“जब मानवी अपने मन में से उठनेवाली तमाम ईच्छाओं का त्याग करे और वासना शून्य मन से अपने आत्मस्वरुप में ही संतुष्ट रहे तब ईसको स्थितप्रज्ञ कहेते हैं । जीवन की सर्व उपाधि का मूल ईच्छाएं ही है । अगर उसे वश कर सकें तो कई प्रश्नों का समाधान हो जाएगा । सचमुच यह बहुत कठिन कार्य है, फिर भी धीरे धीरे ईच्छाओं का त्याग करने की शुरुआत करें तो मन की स्थिरता बढेगी । स्थितप्रज्ञ माने स्थिर बुध्धिवाला मानवी ।"
"दु:ख में जो उद्विग्न नहीं होता, और सुख प्राप्त करने के लिए लालायित न हो, जिनके राग (मोह), भय और क्रोध नष्ट हो गए हों, उसे स्थिर बुध्धिवाला मुनि कहेते हैं ।”
"जो मानवी सर्वत्र राग को त्यागकर, अच्छा या बुरा जो कुछ मिले ईससे प्रसन्न नहीं होता और द्वेष भी नहीं करता । माने कि हर हालमें समान भाव रख्खे, उसकी बुध्धि स्थिर होती है ।”
“जैसे कछुआ अपने सभी अंग सिकुड लेता है, उसी तरह जो मानवी अपनी सभी ईन्द्रियों को विषयों में से खिंच लेता है, उसकी बुध्धि स्थिर होती है ।”
“अगर ईन्द्रियों द्वारा विषयों का चिंतन न करे तो धीरे धीरे, विषय दूर हो जाते हैं, लेकिन विषयों के प्रति रस नहीं छूटता, ये तो आत्मस्वरुप के परम रस का अनुभव करने से ही, छूटता है ।”
"हे अर्जुन ! जब तक विषयों के प्रति रस की निवृति नहीं होती, तब तक वह पुरुष की ईन्द्रियां, ईसके मन को घसीट कर विषयों में खींच जाती है । लेकिन ये सभी ईन्द्रियां और मन को संयमित करके - उस पर काबू पाकर, मुझ अंतर्यामी में तन्मय होकर बैठनेवाले का मन वश होता है और उसकी बुध्धि स्थिर होती है ।"
"विषयों का चिंतन करने से आसक्ति होती है । उससे कामना माने ईच्छा जागृत होती है । अगर वह पूरी न हुई तो क्रोध उत्पन्न होता है । क्रोध से मोह और उसकी वजह से अच्छे-बुरे का खयाल नहीं रहेता । ईस तरह स्मृति नाश होने से बुध्धि का नाश होता है । आखिर में अधोगति होती है ।"
"लेकिन जिसने मन को स्वाधीन किया हो, वह रागद्वेष रहित होकर, अपने वश में की हुई ईन्द्रियों द्वारा, विषयों का व्यवहार करके, प्रसन्नता को प्राप्त करता है । ऐसी राग, द्वेष रहित प्रसन्नता प्राप्त होने से, सभी दु:खों का अभाव हो जाता है और वह अनासक्त बुध्धिवाले कर्मयोगी की बुध्धि व्यापक और स्थिर होती है ।"
"ईन्द्रियां और मन को न जीतनेवाले को निष्काम बुध्धि उत्पन्न नहीं होती । ईसकी वजह से उसमें ईश्वर आराधना की भावना भी जागृत नहीं होती । ये भावना के बिना शांति प्राप्त नहीं होती और ऐसे अशांत मानवी को सुख कहां से मिल सकता है ?"
"क्योंकि ऐसा असंयमी मानवी अपने मन को ईन्द्रियों के पीछे छोड देता है । जैसे पवन, छुट्टी नाव को घसीट कर ईधरउधर ले जाता है, उसी तरह उसका असंयमी मन बुध्धि को घसीट कर ले जाता है । माने बुध्धि का नाश होता है । हे महाबाहो ! जिसका मन, ईन्द्रियों पर काबू रख सकता है, उसकी बुध्धि स्थिर होती है ।"
अगर कभी, हमारी कोई गलती न होने पर भी, हमारे बुझुर्ग या सीनीयर अफसर, हम पर क्रोधित हो जाए तब निर्दोष होने पर भी मानहानि से हमें बुरा लगता है । ऐसा बुरा लगना स्वाभाविक है । तब हमें कुछ समय के बाद, हमारे बुझर्ग या सीनीयर अफसर को, पूर्ण शांति से सच्ची बात उन्हें बता देनी चाहिये । लेकिन मन ही मन में घुटते रहेना भी अच्छा नहीं है । अपनी सच्चाई बहुत प्रभावशाली होगी ।
एक बहुत अच्छी बात हमें याद रखनी चाहिये । क्रोधित होकर हमें, मन ही मन, किसीका बुरा नहीं सोचना चाहिये । हमारे बुरे सोचने से किसीका बुरा नहीं होता । ऐसा क्रोध हमें, मन ही मन, खुद को जलाता है, यह बहुत ही नुकशान करनेवाला है । क्रोध से होनेवाला हाई ब्लड प्रेशर, टेन्शन, एसीडीटी, चिंता, ये सभी हमारे ही सर्जन है । सामान्य गाली गलौच, हाथापाई और कभी असामान्य खून की घटना बेकाबू क्रोध का ही परिणाम है । क्रोध की वजह से हम, कोई रोग का शिकार हो जाय तो, होस्पीटल आने जानेका खर्च, परिवार को परेशानी कितनी बढ जाती है, यह सब ठंडे दिमाग से सोचने की जरुरत है । ईसी तरह, बेकाबू क्रोध से, कोई खून केस में फंस गए तो, पोलीस स्टेशन और अदालत में आना जाना, समय की बरबादी और मानसिक त्रास के बारे में, सोचना चाहिये ।
अगर गीताजी पढें और समझें तो, ईससे बच सकते हैं । ईच्छाओं का त्याग, क्रोध का त्याग और सुख-दु:ख को समान मानने की भावना के बारे में कितना सुंदर उपदेश है । छोटी सी बात ईतनी महत्वपूर्ण है तो समग्र गीताजी का पठन और आचरण कितना उपकारक होगा ? श्रीकृष्ण भगवान ने मानव का कितना कल्याण किया है !
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