श्रीकृष्ण भगवान ने गीताजी में ज्ञान को बहुत महत्व दिया है । अध्याय नंबर 4 - ' कर्मब्रह्मार्पणयोग ' के बारे में अर्जुन को समझाते हुए, श्लोक नंबर 37 में कहा कि - " जैसे अग्नि लकडी को जलाकर संपूर्ण भस्म कर देता है, वैसे ही ज्ञानरुप अग्नि, सभी कर्म बंधनों को जलाकर भस्म कर देता है । क्योंकि ईस जगत में ज्ञान जैसा पवित्र कुछ भी नहीं है ।
" न हि ज्ञानेन सदृशम् पवित्रम् ईह विद्यते । "
जिसे हम सामान्य ज्ञान कहेते हैं वह, भाषा, गणित, विज्ञान, ईतिहास, भूगोल ईत्यादि के बारे में सोचें तो भी ज्ञान कितना विशाल है, यह समझ में आ जायेगा । कोलेज में एडमीशन लेने की बात हो तब, मेडीकल, एन्जीनीयरींग, कोमर्स, लो, ईलेक्ट्रोनीक्स ईत्यादि के बारे में सोचें तो ज्ञान की सीमा विस्तरती हुई नजर आएगी । ईसमें भी कई भिन्न भिन्न शाखाएं हैं, यह सोचते ही पता चलता है कि ज्ञान कल्पनातीत रुप से विशाल है । हम किसी एक शाखा में ही अभ्यास करते करते पूरा जीवन बीता दें, तो भी जीवन छोटा लगता है । फिर भी, संपूर्ण निष्णात होने की बात नहीं कर सकते । सात समंदर पार कर सकते हैं, लेकिन ज्ञानसागर को पार नहीं कर सकते ।
यह बात तो सामान्य ज्ञान की हुई । अगर अद्भूत तत्वज्ञान की बात करें तो अत्यंत विस्मयकारक यह दुनिया किसने बनाई होगी ? वे कहां रहेते होंगे ? वे कैसे होंगे ? वे क्या करते होंगे ? ये सभी प्रश्नों के उत्तर गीताजी में है । ' ज्ञानविज्ञानयोग ' नाम के सातवें अध्याय में श्लोक नंबर 4 में श्रीकृष्ण भगवान ने कहा है -
" भूमि:, आप:, अनल:, वायु:, खम्, मन:, बुध्धि:, एव च,
अहंकार ईतीयम् मे भिन्ना प्रकृति: अष्टधा...."
" पृथ्वी, पानी, अग्नि, वायु, आकाश, मन, बुध्धि और अहंकार, ऐसे ये आठ रुप से मेरी प्रकृति बनी हुई है । यह मेरी अपरा प्रकृति है । वह जड है । दूसरी मेरी जीवरुप चेतन प्रकृति को भी समझ ले । ईसीसे यह पूरा विश्व धारण किया गया है । सभी सजीव प्राणी यही प्रकृति में से उत्पन्न हुए हैं । यह समग्र जगत का उत्पादनकर्ता और संहारकर्ता मैं ही हूं । हे धनंजय ! मुझसे अधिक श्रेष्ठ और कुछ भी नहीं है । जैसे धागे में मोती पिरोया हुआ होता है, वैसे ही यह पूरा विश्व मुझमें पिरोया हुआ है । "
"हे भरतश्रेष्ठ अर्जुन ! दुखी, जिज्ञासु, धन की कामनावाले और ज्ञानी, ये चार प्रकार के मनुष्य मुझे भजते हैं । उनमें से सदैव मुझमें तन्मय, अनन्य भक्तिवाला ज्ञानी उत्तम है । ज्ञानी को मैं बहुत प्रिय हूं और मुझे ज्ञानी बहुत प्रिय है ।
गीताजी के सातवें अध्याय में 19 वे श्लोक में कहा है -
" बहुनाम् जन्मनाम् अंते, ज्ञानवान माम प्रपद्यते,
वासुदेव: सर्वम् ईति, स महात्मा सुदुर्लभ: ......"
"कई जन्मों के बाद, यह सब कुछ वासुदेवमय है, ऐसे ज्ञानवाला ज्ञानी मुझे भजता है । ऐसा महात्मा अति दुर्लभ होता है ।" उपरोक्त सब बातें उत्तम ज्ञानी किसे कहेते हैं, यह दिखाता है । खुद परमात्मा ने ऐसे ज्ञानी महात्मा को अति दुर्लभ कहा है । परमात्मा ने किसी श्रीमंत मानवी या सत्ताधारी मानवी की सराहना नहीं की है, लेकिन ज्ञानी की ही सराहना की है ।
जिसे हम तोता जैसा, यानि पुस्तकीया ज्ञान कहेते हैं, उसका कोई महत्व नहीं है । सिर्फ शास्त्र-पुराणों के जानकार, या ज्ञान के कई ग्रंथ पढनेवाले किसी मानवी को हम ज्ञानी नहीं कह सकते । स्वयं ज्ञानी है, ऐसा माननेवाला अहंकारी मानवी, ज्ञानी हो ही नहीं सकता । वह तो बहुत विनम्र ही होता है । परम संत ज्ञानेश्वर, जिन्होंने 12 साल की कम उम्र में गीताजी पर भाष्य लिखा, वे बहुत विनम्र थे । उन्होंने बहुत अच्छी बात कही - "गीताजी के किसी श्लोक का अर्थ ऐसा है, यह मैं नहीं कहे सकता, क्योंकि गीताजी का ज्ञान तो बहुत गहन है, सिर्फ मैं ऐसा समझा हूं, ऐसा कह सकता हूं ।" के गहन ज्ञान के बारे में ऐसा कहेते हों तो, हम जैसे आम आदमी की तो बात ही क्या ? हमारी हालात के बारे में गुजरात के सुप्रसिध्ध कवि श्री अखा भगत ने बहुत सुंदर वर्णन किया है । एक परम ज्ञानी, महान संत गीताजी
कूंआ बहुत गहेरा हो और उसमें से पानी निकालने की डोल में बडा छिद्र हो तो क्या हालात होगी ? कूएं के तल से डोल जब तक जमीन तक आ जाए, तो फिर खाली हो गई होगी । उसमें पानी नहीं बचेगा । ज्ञान के कई ग्रंथ पढें, कोई संत का सत्संग करके ज्ञान की बातें सुनें, लेकिन हमारे दोष दूर न करें तो, हमारी डोल तो, दोष के छिद्र की वजह से, रिक्त ही रिक्त रह जायेगी । सुप्रसिध्ध संत श्री तुलसीदासजी ने भी बहुत सुंदर कहा –
" काम, क्रोध, मद, लोभ की, जब लग मन में खान,
क्या पंडित ? क्या मूरखा ? दोनों एक समान ..."
अगर अपने मन की डोल में, काम, क्रोध, अहंकार और धनलोभ के बडे बडे छिद्र हो तो ज्ञान नहीं टिक सकता । ये सभी छिद्रों को दूर करने की यथासंभव कोशिष करें, तभी ज्ञान टिक सकता है । अगर गीताजी का गहन ज्ञान हमारी समझ में न आए, फिर भी जितना हो सके उतना निजी स्वार्थ कम करें । निष्काम बनने की कोशिष करें । परमात्मा सभीमें बसे हुए हैं, यह समझकर दूसरों की हो सके ईतनी सहायता करें । धर्म का सही अर्थ दूसरों की सहायता करना ईतना ही है । अगर यह बात ठीक से समझ में आ जाय तो दूसरों को परेशान करने की वृत्ति ही नहीं रहेगी । अन्य धर्म में माननेवालों को जिन्दा जलाने की और बहेनों की ईज्जत लूटने की हल्की मनोवृत्ति ही न रहे । धर्म के सच्चे अर्थ को न समझनेवालों ने झुठे झनुन की वजह से, दुनिया को नर्क बना डाला है । ऐसे हीन कृत्यों को राजकारण के नाम पर समर्थन मिलता है, या तो छिपाने की कोशिष की जाती है, यह हमारी बदनसीबी है । ऐसे हीन कृत्यों को रोकने के लिए न्याय में विलंब नहीं होना चाहिये ।
ज्ञान पाने के लिए ईधर उधर भटकने की जरुरत नहीं है । संत वेषधारी किसी दंभी आदमी की चुंगाल में न फंसे । ऐसे लोग, धर्म के नाम पर सिर्फ धन ईकठ्ठा करने की वृत्तिवाले होते हैं । ईतना ही नहीं कभी कभी लोगों की धर्मभावना का नाजायज फायदा उठाकर, ऐसे हीन लोग, महिलाओं का शीलभंग करने की भी कोशिष करते हैं । बिना सोचे समझे किसीको गुरु बनाना उचित नहीं । ऐसे पाखंडी गुरुओं से दूर रहेना ही अच्छा है । आश्रम बनाने के नाम पर सरकारी या किसी दूसरे आदमी की जमीन हडप लेने के कौभांड होते ही रहेते हैं । अखबार में ऐसे बहुत समाचार हम पढते हैं ।
ज्ञान पाने के लिए दूसरों के दोष देखने के बजाय हम अपने दोष देखें और उसे कम करने की कोशिष करें । यही सच्चा ज्ञान है । ईससे परमात्मा प्रसन्न होंगे । जीवन की परम सिध्धि यही तो है ।
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