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11. कर्मयोग

श्रीकृष्ण भगवान ने गीताजी में तीन योग पर बहुत जोर दिया है । कर्मयोग, ज्ञानयोग और भक्तियोग । अध्याय नंबर 3, 4 और 5 में कर्मयोग के बारे में विस्तार से समझाया है । ये तीन अध्याय के नाम 'कर्मयोग', 'कर्मब्रह्मार्पणयोग' और 'कर्मसंन्यासयोग'  हैं । तीनों नाम बहुत सरल और सूचक है । कोई भी शुभ या अशुभ कर्म के साथ फल तो जुडा हुआ है ही । ईसी लिए अर्जुन ने पूछा - "आप निष्काम भाव से कर्म करने को कहेते हो तो, अगर फल पाना ही नहीं है तो कर्म करनेकी आवश्यकता ही क्या है ?"

तब परमात्मा ने उत्तर दिया कि - " कर्म करना कुदरती है । मानवी चाहे या ना चाहे, फिर भी कर्म किए बिना नहीं रहे सकता । उसका स्वभाव ही उसे कर्म करने पर मजबर करेगा । परिणाम स्वरुप कर्मफल तो भुगतना ही पडेगा । यह कर्मयोग है । कोई संसार का त्याग कर दे तो भी कर्म का त्याग नहीं कर सकता । संन्यासी को भी कर्म तो मजबूरन करने ही पडते हैं । संन्यास लेने के बाद भी, मानवी कर्म से दूर नहीं जा सकता । फलस्वरुप कर्म से उदभवती अशांति तो संन्यासी को भी परेशान करती है ।"

लेकिन जब मानवी फल की किसी अपेक्षा के बिना, सिर्फ अपने कर्तव्य के रुप से कर्म करता है और वह कर्म परमात्मा के चरनों में अर्पित कर देता है, तो वह कर्म बंधनकारक नहीं होता । गीताजी में श्रीकृष्ण भगवान ने यही बात भिन्न भिन्न अध्याय में, बार बार दोहराई है । लाभ-गेरलाभ, यश-अपयश, सफलता-निष्फलता, जय-पराजय, सुख-दु:ख ये सभी कर्मफल है । ईनकी अपेक्षा के बिना किया हुआ कर्म ही श्रेष्ठ कर्म है । अगर कर्मफल परमात्मा के चरनों में अर्पित कर दें तो फिर चिंता करने की कोई वजह ही नहीं रहेती । अगर हम अपना जीवन प्रभु चरनों में रख दें तो, जीवन से जुडे हुए कोई द्वंद हमें बाधा नहीं कर सकता । सीधी सरल बात है । जब अपना जीवन ही अपना न हो तो, जीवन से जुडा हुआ कोई भी द्वंद हमें कैसै बाधा पहूंचा सकता है ? मृत्यु के पहेले ही हम जीवनमुक्त हो सकते हैं । कैसी भी विषम परिस्थिति में मानवी स्थिर रह सकता है । ऐसी स्थिर बुध्धिवाले मानवी को स्थितप्रज्ञ कहा है । ऐसी स्थिर बुध्धिवाले मानवी को ही परम शांति का अनुभव होता है । यही कर्मब्रह्मार्पणयोग है ।

कर्म नहीं करने को कर्मसंन्यास कहेते हैं । जब मानवी संसार का त्याग करता है, तब उसने संन्यास लिया ऐसा कहेते हैं । संसार के कर्मों के त्याग को कर्मसंन्यास कहेते हैं, लेकिन परमात्मा कहेते हैं कि कर्मसंन्यास नहीं परंतु कर्मफलसंन्यास ही श्रेष्ठ है ।

एक दोस्त ने बहुत अच्छी बात कही कि कोई अच्छे ईन्सान को किसी वजह से कैद की सजा हो तो वह कैद से छूटने की कोशिष करता है और फिर से कारागार में जाना न पडे ऐसा प्रयत्न करता है । जीवन मरण के चक्कर में फंसे हुए महानुभावों को यह बात लागु होती है । उनके लिए 'कर्मब्रह्मार्पणयोग' या तो 'कर्मफलसंन्यासयोग' बहुत उत्तम है । ये दोनों नाम भिन्न भिन्न है , लेकिन अर्थ एक ही है ।

     जिनको हम पक्का गुनेहगार के नाम से पहेचानते हैं, जो बदमाश ही है, उनको एक के बाद एक सजा होती ही रहे, फिर भी कोई असर न होती हो, उनको तो कारागार बदले, ईसका शायद दु:ख ही नहीं होता । एक कारागार से छूटे तो दूसरे कारागार में जाना पडे । उनके लिए साबरमती कारागार हो या तिहार कारागार हो, कोई फर्क नहीं पडता । हम ऐसी कक्षा के हैं । उसी कारन जन्म मरण का चक्कर चलता ही रहेता है । हम खुद को सुधारने की कोशिष ही नहीं करना चाहते । ईसी वजह से कारागार में से छूटने की कोई संभावना ही नहीं रहेती । शरीर बदलते रहेते हैं, लेकिन आत्मा की मुक्ति नहीं होती ।

जीवनमुक्त संत का देहांत होता है, तब लोग कहेते हैं कि वे देव हो गए । जो प्रभुशरण में गया उनका शोक क्या करना ? आम आदमी चल बसे तो लोग कहेते हैं वह तो फिर लौटा । ( એ તો પાછા થયા.) जिसकी मुक्ति की संभावना ही नहीं, जो बार बार लौटता है, ऐसे आदमी के लिए शोक करना उचित है । उसकी मृ्त्यु के लिए शोक नहीं, क्योंकी यह तो निश्चित है, लेकिन मानव जीवन मिलने पर भी उसने छूटने की कोशिष ही नहीं की, यह शोक की बात है । शायद ईसी लिए आत्मा शरीर बदलती रहेती है और अपने किए हुए शुभ-अशुभ कर्मों का फल भुगतने के लिए बार बार जन्म लेता है । ऐसे आदमी को अशांति की फरियाद करने का कोई अधिकार नहीं । श्रीमद् आद्य शंकाराचार्यजी ने हमें मूढ कहेकर टकोर की है कि -

"पुनरपि जननम्, पुनरपि मरणम्, पुनरपि जननी जठरे शयनम्,

भज गोविन्दम्, भज गोविन्दम्, गोविन्दम् भज मूढमते..."

गीताजी का उपदेश गहन है । हो सकता है कि कुछ बात हम समझ न पाएं, लेकिन किसी महात्मा से या जिसने गीताजी का गहन अभ्यास किया हो ऐसे विद्वान से हम कुछ जानने की कोशिष करें तो बहुत आनंद मिले । पूज्य रवीशंकरदादा के प्रवचन पर आधारित      

'गीता बोध वाणी' ग्रंथ का अभ्यास करें, तो यह दोनों द्रष्टि से बहुत उत्तम है । क्योंकि दादा संत भी थे और गीताजी का गहन अध्ययन उन्होंने किया था ।

श्रीकृष्ण भगवान ने अध्याय 4 में कहा है कि - "यज्ञ के चार प्रकार है । हर आदमी को किसी भी एक यज्ञ करना ही चाहिये । यह चार यज्ञ माने (1) कर्मयज्ञ (2) तपयज्ञ (3) योगयज्ञ (4) ज्ञानयज्ञ । ईन यज्ञों में ज्ञानयज्ञ सर्वश्रेष्ठ है । सामान्य रुप से यज्ञ माने अग्नि में घी और अन्य पदार्थों की आहूति देना, लेकिन उपरोक्त चारों यज्ञ कुछ अलग है ।

(1) कर्मयज्ञ - माने कर्म अग्नि में ईच्छाओं की आहूति देना । कोई भी कर्म ईच्छाओं का त्याग करके करना । किसीका अहित न हो ईसका खयाल रख के, नजी कल्याण के लिए नहीं, लेकिन समाज कल्याण के लिए कर्म करना । सब कुछ परमात्मा को अर्पित करके, परमात्मा को पाने की कोशिष करना ।ि

(2) तपयज्ञ - माने तप अग्नि में शरीर के कष्टों की आहूति देना । शरीर का विशेष रुप से खयाल न रख के तप करना । प्रात: उठ के ठंडे पानी से स्नान करके आलस का त्याग करना । उपवास करके भूख और स्वाद पर अंकुश पाना । मौन रहेकर वाणी पर संयम रखना । ठंड, धूप और बारिश सहेकर शरीर को सुद्रढ बनाना और विकारों पर काबू पाना । ईस तरह, परमात्मा को पाने की कोशिष करना ।

(3) योगयज्ञ - माने योग अग्नि में मन की आहूति देना । मन के विचारों और विकारों पर काबू पाने की कोशिष करना । परमात्मा के ध्यान में तल्लीन होकर, मन को वश करना । प्राणायम, योग वगैरह द्वारा श्वासोच्छ्वास पर काबू पाकर, मन की अति चंचलता को रोकना । ईस तरह परमात्मा को पाने की कोशिष करना ।

(4) ज्ञानयज्ञ - माने ज्ञान अग्नि में अज्ञान की आहूति देना । परमात्मा सर्वव्यापी  है । जो कुछ दिखता है, वह सब कुछ परमात्मा का ही स्वरुप है ऐसा समझना । कर्म करने पर भी, अकर्ता होकर, माने परमात्मा को आत्मसमर्पण करके अहंकार का त्याग करना । यह सर्वश्रेष्ठ मार्ग पर चलकर सबका कल्याण हो, ईस तरह जीना । ईस तरह परमात्मा को पाने की कोशिष करना ।

ईस प्रकार चारों यज्ञ का अंतिम ध्येय तो परमात्मा को पाने का ही होना चाहिये ।

दहेरादून- मसूरी के पास भारत के महान संन्यासी स्वामी श्री रामतीर्थजी का आश्रम है । किसीने उनसे पूछा - "आप यज्ञ में मानते हो या नहीं ?" उन्होंने उत्तर दिया - "मैं यज्ञ में अवश्य मानता हूं । लेकिन मेरी और आप की यज्ञ की परिभाषा में थोडा फर्क  है । आप अग्नि में घी और अन्य पदार्थोंकी आहूति की क्रिया को यज्ञ मानते हो । मैं, भूखे लोगों की जठराग्नि में घी और अन्य पदार्थों की आहूति की क्रिया को यज्ञ मानता हूं ।" भूखे मानवी को अन्नदान करना, यह सर्वश्रेष्ठ दान है, सच्चा यज्ञ है, ऐसा तो श्रीकृष्ण भगवान ने कहा है ।

अगर यह बात ठीक से समझ में आ जाय तो गीताजी कंठस्थ करने की आवश्यकता नहीं ।

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