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10. ईच्छाएं

श्रीकृष्ण भगवान ने श्रीमद् भगवद् गीताजी के दूसरे अध्य़ाय में अर्जुन को स्थितप्रज्ञ के बारे में समझाते हुए, ईच्छाओं को अशांति का मूलरुप मानते हुए, ईनका त्याग करने पर जोर दिया है ।

" प्रजहाति यदा कामान् सर्वान्, पार्थ ! मनोगतान्,

आत्मनि एव आत्मना तुष्ट: स्थितप्रज्ञ: तद् उच्यते । ..."

"जब मानवी, मन में से उठनेवाली सर्व ईच्छाओं को त्यागकर, स्वयं अपने आप ही में संतुष्ट रहेता है, तब उसे स्थितप्रज्ञ कहेते हैं ।" स्थितप्रज्ञ माने स्थिर बुध्धिवाला   मानवी । ईच्छाओं का त्याग करने से बुध्धि स्थिर होती है । ईच्छाओं का त्याग न करे तो बुध्धि स्थिर नहीं होती । मानवी का मन सदा भटकता ही रहे, उसे शांति नहीं मिलती ।

ईच्छा, कामना, वासना, अपेक्षा, ये सभी एक दूसरे के पर्याय शब्द ही हैं, और ये मन में से उठनेवाली तरंगें हैं । कोई ईच्छा हुई, हमने यह पूरी कर दी, तो बात खत्म हो गई, ऐसा नहीं है । एक ईच्छा पूरी हुई न हुई, ईतने में दूसरी ईच्छा का जन्म होता है । ये सदा उठनेवाली तरंगें हैं और हम ईस भंवर में फंसकर सारा जीवन बता देते हैं ।  ईतना काफी नहीं है । यह विषचक्र की असर का जिक्र, गीताजी के दूसरे अध्याय में श्लोक नंबर 62 और 63 में बहुत अच्छी तरह से किया है । विषयों के बारे में, बार बार सोचने पर कामना जन्म लेती है । कामना असंतुष्ट होने पर क्रोध जन्म लेता है । क्रोध से संमोह माने अच्छे-बुरे का खयाल नहीं रहेता, फल स्वरुप स्मृति भ्रष्ट होती है, ईससे बुध्धि का नाश होता है, अंत में सर्वनाश होता है । क्रोध से बुध्धिनाश होने से मानवी अशांत होता है, उसे शांति नहीं मिलती, उसे सुख कहांसे मिले ? हम खुद के अनुभव के बारे में सोचें तो हम बात बात में क्रोधित हो जाते हैं, हमारी ईच्छा के विरुध्ध कुछ भी हो तो, हमारे अहम् को ठेस पहूंचती है और हम अशांत बन जाते हैं ।

क्रोध की भयानक असरों का हम सभी अनुभव करते हैं, फिर भी क्रोध का त्याग नहीं करते । क्रोध में बोलने का खयाल नहीं रहेने से परिवार के स्वजनों के बीच क्लेश होता है । संबंध तूटते हैं, कभी हाथापायी, खून या आत्महत्या जैसी गंभीर दुर्घटनाएं भी होती हैं । क्रोध से सिर्फ दूसरों को ही नुकशान होता है, ऐसा नहीं है । यह स्वयं हमको भी भयंकर नुकशान करता है । हाई ब्लडप्रेशर, हृदयरोग जैसे बहुत गंभीर रोग उसका ही नतीजा है । ये सब मुश्केलियों की मूल वजह ईच्छाएं है, ऐसा हमने कभी सोचा है ?

जीवन निर्वाह के लिए धन आवश्यक है । ईसी लिए धन पाने की ईच्छा स्वाभाविक  है । जीवन निर्वाह के लिए जरुरी धन मिल जाय तो भी ईतने से संतोष नहीं होता । लेकिन वैभव की ईच्छा जागृत होती है । घरमें टीवी, फ्रीझ, वोशींग मशीन वगैरह होना ही चाहिये ऐसा लगता है । परिश्रम से प्रामाणिक रुप से, ईतना धन मिले तो वैभव बढाने में कोई आपत्ति नहीं । लेकिन ईतना धन न मिलने पर भी, वैभव बढाने की ईच्छा से मानवी को ऱिश्वत लेने की ईच्छा होती है । ईस तरह छोटी सी बात पतन की ओर ले जाती है । रिश्वत लेना शुरु करने के बाद अगर कोई रिश्वत देने से ईन्कार करे तो उसका काम करने को मन नहीं होता । ऐसे कामचोरी शुरु होती है । आखिर पूरी तनख्वाह मिलने पर भी कार्य कम करने की वृत्ति बढती जाती है । हम समाज को बहुत नुकशान करते हैं ।

वैभव की ईच्छाओं का कोई अंत नहीं । टीवी, फ्रीझ ये तो छोटी सी शुरुआत है । धीरे धीरे, सायकिल की बजाय स्कूटर, मोटर, - छोटे मकान के बजाय बडा फलेट, बंगलो, किमती फर्नीचर, प्रवास, विदेश प्रवास ऐसे अनेकविध ईच्छाएं जागृत होती है । ये सब ईच्छाएं पूरी करने के लिए अगर अपनी आमदनी कम हो तो, विवाह के समय पर और उसके बाद भी पत्नी के मायके से दहेज के रुप में रकम मांगी जाती है । सच पूछो तो, किसीसे कुछ मांगने के लिए हाथ फैलाना, वह अपनी कमजोरी प्रगट करने जैसा है । अपने ही हाथों अपना स्वमान का गला घोंटने की बात है । लेकिन भिक्षुक वृत्तिवाले आदमी को कोई शर्म नहीं होती । ईतना ही नहीं, अपनी मांग के मुताबिक अगर दहेज न मिले तो लग्न के पहेले सगाई तोड देने की धमकी दी जाती है । अगर लग्न संपन्न हो गए हैं तो, नई दुल्हन को शारीरिक और मानसिक त्रास देने का आरंभ हो जाता है । ऐसी परिस्थिति में या तो कन्या खुद ब खुद तंग आकर आत्महत्या कर लेती है, या तो पति, सास, श्वसुर, दियर, ननंद वगैरह मिल के कन्या को जिन्दा जला देते हैं ।

यह कोई काल्पनिक बात नहीं है । अखबारों में कई दफा ऐसे समाचार छपते हैं । ईनके अलावा, ऱिश्वत मांगनेवाले अधिकारी गण, धन से बीकनेवाले राजकारणी गण, दहेज की कुप्रथा की वजह से होती हुई आत्महत्या या खून के समाचार हम पढते हैं । समाज का अध:पतन हम सब आंखें खुल्ली रखकर देखते हैं । सिर्फ कोरी चर्चा करने से एक भी दूषण कम नहीं होगा । हम सुधरेंगे, तभी समाजमें सुधार होगा ।

किसीकी आमदनी सचमुच बहुत कम हो, परिवार का निर्वाह मुश्किल हो, ऐसा आदमी थोडी रिश्वत ले, तो ईसे क्षम्य मान सकते हैं, लेकिन सभी के लिए क्षम्य नहीं हो सकता । रामायण हिन्दु धर्म का आदर्श ग्रंथ माना जाता है । उनके रचयिता श्री वाल्मिकि ऋषि पूर्वाश्रम में, परिवार के निर्वाह के लिए लुंटफाट करते थे ।  आदर्श ग्रंथ के रचयिता ऐसा कर सकता है, तो हम क्यों नहीं कर सकते । ऐसी दलील अस्वीकार्य है ।

परिवार के निर्वाह के अतिरिक्त मौजशौक के लिए भी काफी धन होने के बावजुद बडे राजकारणी और उच्च पदाधिकारी भी रिश्वत लेते हैं, यह हम सब जानते हैं । ऐसे धनलोभी, गौरवहीन, पामर और मन से दरीद्र आदमी सदैव दरीद्र ही रहेता है । गरीब भिक्षुक रास्ते पर बैठकर भिक्षा मांगता है, और राजकारणी या उच्च पदाधिकारी एरकन्डीशन्ड रुम में उमदा चेर पर बैठकर भिक्षा मांगते हैं । सत्ता के बलपर किसीसे धन ऐंठना, यह लूंटफाट ही है । अन्य लूटेरा छरी, चप्पु, या रीवोल्वर से लूट करते हैं, कोई सत्ता को शस्त्र बना कर लूट करता है । दोनों लूट समान ही है ।

कई लोग कहेते हैं कि समाज में से बहुधा लोग रिश्वत लेते हैं, अगर मैं भी लूं तो ईसमें कसूर क्या है ? कई लोग स्वसुरपक्ष से दहेज के रुप में बडी रकम ऐंठते हैं, अगर मैं थोडी रकम लूं तो, ईसमें बुरा क्या है ? स्वमान और गौरवहीन आदमी ही ऐसा सोच सकता है । जो गलत है, वह गलत है, ईसको अच्छा नहीं कह सकते । हमें गौरव से जिना किसीने सीखाया ही नहीं, ईसी लिए किसीको करकसर से जीना अच्छा नहीं लगता । सिंह भूखा होने पर भी घास नहीं खाता, यह बात हम नहीं जानते ।

कोई कहेगा - आशा, ईच्छा बिना जीना, माने जीवन बोज बन जायेगा । संतोष के नाम पर क्या पूरी जिंदगी दरीद्र ही रहेना ? क्या वैभव पर सबका अधिकार नहीं है ? नहीं, ऐसा नहीं है । पूरी जिंदगी दरीद्र रहेना जरुरी नहीं, दरीद्रता दूर करने के लिए परिश्रम बढाना चाहिये । अपने परिश्रम के बल पर, श्रीमंत बनने पर और वैभव भुगतने में कोई रुकावट नहीं है । आज अगर रोटी सब्जी मिले तो नाराज नहीं होना चाहिये । परिश्रम करके लड्डु पा सकें तो ईसे आनंद से खाना चाहिये । ईसमें कोई रोक नहीं । लेकिन बिना परिश्रम लड्डु खाने के लिए किसीसे भीक्षा मांगे, यह उचित नहीं है । निजी आनंद के लिए किसीकी रोटी छीन लेंना यह पशु प्रवृत्ति है । हम भिक्षुक भी न बनें और पशु भी न बनें । हमें सिर्फ ईन्सान बनना है ।

परिश्रम किए बिना ही श्रीमंत होने की ईच्छा से ही, रिश्वत, जुआ, भ्रष्टाचार, दहेज की मांग वगैरह जन्म लेते हैं । ऐसे ही कामचोरी, छलकपट, लूटफाट, गुंडागर्दी भी, महेनत नहीं करने की ईच्छा से जन्म लेते हैं । ईतना ही नहीं, दूसरे देश में घुसपेठ, सरहद पर आक्रमण, युध्ध जैसे भयावह परिणाम भी बुरी ईच्छा के फलस्वरुप है । युध्ध की वजह से कई जवान शहीद हो जाते हैं, स्त्रीयां विधवा होती है, बच्चे अनाथ होते हैं । कई परिवार निराधार होते  हैं । देश की हालत बदतर होती है, महंगाई बढती है । यह सभी दुषण मानव सर्जीत है । कुदरती प्रकोप हमारे बस में नहीं लेकिन जो दुषण के लिए हम खुद जिम्मेदार हैं, उसे रोकने के प्रयास तो हमें करने ही चाहिये ।

बिना परिश्रम धन पाने की ईच्छा घातक है । ईच्छा शब्द छोटा है लेकिन उसकी भयानकता बडी है । ईसी लिए, श्रीकृष्ण भगवान के उपदेश अनुसार ऐसी ईच्छाओं का त्याग ही बहेतर है । अगर गीताजी पढें और समझें तो शायद भयानक रोग से बच जायें ।

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