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9. स्थितप्रज्ञ

श्रीकृष्ण भगवान और अर्जुन के बीच, गीताजी के उपदेश दरम्यान बहुत महत्वपूर्ण और उत्तम चर्चा स्थितप्रज्ञ के लक्षण के बारे में हुई थी । ‘सांख्ययोग’ नाम के दूसरे अध्याय में फल की आशा छोडकर कर्म करने की सलाह श्रीकृष्ण भगवान ने दी और अर्जुनको कहा - “जब तेरी बुध्धि फल की आसक्ति में से मुक्त हो जाएगी तब तेरा मोह दूर हो जाएगा और तू आत्मस्वरुप में स्थिर हो जाएगा, तब भगवद् प्राप्ति रुप योग प्राप्त  होगा ।
अर्जुन ने पूछा - "आत्मस्वरुप में स्थिर मानवी का वर्ताव किस तरह का होता है ?"
तब श्रीकृष्ण भगवान का कहा हुआ एक एक शब्द बहुत ही मूल्यवान है । हर शब्द बहुत शांति से पढने की और समझने की आवश्यकता है । गीताजी किसी संप्रदाय का ग्रंथ नहीं है । यह केवल पुरुषों के लिए या केवल महिलाओं के लिए नहीं है । किसी एक समाज और देश के लिए नहीं है । सारी दुनिया के किसी भी मानवी को अपना जीवन उज्वल बनाना हो, उनके लिए है यह ग्रंथ । ये रही अप्रतिम वाणी ---

“जब मानवी अपने मन में से उठनेवाली तमाम ईच्छाओं का त्याग करे और वासना शून्य मन से अपने आत्मस्वरुप में ही संतुष्ट रहे तब ईसको स्थितप्रज्ञ कहेते हैं । जीवन की सर्व उपाधि का मूल ईच्छाएं ही है । अगर उसे वश कर सकें तो  कई प्रश्नों का समाधान हो जाएगा । सचमुच यह बहुत कठिन कार्य है, फिर भी धीरे धीरे ईच्छाओं का त्याग करने की शुरुआत करें तो मन की स्थिरता बढेगी । स्थितप्रज्ञ माने स्थिर बुध्धिवाला मानवी ।"

"दु:ख में जो उद्विग्न नहीं होता, और सुख प्राप्त करने के लिए लालायित न हो, जिनके राग (मोह), भय और क्रोध नष्ट हो गए हों, उसे स्थिर बुध्धिवाला मुनि कहेते हैं ।”

"जो मानवी सर्वत्र राग को त्यागकर, अच्छा या बुरा जो कुछ मिले ईससे प्रसन्न नहीं होता और द्वेष भी नहीं करता । माने कि हर हालमें समान भाव रख्खे, उसकी बुध्धि स्थिर होती है ।”

“जैसे कछुआ अपने सभी अंग सिकुड लेता है, उसी तरह जो मानवी अपनी सभी ईन्द्रियों को विषयों में से खिंच लेता है, उसकी बुध्धि स्थिर होती है ।”

“अगर ईन्द्रियों द्वारा विषयों का चिंतन न करे तो धीरे धीरे, विषय दूर हो जाते हैं, लेकिन विषयों के प्रति रस नहीं छूटता, ये तो आत्मस्वरुप के परम रस का अनुभव करने से ही, छूटता है ।”

"हे अर्जुन ! जब तक विषयों के प्रति रस की निवृति नहीं होती, तब तक वह पुरुष की ईन्द्रियां, ईसके मन को घसीट कर विषयों में खींच जाती है । लेकिन ये सभी ईन्द्रियां और मन को संयमित करके - उस पर काबू पाकर, मुझ अंतर्यामी में तन्मय होकर बैठनेवाले का मन वश होता है और उसकी बुध्धि स्थिर होती है ।"

"विषयों का चिंतन करने से आसक्ति होती है । उससे कामना माने ईच्छा जागृत होती है । अगर वह पूरी न हुई तो क्रोध उत्पन्न होता है । क्रोध से मोह और उसकी वजह से अच्छे-बुरे का खयाल नहीं रहेता । ईस तरह स्मृति नाश होने से बुध्धि का नाश होता है । आखिर में अधोगति होती है ।"

"लेकिन जिसने मन को स्वाधीन किया हो, वह रागद्वेष रहित होकर, अपने वश में की हुई ईन्द्रियों द्वारा, विषयों का व्यवहार करके, प्रसन्नता को प्राप्त करता है । ऐसी राग, द्वेष रहित प्रसन्नता प्राप्त होने से, सभी दु:खों का अभाव हो जाता है और वह अनासक्त बुध्धिवाले कर्मयोगी की बुध्धि व्यापक और स्थिर होती है ।"

"ईन्द्रियां और मन को न जीतनेवाले को निष्काम बुध्धि उत्पन्न नहीं होती । ईसकी वजह से उसमें ईश्वर आराधना की भावना भी जागृत नहीं होती । ये भावना के बिना शांति प्राप्त नहीं होती और ऐसे अशांत मानवी को सुख कहां से मिल सकता है ?"

"क्योंकि ऐसा असंयमी मानवी अपने मन को ईन्द्रियों के पीछे छोड देता है । जैसे पवन, छुट्टी नाव को घसीट कर ईधरउधर ले जाता है, उसी तरह उसका असंयमी मन बुध्धि को घसीट कर ले जाता है । माने बुध्धि का नाश होता है । हे महाबाहो ! जिसका मन, ईन्द्रियों पर काबू रख सकता है, उसकी बुध्धि स्थिर होती है ।"

"संयमी ज्ञानी मनुष्यो, जो आत्मस्वरुप के प्रकाश में जागृत रहेते हैं, उसमें असंयमी मनुष्य को रात्रि जैसा लगता है । और असंयमी अज्ञानी मनुष्य को जिसमें प्रकाश दिखता है, माने जिसमें वे आनंद लेते हैं, उसमें संयमी मनुष्य को अंधकार दिखता है । ईस तरह, संयमी मनुष्य और असंयमी मनुष्य की वृत्ति परस्पर विरोधी होती है ।"
"जैसे भिन्न भिन्न नदीओं का पानी, परिपूर्ण और स्थिर समुद्र में, उसकी स्थिरता को विक्षेप किए बिना ही समा जाता है, वैसे  सभी भोग भी, स्थितप्रज्ञ पुरुष में कोई विकार उत्पन्न किए बिना ही समा जाते हैं । ऐसे मानवी को परम शांति मिलती है । लेकिन भोगों की तृष्णावाले को परम शांति नहीं मिलती ।"
"जो पुरुष, संपूर्ण कामनाओं का त्याग करके, ममता रहित, अहंकार रहित और निस्पृह होके वर्तता है, उसे ही शांति मिलती है ।" ईस अध्याय के अंतिम श्लोक में लिखा है - एशा ब्राह्मी स्थिति पार्थ ! नैनां प्राप्य विमुह्यति,
स्थित्वाश्यामन्तकालैपि ब्रह्मनिर्वाणमृच्छति.....      (गीता   2-72)
"हे अर्जुन ! यह ब्रह्मभाव पानेवाले पुरुष की स्थिति है । ऐसा योगी कभी भी मोहित नहीं होता । और अंतकाल में भी ब्राह्मी स्थिति में स्थिर रहेनेवाला वह पुरुष ब्रह्मानंद प्राप्त करता है ।"
ब्रह्मनिर्वाण शब्द के बारे में पूज्य विनोबाजी ने अपनी पुस्तक 'गीता-दर्शन' में (पेज नंबर- 56) बहुत सुंदर लिखा है । स्थितप्रज्ञ और ब्रह्मनिर्वाण शब्द गीता का विशिष्ट शब्द है, ब्रह्मनिर्वाण माने ब्रह्म में मिल जाना । ब्रह्म में घुलमिल जाना । ब्रह्म में लीन हो जाना ।         
उपरोक्त सभी बातें उच्चतम जीवन के लिए है । सांसारिक ईच्छाएं पूर्ण न होने से, बुध्धि कैसे भ्रष्ट होती है, वह बहुत सुंदर रुप से समझाया है । हमारी ईच्छाएं पूरी न होने की वजह से क्रोध उत्पन्न होता है । क्रोध की भयंकर असर हम सब महसूस करते है । कोई आदमी किसी भी वजह से हम पर क्रोधित हो तो, हमें कितना बुरा अपमान लगता  है ? अगर हमारी गलती हो तो भी सच्ची बात का ईकरार करने की हिम्मत हम नहीं जुटा पाते । अपनी गलती सुधारने के बजाय, हम पर क्रोधित होनेवाले पर कैसे बदला लिया जाए ? यह विचार ही सदैव अपने मन में घुमता रहेता है । यह हमारा अध:पतन ही है ।

अगर कभी, हमारी कोई गलती न होने पर भी, हमारे बुझुर्ग या सीनीयर अफसर, हम पर क्रोधित हो जाए तब निर्दोष होने पर भी मानहानि से हमें बुरा लगता है । ऐसा बुरा लगना स्वाभाविक है । तब हमें कुछ समय के बाद, हमारे बुझर्ग या सीनीयर अफसर को, पूर्ण शांति से सच्ची बात उन्हें बता देनी चाहिये । लेकिन मन ही मन में घुटते रहेना भी अच्छा नहीं है । अपनी सच्चाई बहुत प्रभावशाली होगी ।

एक बहुत अच्छी बात हमें याद रखनी चाहिये । क्रोधित होकर हमें, मन ही मन, किसीका बुरा नहीं सोचना चाहिये । हमारे बुरे सोचने से किसीका बुरा नहीं होता । ऐसा क्रोध हमें, मन ही मन, खुद को जलाता है, यह बहुत ही नुकशान करनेवाला है । क्रोध से होनेवाला हाई ब्लड प्रेशर, टेन्शन, एसीडीटी, चिंता, ये सभी हमारे ही सर्जन है । सामान्य गाली गलौच, हाथापाई और कभी असामान्य खून की घटना बेकाबू क्रोध का ही परिणाम  है । क्रोध की वजह से हम, कोई रोग का शिकार हो जाय तो, होस्पीटल आने जानेका खर्च, परिवार को परेशानी कितनी बढ जाती है, यह सब ठंडे दिमाग से सोचने की जरुरत है । ईसी तरह, बेकाबू क्रोध से, कोई खून केस में फंस गए तो, पोलीस स्टेशन और अदालत में आना जाना, समय की बरबादी और मानसिक त्रास के बारे में, सोचना चाहिये ।

अगर गीताजी पढें और समझें तो, ईससे बच सकते हैं । ईच्छाओं का त्याग, क्रोध का त्याग और सुख-दु:ख को समान मानने की भावना के बारे में कितना सुंदर उपदेश है । छोटी सी बात ईतनी महत्वपूर्ण है तो समग्र गीताजी का पठन और आचरण कितना उपकारक होगा ? श्रीकृष्ण भगवान ने मानव का कितना कल्याण किया है !

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