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12. अवतार

श्रीकृष्ण भगवान स्वयं कब और क्युं अवतार ग्रहण करते हैं ? ईस विषय में अध्याय नंबर 4 में श्लोक नंबर 7 और 8 में जिक्र किया है ।

" यदा यदा ही धर्मस्य ग्लानिर्भवति भारत !

अभ्युत्थानम् अधर्मस्य, तदात्मानम् सृजाम्यहम्,

परित्राणाय साधूनाम्, विनाशाय च दुष्कृताम्,

धर्मसंस्थापनार्थाय संभवामि युगे युगे........"

वैसे तो यह श्लोक सरल है, फिर भी ' मणिकांत काव्यमाला ' नाम की पुस्तक में     श्री मणिकांत नाम के सज्जन ने ज्यादा सरल अनुवाद किया है ।

" જગતમાં ધર્મની પડતી અધર્મે થાય છે જ્યારે,

નિરાકારી છતાં ભારત ! લઉં અવતાર હું ત્યારે... "

यह तो बहुत सरल बात हो गई । जगत में धर्म की कमी हो और अधर्म की वृध्धि हो, तब धर्म संस्थापना के लिए परमात्मा अवतार ग्रहण करते हैं । सज्जनों की रक्षा के लिए और दुर्जनों के विनाश के लिए परमात्मा हर युग में अवतार ग्रहण करते हैं । लेकिन यह सरल बात समझने के लिए हमें धर्म और अधर्म के बीच क्या फर्क है ? वह समझना  चाहिये । धर्म माने तिलक या और कोई चिन्ह करनेवाले को धार्मिक कहेना चाहिये ? नियमित रुप से पूजापाठ करनेवाले को, लेकिन अन्य मानवीओं के प्रति होते हुए अन्याय और अत्याचार के प्रति आंखमिचौली करनेवाले को धार्मिक मानना चाहिये ? या तो जो स्वयं किसी धर्म में मानता हो, वही सच्चा धर्म है, ऐसा मानकर तलवार या छूरी लेकर फिरे और अन्य धर्म में माननेवाले की हत्या करके, वह खुद ही सच्चा धार्मिक है, ऐसा माननेवाले को धार्मिक मानें ? धर्म के नाम पर जिन्दा आदमिओं को जलानेवाले नराधमों को धार्मिक समझना चाहिये ? यह बहुत पेचीदा सवाल है । क्या ऐसे धार्मिक लोगों की रक्षा के लिए परमात्मा अवतार ग्रहण करते होंगे ?

मंदिर या मस्जीद में नियमित रुप से जाना, परमात्मा की पूजा, या अल्लाह की ईबादत करना, पाठ, जप, तप, तीर्थयात्रा या हज करना, ये सभी बहुत अच्छी बातें हैं, जीवन को उन्नत बनाने के लिए ये सभी बहुत महत्वपूर्ण है । फिर भी बिना कुछ सोचे समझे, सिर्फ यंत्रवत् ये सब करने का कोई मतलब नहीं । गुजरात के सुप्रसिध्ध कवि श्री अखा भगत ने ऐसी सभी बाह्य क्रियाओं के प्रति अपना विरोध प्रगट किया है ।

" એક મૂરખને એવી ટેવ, પથ્થર એટલા પૂજે દેવ,

બીજો મૂરખ ભેગો થયો, પથ્થર મૂર્તિ તોડી રહ્યો,

તીરથ ફરતાં ત્રેપન થયાં, જપમાળાનાં નાકાં ગયાં.

ફરી ફરીને થાક્યાં ચરણ, તો યે ન પહોંચ્યો હરિને શરણ...."

यही बात परमात्मा के परम भक्त श्री नरसिंह महेता ने भी बहुत अच्छी तरह समझाई है ।

" શું થયું તપ, તીરથ, વ્રત કીધા થકી, શું થયું ગંગજળ પાન કીધે ?

શું થયું છાપાં ને તીલક કીધા થકી, શું થયું માળા ગ્રહી નામ લીધે ?..."

ये शब्द किसी आम आदमी के नहीं है । परमात्मा के चरणों में संपूर्ण आत्म- समर्पण करनेवाले और परमात्मा के दर्शन पानेवाले परम भक्त के हैं । जीवन की प्रत्येक विषम परिस्थिति को हंसते हंसते सहन करनेवाले वे, स्थितप्रज्ञ और परम सज्जन मानवी भी बाह्य आचार को महत्व नहीं देते थे । हम धार्मिक हैं, ऐसे दिखावे की कोई जरुरत नहीं है । प्राणी मात्र में परमात्मा बसे हुए हैं, ऐसे गीता वाक्यों को कंठस्थ करना और जिन्दा मानविओं को अछूत समझकर उनके साथ दुर्व्यवहार करना यह धर्म नहीं है । हरिजनों को अछूत मानने का विरोध उन्होंने आज से 500 वर्ष पूर्व किया था । वे हरिजनवास में प्रभु भजन करने गए थे । धर्म की बातें नहीं, आचरण का महत्व है । यही सच्चा धर्म है ।

महाराष्ट्र के परम संत एकनाथजी बनारस यात्रा के लिए गए । वहां से गंगाजल ले आए । भगवान श्री रामेश्वर महादेवजी को गंगाजल का अभिषेक करने की शुभ भावना   थी । यात्रा दरम्यान एक गध्धे को प्यास से व्याकुल देखकर, पूरा गंगाजल उसे पिला  दिया । भगवान श्री रामेश्वर महादेवजी की सच्ची पूजा हो गई, ऐसा सोचकर वे बहुत प्रसन्न हुए । प्राणी मात्र में परमात्मा बसे हुए हैं, ऐसे ज्ञान के शब्दों को कंठस्थ करने के बजाय, प्यासे गध्धे को पानी पिला के उन्होंने परमात्मा की पूजा की । ज्ञान की बातें नहीं, ज्ञान का वादविवाद नहीं, ज्ञान का प्रदर्शन नहीं, आचरण का महत्व है । यही सच्चा ज्ञान है ।

हर रोज मंदिर जाकर प्रभु के दर्शन करना, यह अच्छी बात है । लेकिन भूख से पीडित किसी मानवी को थोडा अन्न देना, ठंड से परेशान किसी आदमी को कंबल देना, यही सच्चा धर्म है । और परमात्मा भी ऐसी कोशिष से प्रसन्न होंगे, यह निर्विवाद है । खुद सुखी होने के बजाय, दूसरों को सुखी करने का प्रयत्न करना, यही सच्चा धर्म है । खुद सुखी होना यह बुरा नहीं है । अपने परिवार को सुखी करना, यह भी बुरा नहीं है । रिश्वत लेके या अन्य प्रकार से, दूसरों को परेशान करके, खुद सुखी होने की, या परिवार को सुखी करने की, कोशिष करना यह अधर्म है । अपनी खुशी के लिए, हमें किसी प्रकार दूसरों का अहित नहीं करना चाहिये । स्वकल्याण नहीं लेकिन सभी का कल्याण हो, ऐसी भावना फैलाने के लिए परमात्मा अवतार लेते हैं ।

हमारे समाज में कई ऐसी बहेनें होंगी जिन्हें अपनी शीलरक्षा के लिए जरुरी वस्त्र भी नसीब नहीं होते । श्री ईन्दुलाल गांधी नाम के सज्जन ने 'ભાદરમાં ધુએ લુગડાં ભાણી'  नाम के अपने काव्यमें बहुत वेदना भरी पंक्तियां लिखी है –

" વસ્તર વિનાની ઈસ્તરી જાતને સારુ, પડી જતી નથી કેમ મોલાતુ,

ઉભાં ઉભાં કરે ઝાડવાં વાતુ..."

ये काल्पनिक काव्य है, फिर भी हमारे समाज में ऐसी कई दुर्भागी नारी है, यह कटु वास्तविकता हमें स्वीकारनी ही होगी । ऐसा ही एक द्रश्य देखकर गांधीजी ने बहुत मर्यादित कपडे पहनने का निर्णय करके सादगी पूर्ण जीवन बनाया । महर्षि दयानंद सरस्वतीजी ने निजी कल्याण का, परमात्मा की आराधना का मार्ग छोडकर, राजा महाराजाओं को मिल के दरीद्र जनता को सुखी करने की सलाह दी । भ्रष्टाचार की वजह से महेंगाई बढती जा रही है और दरीद्र जनता ईसका शिकार होती है । क्या ऐसी महिलाओं को हम पुराने वस्त्र भी नहीं दे सकते ? परमात्मा अवतार ग्रहण करे तब तक राह देखेंगे क्या ? शायद हम सोचें कि ईसमें हमारा कोई कसूर नहीं, लेकिन भ्रष्टाचार में कहीं न कहीं हमारी थोडी सी जिम्मेदारी जरुर होगी । निजी स्वार्थ कम करके, हम  दूसरों की थोडी भी सहायता करें तो, परमात्मा को अवतार ग्रहण करने की जरुरत नहीं होगी ।

एक वर्ग ज्यादा से ज्यादा श्रीमंत हो और दूसरे वर्ग को कडी कठिनाईयां झेलनी पडे, यह असमतुला कभी गंभीर समस्या का रुप ले सकती है । मीनीस्टरों के करोडों रुपये का कौभांड एक सामान्य घटना बन गई है । अखबारों में ऐसे दुर्गंध भरे समाचार बार बार छपते हैं । लोकशाही में जनता के सेवक, सासद या विधानसभ्य, राजाशाही ठाठ से रहेते  हैं । राष्ट्रपिता महात्मा गांधीजी जैसी सादगी किसी को पसंद नहीं । हमारे भूतपूर्व प्रधानमंत्री श्री लालबहादुर शास्त्रीजी की प्रामाणिकता दंतकथा बन के रह गई है । ये महानुभावों के जीवन से प्रेरणा लेकर हमें सुधरना चाहिये । सिर्फ भ्रष्टाचार की निंदा करने से उसे दूर नहीं किया जा सकता । हमें खुद को भ्रष्टाचार से दूर रखना चाहिये । तभी वह कम होगा । अपने बच्चों को सादगी से जीना सीखाएं, निजी स्वार्थ के लिए किसीको परेशान न करें, ऐसा समझाएं,  तभी समाज में सुगंध फैलेगी ।

हम सच्चे दिल से परमात्मा से प्रार्थना करें कि –"आप को जगत में अवतार ग्रहण करने का जब जी चाहे तब करना, हमें कोई आपत्ति नहीं । लेकिन मेरे हृदय में तो, बिना विलंब ही अवतार ग्रहण किजियेगा । आपने श्रीकृष्ण के रुप में कारागार में घोर अंधकार में ही जन्म लिया था । तत्पश्चात जगत में दिव्य प्रकाश फैलाया था । मेरे हृदय में भी घोर अंधकार ही है । आपके जन्म के लिए सुयोग्य वातावरण है । मुझे घोर अंधकार से निकालकर प्रकाश की ओर ले चलो,  प्रभु ! मेरी मृत्यु सफल हो जाए । आप के बिना मैं अधूरा हूं । प्रभु ! किसी ओर को शायद कम होगी, मुझे आप की बहुत जरुरत है । हे तेजपुंज ! मेरे हृदय में अवतार ग्रहण किजियेगा ।"

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