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7. अविनाशी आत्मा

श्रीकृष्ण भगवान के परम भक्त श्री नरसिंह महेता परम तत्वज्ञानी थे । यह तत्वज्ञान स्कूल या कोलेज में से मिला हुआ ज्ञान न था । वह तो भक्ति में से प्रगट होनेवाला परम ज्ञान था । उन्होंने आत्मा के बारे में अजीब कहा –

“ જ્યાં લગી આત્મા તત્વ ચિન્યો નહીં , ત્યાં લગી સાધના સર્વ જુઠ્ઠી....”

जब तक हम आत्मा को पहेचान न लें, तब तक हमारी सभी साधना जुठ्ठी माने निरर्थक होगी । आत्मा को किसीने नहीं देखी । वह क्या है ? यह किसीको मालुम नहीं, तो उसे किस तरह पहेचान सकें ? गीताजी के दूसरे अध्याय ‘ सांख्ययोग ’में श्लोक नंबर 20 में श्रीकृष्ण भगवान ने आत्मा के बारे में बहुत अच्छी तरह समझाया है ।

“ न जायते म्रियते वा कदाचिन्नायम् भूत्वा, भविता, वा न भूय:

अजोनित्य: शाश्वतोयं पुराणो, न हन्यते हन्यमाने शरीरे………”

आत्मा का जन्म नहीं होता । उसकी मृत्यु भी नहीं होती । वह पहेले न थी, या अबके बाद नहीं होगी, ऐसा नहीं है । आत्मा अजन्मा, नित्य, शाश्वत, पुरातन है । शरीर का नाश होने पर भी आत्मा का नाश नहीं होता । “ हे अर्जुन ! आत्मा को शस्त्रो काट नहीं सकते । अग्नि जला नहीं सकता । पानी भीगो नहीं सकता और वायु सूखा नहीं सकता । आत्मा, सर्वव्यापी, स्थिर, अचल और सनातन है । उसे अव्यक्त, अचिंत्य और विकार रहित कहेते हैं । ”

जैसे परमात्मा समग्र विश्व का संचालन करते हैं, वैसे आत्मा शरीर का संचालन करती है । जब तक आत्मा और शरीर जुडे हुए रहेते हैं तब तक ही शरीर जीवंत रहेता है । जब आत्मा और शरीर अलग होते हैं, तब शरीर की मृत्यु होती है । मृत्यु के समय, आत्मा अमर है ईसी लिए उसका शोक नहीं करना चाहिये और नाशवंत शरीर का तो कभी भी नाश होगा ही, ईसी लिए उसका शोक भी उचित नहीं ।

गीताजी के अध्याय नंबर 6, ‘ आत्मसंयम योग ’ में श्लोक नंबर 30 में  श्रीकृष्ण भगवान ने कहा है कि -

“ यो माम् पश्यति सर्वत्र, सर्वम् च मयि पश्यति,

 तस्याहम न प्रणश्यामि, स च मे न प्रणश्यति...”

" जो आदमी मुझे सर्वत्र देखता है और सबकुछ मुझमें ही समाया हुआ है, ऐसा समझता है, वह आदमी मुझसे अद्रश्य नहीं होता और मैं उससे अद्रश्य नहीं होता हूं । "

एक परमात्मा सर्व में कैसे व्याप्त हो सकते हैं ? और सब कुछ परमात्मा में समाया हुआ है, ऐसा कैसे हो सकता है ? कुछ समझ न सकें ऐसी बात है । लेकिन कुछ सोचें तो यह बहुत सरल बात है । पृथ्वी बहुत विशाल है, लेकिन उसको छोटे छोटे हिस्सों में बांट दिया जाय तो सबसे छोटी अति सूक्ष्म रजकण भी आखिर में तो पृथ्वी का ही हिस्सा है, और सभी सूक्ष्म रजकण आखिर में तो पृथ्वी में ही समायी हुई है । ईसी तरह अफाट महासागर का विभाजन करें तो छोटे से छोटा अति सूक्ष्म जलबिंदु भी आखिर में तो महासागर का ही हिस्सा है, और सभी सूक्ष्म जलबिंदु आखिर में तो महासागर में ही समाये हुए हैं । ईसी तरह परमात्मा पृथ्वी और महासागर की तरह विराट स्वरुप है, और आत्मा  सूक्ष्म रजकण या सूक्ष्म जलबिंदु की भांति परमात्मा का ही छोटा सा अंश है । खुद श्रीकृष्ण भगवान ने गीताजी के अध्याय नंबर 10 ‘विभूति योग’ में श्लोक नंबर 20 में कहा है -  

“ अहमात्मा गुडाकेश सर्वभूताशय स्थित

 अहमादिश्च, मध्यं च, भूतानाम् अन्त एव च...”

" सभी प्राणीओं में रहेनेवाली आत्मा मैं ही हूं । सभी प्राणीओं का आदि, मध्य और अंत मैं ही हूं । " ईस तरह आत्मा, परमात्मा का ही अंश है । परमात्मा का ही स्वरुप है ।

आत्मा हमारे शरीर में रहती है, ईतना ही हमें मालूम है । शरीरशास्त्र के तजज्ञों ने हमारे शरीर का सूक्ष्म से सूक्ष्म हिस्सा देख लिया है, फिर भी किसीने आत्मा को नहीं   देखी । ईसी लिए अगर आत्मा शरीर में रहेती हो तो वह अद्रश्य है, ऐसा हमें मानना ही होगा । पुष्पों में छिपी हुई सुगंध, पवन की ठंडी-मीठी लहर, अग्नि का तेज, परम आनंद आदि सभी अद्रश्य होने पर भी, उनका अनुभव कर सकते हैं । ईसी तरह परमात्मा और आत्मा, अद्रश्य होने पर भी, ईनका अस्तित्व हमें स्वीकारना ही चाहिये । सृष्टि का अद्भूत सर्जन और संचालन करनेवाला कोई तो होगा ही । वही परम तत्व है ।

अपने शरीर को तो हम पहचानते ही हैं । यह नाशवंत है । बचपन, युवानी, वृध्धावस्था और आखिर मृत्यु, यह हर शरीर के लिए निश्चित है । हमारा मन, यह हमारे दिमाग में से सतत उत्पन्न होनेवाले तरंग है । शरीर की सभी ईन्द्रियां मन के वश में है । शरीर नाशवंत होने पर भी, शरीर को ज्यादा से ज्यादा सुख सुविधा मिले, ऐसे खयालों में मन सदैव खोया हुआ रहेता है । ऐसे ही जीवन बीतता है । भौतिक सुख सुविधा पाने के लिए, मन कभी गलत कार्य करने के लिए भी कोशिष करता है । तब हमारे भीतर से, मन से कोई अलग तत्व, मन को नाशवंत शरीर के लिए, गलत कार्य न करने की चेतावनी भी देता है । ऐसा नहीं करना चाहिये, ऐसी कोई आवाज हम, अपने भीतर से आती सुन सकते हैं । अनुभव कर सकते हैं । यह अद्भूत अनुभव, वही आत्मा की आवाज है । यह आवाज सुनकर भी हमारा मन ईसे अनसुनी करे, यह हमारा दुर्भाग्य है ।

भावनगर के विद्वान केलवणीकार श्री नानाभाई भट्ट ने ‘હિન્દુ ધર્મની આખ્યાયિકાઓ’ नाम की अपनी पुस्तक में दो ऋषि भाईओं की बात लिखी है । दोनों भाईओं के आश्रम करीब थे । दोनों खूब तप करते थे । दोनों में आपस में बहुत स्नेह था । एक दिन छोटा भाई, बडे भैया से मिलने उनके आश्रम जा रहा था । बडे भैया के आम्रवन से गुजरते वक्त, एक पक्का आम देखकर उसे खाने का मन हुआ । “ कोई अच्छी वस्तु देखकर लालायित होना, अच्छा नहीं, ” ऐसी भीतर से आत्मा की आवाज आई । छोटे भैया, बडे भैया से मिलने गया । बडे भैया किसी वजह से दूसरे गांव गए थे, तो छोटे भैया वापस लौट  गए । वही रास्ते से गुजरते वक्त, फिर वही आम को देखा । खाने को मन हो गया । आत्मा ने रोका, तो मन ने कहा – “ कुदरत ने ऐसी अच्छी चीज बनाई है तो, उसे खाने में क्या हर्ज है ? ” फिर आत्मा की आवाज आई – “ बडे भैया की ईजाजत बिना, उनके आम्रवन से आम नहीं लेना   चाहिये । ” मन ने कहा – “ बडे भैया मुझे कभी ना नहीं कहेते, और वे तो यहां है ही नहीं, तो ईजाजत कैसे लुं ? ” आखिर मन ने आत्मा की आवाज को अनसुनी कर दी और कोई देख न पाए ऐसे आम लेकर खा लिया ।

अपने आश्रम लौटने के बाद, आत्मा की आवाज को अनसुनी करने का बहुत पछतावा हुआ । कहीं चैन न मिला । दूसरे दिन बडे भैया आने से उन्हें सबकुछ बता दिया और राजा के पास जा कर सजा दिलवाने को कहा । बडे भैया ने बहुत प्रेम से समझाया लेकिन वे नहीं माने । दूसरे दिन दोनों भाई राजा के पास गए और सबकुछ बताया । राजाने कहा – “ एक आम तो बहुत छोटी सी चीज है और जिनके आम्रवन से लिया, वे बडे भैया को कोई एतराज नहीं, वे तो क्षमा करते हैं । ईसी लिए सजा करने का प्रश्न ही नहीं उठता । ” छोटे भैया ने कहा – “ आम छोटी चीज है, मगर चोरी आखिर चोरी ही है । जो मानवी आत्मा की आवाज को अनसुनी करे, वह अपराधी है । उसे कानून के मुताबिक सजा मिलनी ही चाहिये । ” राजा खूब विवश हो गए । आखिर सजा के रुप में छोटे भैया के दोनों हाथ काट दिये गए ।     

एक छोटे से आम के कारन, अपने हाथ कटवाने की कडी सजा, स्वेच्छा से भुगतनेवाले ऋषि के मन, आत्मा का कितना बडा महत्व होगा ? आत्मा की आवाज को अनसुनी करके अपने मन को असंयमी बनने देना, अच्छी बात नहीं है । “ अगर मन निरंकुश हो जाए तो, जैसे पवन नाव को किसी भी दिशा में, घसीट कर ले जाए, ठीक वैसे ही ईन्द्रियां बुध्धि को घसीट कर ले जाती है । ” (गीताजी 2 – 67 )

मन और आत्मा के रास्ते भिन्न है । मन पतन के सरल रास्ते पर जाना चाहता है, जो अंत में दु:खदायी है । आत्मा उन्नति के रास्ते पर चलना चाहती है, जो कठिन है लेकिन अंत में आनंददायी है । मन के मार्ग पर चलनेवालों को भोगी और आत्मा के रास्ते पर चलनेवालों को योगी कहेते हैं । खुद श्रीकृष्ण भगवान ने गीताजी के अध्याय नंबर 6 ‘आत्मसंयम योग ’ में योगी की बहुत प्रशंसा की है, यह हमें याद रखना चाहिये ।

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