श्रीकृष्ण भगवान का प्रागट्यदिन, परंपरागत रुप से मनाने के बजाय, माने कि सिर्फ निजी आनंद को खयाल में रखकर मनाने के बजाय, यानि कि दूसरों के जीवन में भी आनंद प्रगट हो ईस तरह मनाने से, स्वाभाविक रुप से परमात्मा प्रसन्न होंगे ।
रक्तदान और चक्षुदान शरीर से हो सकनेवाली उत्तम सेवा होने पर भी, और सेवा की भावना होने पर भी, कभी कभी यह संभव नहीं बनती । किसी अन्य बीमारी की वजह से, शारीरिक दुर्बलता के कारन या तो जैफ उम्र की वजह से, डोक्टर रक्तदान करने की ईजाजत नहीं देते । ईसी तरह आंख की कोई तकलीफ या अन्य समस्या की वजह से चक्षुदान भी संभव नहीं हो पाता । मृत्यु कैसी हालात में होगी ? कब और कहां होगी ? यह भी कोई नहीं जानता । शुभ संकल्प होने पर भी, कीसी संयोगवश चक्षुदान संभव न हो तो सेवा करने के लिए क्या करें ? हताश होने की कोई आवश्यकता नहीं । परमात्मा की सच्चे दिल से पूजा करने के लिए कई रास्ते हैं ।
श्रीमद् भगवद् गीताजी का सार सिर्फ दो शब्दों में बयान करने को कोई कहे तो यह दो शब्द है "निष्काम कर्म "। जिन्होंने अपने जीवन के माध्यम से निष्काम कर्म की परिभाषा समझाई है, वैसे प्रात:स्मरणीय परम पूज्य सदगुरु श्री रणछोडदासजी महाराज, महात्मा गांधीजी, परम पूज्य रवीशंकरदादा जैसे महानुभावों के जीवनचरित्र के बारे में जानना चाहिये । अगर हम उन जैसे महान न बन शकें तो कोई बात नहीं, लेकिन उनके दिखाये हुए मार्ग पर थोडा बहुत चलेंगे तो भी परमात्मा प्रसन्न होंगे ।
परम संत श्री रणछोडदासजी महाराज ने भूखे आदमिओं को अन्न देने के लिए बीहार में दुष्काल राहत केम्प किया था । उसका वर्णन जिस में है यह “मानवद्रष्टि” नाम की पुस्तक सभी को पढने लायक है । अकिंचन संत द्वारा, समाज की सहायता से, हर दिन करीब 35,000 आदमिओं को भोजन दिया जाता था । छ: महीने बाद, केम्प की समाप्ति के समय, दरिद्र पुरुषों को धोती और महिलाओं को साडी दी गयी । धन न होने पर भी, एक पवित्र संत ने बहुत बडा काम किया । निस्वार्थ भावना से सेवा की ज्योत जलाई । उन्होंने कई नेत्रयज्ञ किए और तन, मन, धन से दरिद्र नारायण की संवा करने का जनसमाज को उपदेश दिया । उनके उपदेश अनुसार, श्रीमंत लोगों को अपनी शक्ति अनुसार धनदान करना चाहिये । अगर श्रीमंत न हो तो भी, अपने निजी खर्च में थोडी कांट छांट करके, फील्म की एक टिकट जितना या एक सीगरेट के पैकेट के मूल्य जितना दान, औरों की सेवा के लिए करना चाहिये । जो धनदान न कर शके वे, तन से हो शके ईतनी सेवा करके श्रमदान --
करें । जैसे दुष्काल राहत केम्प में अन्न सामग्री लाना, पानी का ईन्तजाम करना, रसोई बनाना, भूख से त्रस्त लोगों को प्रेम से खिलाना, जैसे कई छोटे मोटे काम में यथाशक्ति हाथ बंटाना । किसी वजह से यह भी संभव न हो तो, दरिद्र आदमी का कष्ट मिटाने के लिए सच्चे मन से प्रभु को प्रार्थना करना ।
महात्मा गांधीजी के जीवन के बारे में हम बहुत कुछ जानते हैं । बिना किसी निजी स्वार्थ के, बहुत कष्ट झेलकर, संपूर्ण अहिंसक रुप से भारत को आझादी दिलानेवाले, विश्ववंद्य विभूति का नाम दुनीया में अमर हो गया । देश के दरिद्र लोगों को, पहनने के लिए जरुरी वस्त्र भी न मिले तो, मुझे संपूर्ण सादगी से जीना चाहिये, ऐसा माननेवाले उन्होंने जीवनभर छोटी धोती पहेनी, और छोटे से उपवस्त्र से शरीर ढकते थे । ईसी वजह से लोगों ने उन्हें प्रेम से महात्मा कहा । बुध्ध, ईसु और महावीर स्वामी के अवतार समान वे महात्मा सत्य, अहिंसा और प्रेम के सच्चे उपासक थे । गीताजी का अभ्यास करके वे निष्काम बने । भारत के प्रधानमंत्री का सर्वोच्च पद उन्हें आसानी से मिलता था, फिर भी उन्होंने स्वीकार नहीं किया । गीताजी के अनासक्ति योग के बारे में लिखनेवाले ने अनासक्ति का पालन किया ।
ऐसे ही, परम पूज्य रवीशंकरदादा ने धन और यश की अपेक्षा के बिना ही, कई दरिद्र और अशिक्षित मानवीओं की सेवा की । स्वयं अनेक कष्टों को झेलकर, दूसरों के कष्ट मिटाने के लिए पैदल चलकर, चोरी करनेवालों के जीवन सुधारने के लिए उन्होंने क्या क्या किया यह जानने के लिए “ માણસાઈના દીવા ” नाम की गुजराती पुस्तक पढनी होगी । कोई आम आदमी की मृत्यु के अवसर पर भी, कोई लेखक हास्यलेख नहीं लिखता । लेकिन हमारे विद्वान हास्यलेखक श्री बकुलभाई त्रिपाठी ने हास्यलेख के माध्यम से, अपनी निराली शैली में, ये असामान्य मानवी को भव्य श्रध्धांजलि दी । उन्होंने लिखा – “ अगर हर रोज एक महाराज की मृत्यु हो जाय, तो शाला में हर रोज छुट्टी मिल जाय, तो कितना आनंद होगा ! " निर्दोष बच्चे को मा जवाब देती है – “ बेटा ! गुजरात में ईतने महाराज है ही नहीं । पूज्य रवीशंकरदादा एक ही महाराज थे, जो निष्काम सेवक थे । ”
लश्कर के जवानों, स्वामीनारायण संप्रदाय के कई अनुयायीओं, राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के कई कार्यकरों और विभिन्न स्वैच्छिक संस्थाओं के सामाजीक कार्यकरों वगैरह कुदरती आफत के दरम्यान दरिद्रनारायण की सेवा द्वारा नारायण की सेवा करते हैं । 1979 में मोरबी की जल होनारत, 1998 में कच्छ में कंडला बंदर पर आया हुआ तूफान और 2001 में कच्छ में हुए विनाशक भूकंप जैसी कुदरती आपत्ति के दौरान, ये सब नामी, अनामी सज्जनों ने कोई यश या आर्थिक लाभ की अपेक्षा के बिना, की हुई सेवा, बहुत ही प्रशंसनीय और नोंधपात्र है, यह निर्विवाद है । जन्माष्टमी के दिन हम भी, ऐसी निस्वार्थ सेवा करने का संकल्प करें तो कितना अच्छा होगा !
भावनगर के सुप्रसिध्ध भक्तकवि श्री दुलाभाई काग ने बहुत सुंदर पंक्तियां लिखी है –
“ ધરે થાળ પૂજારી ત્યાં બેઉ સમે, વ્હાલો એકલો એકલો કેમ જમે ?,
એવું દીનદયાળુને કેમ ગમે ?
મારા ઠાકોરની જુઓ પાછળથી, ભૂખ્યાં પ્રેત સમાં કોઈ હાથ ધરે,
જેનાં ભૂખથી પેટ પતાળ પૂગ્યાં, મને મંદિરમાં નજરે ઈ તરે......”
भोजन के पहेले परमात्मा को, मंदिर में और घर में भोग लगाने के बाद में ही, परमात्मा के प्रसाद के रुप में हम भोजन करें, ऐसी सुंदर परंपरा थी । परमात्मा को अकेले अकेले भोजन करना अच्छा नहीं लगता है, ईसी लिए परमात्मा ने हमें जो कुछ दिया है, उसमें से थोडा अन्न भूखे मानवी को, गाय, कौए और कुत्ते को देकर, बाद में ही हम भोजन करें । ऐसी सुंदर परंपरा अब बहुत कम घरों मे होगी । सभी में परमात्मा का दर्शन करने की यह उत्तम प्रणाली हम भूल गए । हम अधिक स्वार्थी हो गए । परमात्मा की ही असीम कृपा से हमें, दो दफा आराम से भोजन मिलता है । लेकिन ऐसे कई हतभागी लोग है जिन्हें दो वक्त की रोटी नहीं मिलती, यह भूलना नहीं चाहिये । जो काम करना नहीं चाहते ऐसे आलसी लोगों को मुफ्त भोजन कराने की बात नहीं है । लेकिन महेनत करनेवाले मानवी को, वृध्ध, अशक्त और लाचार मानवी को भिक्षा मांगने की जरुरत न हो ऐसी कोई सुंदर व्यवस्था होनी चाहिये ।
अपना खुद का मकान हो या किराये पर रहते हों, हमारे आसपास चार दीवारें होती है । हम पर छोटी या बडी छत होती है । जो ठंड, धूप या बारिश से हमारी रक्षा करती है । दुसरी ओर, कई हतभागी मानविओं को जाडे में, फुटपाथ पर, काया सिकुडकर, सोना पडता है । ग्रीष्म ऋतु में, आग जैसी सडक पर नंगे पांव चलना पडता है । और धुआंधार बारिश के समय कहां जाएं, यह सोचकर परेशान होते है ।
पथ्थर की मूर्ति के लिए हम आरस के मंदिर बनवाते हैं, लेकिन जीन्दा भगवान के लिए कुछ नहीं करते । सुवर्ण से बनी हुई, हीरा जवाहरात से आभूषित की गई, आरस की मूर्ति के दर्शन करके हम प्रसन्न होते हैं । लेकिन जिन्दा आदमिओं को फुटपाथ पर सोते हुए देखकर हमें व्यग्रता नहीं होती । भारत में करोडो रुपीये खर्चकर, बनते विशाल मंदिरों को देखते हुए धनका अभाव नहीं है । दान के अविरत प्रवाह के फलस्वरुप बनते विशाल मंदिरों का विरोध शायद उचित नहीं होगा । लेकिन ऐसे विशाल मंदिरों में हतभागी मानविओं को आश्रय मिलना चाहिये । किसीको फुटपाथ पर सोना न पडे, ऐसी कोई सुंदर योजना होनी चाहिये । देश के संत, महंत, राजकीय नेतागण कुछ सोचे यह बहुत जरुरी है । हम निजी स्वार्थ से कब मुक्त होंगे ? परमात्मा सिर्फ मंदिर के भीतर ही नहीं, लेकिन बाहर भी है ऐसा हम कब सोचेंगे ? मूर्ति नहीं लेकिन जिन्दा आदमी अधिक मूल्यवान है, उनकी सेवा ही मानवधर्म है यह समझने के लिए पहले हमें ईन्सान बनना पडेगा ।
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