श्रीकृष्ण भगवान, महाभारत का संभवित युध्ध रोकने के लिए, वे खुद राजा महाराजाओं से भी श्रेष्ठ होने पर भी, शांतिदूत बनकर हस्तिनापुर गए । युध्ध से होनेवाली भयंकर जानहानि और संपत्ति के नुकशान के बारे में अनेकविध रुप से समझाने पर भी दुर्योधन नहीं माना । पांडवों को उनके हक्क के मुताबिक आधा राज्य तो नहीं लेकिन पांच गांव भी देने से स्पष्ट ईन्कार किया । अरे ! सुईकी नोक जितनी भी जमीन नहीं दूंगा ऐसा अहंकारपूर्ण जवाब दिया । ईतना ही नहीं, श्रीकृष्ण भगवान को बंदीवान बनाने का सैनिकों को आदेश दिया । परिणाम स्वरुप श्रीकृष्ण भगवान ने विराट स्वरुप धारण करके, अपने को बंदीवान करने की कुचेष्टा को चुनौती दी । दुर्योधन सन्न रह गया । महाभारत का भयानक युध्ध निश्चित हो गया । हमारे विद्वान लेखक श्री गौतम शर्मा की लिखी हुई पुस्तक ' विष्टिकार श्रीकृष्ण ’ में यह प्रसंग का बहुत सुंदर वर्णन है । अगर महाभारत युध्ध न हुआ होता तो, गीताजी का उद्भव भी न हुआ होता ।
महाभारत युध्ध होने की आशंका दोनों पक्षों में थी । ईसी लिए अपने परिचित राजा –महाराजाओं को अपने पक्ष में लेने के लिए वे प्रयत्नशील थे । ईसी प्रकार, श्रीकृष्ण भगवान से सहायता प्राप्त करने के लिए दुर्योधन और अर्जुन दोनों द्वारिका पहूचे । दोनों की बात सुनकर श्रीकृष्ण ने दोनों को सहायता करने का निश्चय किया लेकिन एक शर्त रख्खी.। एक पक्ष में मैं अकेला बिना किसी शस्त्र के रहूंगा । ओर दूसरे पक्ष में मेरी पूरी नारायणी सेना रहेगी । पहेले अर्जुन अपनी पसंद बताये ऐसा तय किया । दुर्योधन को यादवसेना गंवाने का डर था, लेकिन वह विरोध नहीं कर पाया ।
अर्जुन ने दो हाथ जोडकर बडी विनम्रता के साथ कहा – “ प्रभु ! आप हमारे पक्ष में रहें । ”
श्रीकृष्ण भगवान ने अर्जुन को दूसरी दफा सोचने को कहा । “ अर्जुन ! मैं तो शस्त्रविहिन ही रहेनेवाला हूं । ”
अर्जुन ने फिर से खूब विनम्रता के साथ कहा – “ प्रभु ! आप हमारे साथ रहो, ईससे ज्यादा कोई अपेक्षा नहीं है । ”
नारायणी यादव सेना मिलने से प्रसन्न होकर दुर्योधन ने विदाय ली । बाद में अर्जुन ने श्रीकृष्ण भगवान से कहा – “ प्रभु ! एक छोटी सी बिनती करुं ? युध्ध दरम्यान आप मेरे सारथी बने रहो ऐसी मेरी प्रार्थना है । ” श्रीकृष्ण भगवान ने वजह पूछने से अर्जुन ने बताया-
अर्जुन की भक्तिपूर्ण विनम्र प्रार्थना परमात्मा ने स्वीकार की ।
उपरोक्त सभी प्रसंग श्रीमद् भगवद् गीताजी के उद्भव के लिए बहुत महत्वपूर्ण है । अगर अर्जुन ने श्रीकृष्ण भगवान के बजाय, नारायणी यादव सेना चुनी होती तो श्रीकृष्ण भगवान की अनुपस्थिति में गीताजी के उपदेश का सवाल न रहेता । अगर अर्जुन ने परमात्मा को अपने सारथी बनने की बिनती की न होती, या तो किसी भी वजह से परमात्मा ने उसकी बिनती का स्वीकार न किया होता, तो भी गीताजी का उद्भव न होता ।
जिसके साथ, चार सुंदर श्वेत अश्व जुटे हुए हैं ऐसा रथ, श्रीकृष्ण भगवान युध्ध के लिए सज्ज दो सैन्यों के बीच लाकर खडा कर देते हैं । तब दोनों पक्ष के सैन्यों में अपने अंगत स्वजनों को देखकर अर्जुन विषादमय हो जाता है, और कहेता है – “ हे श्रीकृष्ण ! पूजा करने योग्य बुझर्गों की हत्या करके, मैं राज्य पाना नहीं चाहता । ईसी लिए मैं युध्ध नहीं करुंगा ।” तब युध्ध नहीं करना या करनायह विषय पर श्रीकृष्ण भगवान ने अर्जुन को जो उपदेश दिया, वह श्रीमद् भगवद् गीता । ?
श्रीकृष्ण भगवान ने समझाया – “ हे अर्जुन ! आत्मा अमर है । ईसी लिए भीष्म पितामह, गुरु द्रोण या किसी और की हत्या नहीं होगी । अगर तू शरीर की द्रष्टि से सोचता है तो शरीर तो नाशवंत है ही । तू युध्ध नहीं करेगा तो भी ये शरीरों का नाश होगा । युध्ध में विजयी होगा तो राज्य मिलेगा और युध्ध में तेरी मृत्यु होगी तो स्वर्ग मिलेगा । युध्ध नहीं करेगा, तो लोग तुझे कायर समझेंगे । तेरी अपकिर्ति होगी, जो उचित नहीं । ईसी वजह से, पूरा सोचने के बाद, युध्ध न करने से बहेतर है कि तू युध्ध करे । यह तेरे लिए हितकारी है । ईतना ही नहीं, तुम्हारा पांडवों का अधिकार छीनकर, कौरवों ने तुम्हारे साथ अन्याय किया है । भीष्म, द्रोण, कर्ण वगैरह उनका साथ देते हैं । अन्याय सह लेना भी कायरता है, अधर्म है । ईसी लिए युध्ध करना ही चाहिये । ”
“ अन्याय का प्रतिकार करना यह तेरा कर्तव्य है । युध्ध में विजयी होगा या पराजित होगा ? राज्य मिलेगा या मृत्यु होगी ? यश मिलेगा या अपयश मिलेगा ? ऐसी कोई भी फल की आश बगैर, संपूर्ण निष्काम भाव से कर्म करना आवश्यक है । ऐसा करने से तुझे कोई दोष नहीं लगेगा । ईसी लिए, संपूर्ण सोच विचार के बाद, तू युध्ध करने के लिए खडा हो जा । ” श्रीकृष्ण भगवान ने यह उपदेश अर्जुन को करीब 5,000 वर्ष पहेले, महाभारत के कुरुक्षेत्र में दिया था । लेकिन आज, 5,000 वर्ष के बाद, जब हमें किसी से युध्ध नहीं करना है तब यह उपदेश से क्या फायदा ?
युध्ध करना मतलब हथियार उठा के ही किसी से लडना, ऐसा नहीं है । अन्याय का विरोध जहां, जिस रुप से करना जरुरी हो, ईस रुप में विरोध करना चाहिये । ऐसा करने से किसीको बुरा लगेगा, आर्थिक नुकशान होगा, ट्रान्सफर हो जायेगी, नौकरी चली जायेगी, अपयश मिलेगा, लोग क्या कहेंगे ? ऐसे बहुत सोचना नहीं चाहिये । अति विचार से ही दुर्बलता जन्म लेती है । हमारी बात सच्ची होनी चाहिये और सत्य के लिए बलिदान देने की हमारी संपूर्ण तैयारी होनी चाहिये । महात्मा गांधीजी ने यही किया और बिना हथियार, संपूर्ण अहिंसक रुप से उन्होंने भारत को आझादी दिलवायी ।
दुनिया में हमें किसीसे दुश्मनी न हो, हमें कोई परेशान न करता हो, तो युध्ध का सवाल ही नहीं उठता । लेकिन हर आदमी को एक छिपा हुआ दुश्मन जरुर होता है । वह दुश्मन माने खुद अपना मन । वह सदैव हमारा पतन हो ऐसा ही सोचता है । हमें पतन पसंद है, ईसी लिए आंख मिचौली का खेल खेलते हैं । अपने मन के साथ अविराम युध्ध करके, अपने दोष, हम स्वयं दूर कर सकते हैं ।
एक कवि ने बहुत सुंदर लिखा है -
“ फरिस्ते से बहेतर है ईन्शान बनना, मगर ईसमें पडती है महेनत ज्यादा । ”
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