालों के लोक को पाकर, कई साल वहां रहेने के बाद, पवित्र मनुष्यों के कुल में, श्रीमंत मनुष्यों के घर, या तो बुध्धिमान योगओं के कुल में जन्म पाता है । जगत में ऐसा जन्म अति दुर्लभ है । माने कि हर किसीको ऐसा जन्म नसीब नहीं होता । वहां जन्म के पश्चात्, उसने पूर्व जन्म में की हुई साधना के संस्कार फिर जागृत होते हैं । जहां से साधना अपूर्ण रह गई थी, वहां से आगे बढकर वह, पूर्ण सिध्धि के लिए, फिर से प्रयत्न शुरु करता है । पूर्वजन्म के अभ्यास की वजह से, उसका मन योग की ओर आकर्षित होता है और कई जन्मों की साधना के बाद, अंत में परम गति प्राप्त करता है । ऐसा योगी, -- तपस्वी, ज्ञानी या अग्निहोत्रादि कर्म करनेवाले से श्रेष्ठ माना जाता है । ईसी लिए "हे अर्जुन ! तू योगी बन ।"
गीताजी के अध्याय नंबर 8 'अक्षरब्रह्मयोग' में, श्लोक नंबर 5 में, ऐसा ही एक अभय वचन दिया है - "जो मनुष्य अंतकाल में, मेरा ही स्मरण करते करते देहत्याग करता है वह मुझे पाता है, ईसमें कोई संदेह नहीं है ।"
हमारे दुन्यवी नियमों के अनुसार, जिसको फांसी की सजा होती है उसे, मृत्यु के पहेले अंतिम ईच्छा पूछी जाती है । यथासंभव पूरी भी की जाती है । ऐसा ही कुछ कुदरती कानून है । मृत्यु के समय, हर एक मनुष्य की जो अंतिम ईच्छा हो, उसे दूसरे जन्म में पूरी की जाती है । माने कि मृत्युके समय, भोगविलास की, या धन की, या परिवार के मोह की वासना के साथ जो देहत्याग करता है, उसे मृत्यु के बाद, अंतिम ईच्छा के अनुसार नया जन्म मिलता है । फिर से पूर्वजन्म और नये जन्मके कर्म अनुसार, शुभ या अशुभ फल भुगतने ही पडते हैं । ईसी तरह जन्म मृत्यु का चक्कर चलता रहेता है । अगर ईससे मुक्ति पाना हो तो, मृत्यु के अंतिम समय पर तमाम वासनाओं को त्यागकर, परमात्मा का स्मरण करते करते मृत्यु पाना श्रेष्ठ है । ऐसा मृत्यु पानेवाले को परमात्मा मिलते हैं, ऐसा तो खुद परमात्मा ने ही कहा है । जिन्हें मुक्ति नहीं चाहिये, संसार के सुख-दु:ख में आनंद मिलता हो उसे परमात्मा जबरदस्ती मुक्ति नहीं देते । मृत्यु के समय सब कुछ छोडकर प्रभु स्मरण करे, उसे ही मुक्ति मिलती है ।
दुर्लभ जन्म पाने के बाद, अगर मानवी, उसने पाए हुए धन और सत्ता का सद् उपयोग द्वारा, समाज कल्याण की शुभ भावना से जिए तो जीवन सार्थक मान सकते हैं । लेकिन अहंकार से सिर्फ स्वकल्याण की भावना से जिए तो, निष्काम भाव न होने से जन्म मृत्यु का चक्कर चलता ही रहेता है ।
अध्याय नंबर 9 श्लोक नंबर 22 में भी परमात्मा ने एक अद्वितिय वचन दिया है । " जो मनुष्य अनन्य भाव से मेरा ही चिंतन स्मरण करता है और निष्काम भाव से मेरी उपासना करता है, ऐसे मनुष्यों का योग-क्षेम माने जीवन निर्वाह और रक्षण की जिम्मेदारी मैं उठाता हूं ।"
परम भक्त श्री नरसिंह महेता की आर्थिक स्थिति बहुत अच्छी नहीं थी । फिर भी उनके जीवन काल में, कई कठिन प्रसंग भी आसानी से संपन्न हो गए, ये हम जानते हैं । परम भक्त मीरांबाई को उनके पति ने ही, उनकी हत्या करने के लिए जहर भेजा था, प्रभु कृपा से वह अमृत हो गया, ये हम जानते हैं । ये सब बातें शायद हम न मानें, लेकिन प्रभुमय हो जानेवाले ईन्सान के लिए ये सहज है । यह परम श्रध्धा का विषय है । जो शायद हम न समझ पाए ।
अपने घर का उदाहरण लें तो यह अभय वचन की बात समझ जाएंगे । छोटा सा निर्दोष बालक अपने भोजन की, अपनी रक्षा की कोई फिक्र नहीं करता । अपने जीवन का संपूर्ण उत्तरदायित्व मां को सौंपकर वह आनंद से खेलता रहेता है । बालक के रोने से वह भूखा होगा, ऐसा सोचकर मां उसे स्तनपान कराती है, या उसकी रुचि अनुसार भोजन --
परमात्मा कितने दयालु हैं, वह तो अध्याय नंबर 9 में, श्लोक नंबर 30 में दिया गया अभय वचन पढेंगे तो समझ में आ जाएगा । "जो कोई अतिशय दुराचारी भी, अनन्य भाव से मेरा भक्त होकर मेरी उपासना करे, तो उसे साधु ही समझना ।" ईस श्लोक के तमाम शब्दों का अर्थ समझना आवश्यक है । अतिशय दुराचारी को प्रोत्साहन देने की बात नहीं है, लेकिन उसे अपना जीवन सुधारने क मौका देनेकी बात है । पाखंड से, भक्त होने का सिर्फ दिखावा करके, ज्यादा दुराचारी बनने की सुविधा देने की बात नहीं है ।ा
भक्त होना माने परमात्मा की खुशामत करना नहीं है । बिना प्रेम के, प्रभु के गुणगान गाने से प्रभु प्रसन्न नहीं होते । उपासना करना मतलब, प्रभु को प्रसन्न करने के लिए, हमारे पडौशी परेशान हो जाए ईस तरह, सारी रात झाझ-पखवाज बजाकर, किर्तन करते रहेना ऐसा भी नहीं है । साधु माने अपनी सांसारिक फर्ज अदा किए बिना, घर छोडकर संन्यासी हो जाना ऐसा नहीं है । भक्ति माने प्रभुमय हो जाना । अनन्य प्रेम से प्रभु को प्रसन्न करने की कोशिष करना । परमात्मा सर्वव्यापी है ऐसा समझकर, सभीके साथ अच्छा व्यवहार करना । सभीको सहायरुप होने की यथासंभव कोशिष करना ।
अध्याय नंबर 18 में, श्लोक नंबर 66 में, एक अद्भभूत वचन श्रीकृष्ण भगवान ने दिया है । ईन्होंने अर्जुन को कहा - " सर्व धर्मों का त्याग करके तू सिर्फ मेरी शरण में आ जा । मैं तुझे सभी पापों से बचाउंगा । तू शोक मत कर ।" परमात्मा ने ईतना बडा आश्वासन दिया फिर भी हम उनक शरण में नहीं जाते क्योंकि हम अपने जीवन में उलझे रहेते हैं और उलझे ही रहेना चाहते हैं । प्रभु किसीको जबरदस्ती मुक्ति नहीं देते ।ी
अगर हमें मुक्ति पसंद है और हम सचमुच मुक्ति पाना चाहते हैं तो, मुक्ति की झंखना करनेवाले महात्माओं की तरह हमें भी प्रार्थना करनी चाहिये । अहमदावाद में गीतामंदिर की स्थापना करनेवाले श्री विद्यानंदजी महाराज ने परमात्मा से कहा -
" ईतना तो करना स्वामी ! जब प्राण तन से नीकले,
गोविंद नाम लेकर, फिर प्राण तन से नीकले ...... "
भक्तकवि श्री दयाराम ने भी अजीब प्रार्थना की -
" મુખ, મન, લોચનમાં આવી વસજો શામળીયા વ્હાલા !
દોષ ન જોશો દર્શન દેજો હો નંદલાલા ! ....."
हे परमेश्वर ! मेरी मृत्यु के समय आप मेरे मुख में, मेरे मन में, मेरी आंखों में बस जाना । हे नंदलाला ! मेरे सारे अवगुन भूलकर मुझे दर्शन देना ।
| Comments |
|

