“ अधरम् मधुरम्, वदनम् मधुरम्, नयनम् मधुरम्, हसितम् मधुरम्,
हृदयम् मधुरम्, गमनम् मधुरम्, मधुराधिपतेरखिलम् मधुरम्........”
श्रीकृष्ण की मधुर छबी लोगों के हृदय में सुंदर रुप से बस गई है कि लोग अपना प्रेम, अपना आनंद, अपनी भक्ति व्यक्त करने के लिए, जन्माष्टमी का त्यौहार आज भी भव्य रुप से मनाते हैं ।
सामान्य रुप से, शहर के भिन्न भिन्न चौक में, भिन्न भिन्न प्रसंग के अनुरुप, श्रीकृष्ण भगवान की मूर्तियां रख्खी जाती हैं । कहीं भव्य कटाउट्स प्रस्थापित किए जाते हैं । शोभायात्रा का आयोजन किया जाता है, जो शहर के भिन्न भिन्न मार्ग पर घुमकर श्रीकृष्ण भक्ति का संदेश फैलाती है ।
जन्माष्टमी के निमीत्त हम अपवास करके ( अपवास - दूर बैठना, उपवास – नजदीक बैठना --- हम अपवास करते हैं, उपवास नहीं करते ) परमात्मा को प्रसन्न करने के लिए स्वादिष्ट मीठाईयां फलाहार के रुप में खाकर, अपने शरीर में बसे हुए प्रभु को प्रसन्न करने का आनंद मनाते हैं । शाम को मेले में जाना, रात्रि में शहर के भिन्न भिन्न विस्तारों में की गई चकाचौंध रोशनी देखने के लिए जाना । अंतिम चरण में, किसी हवेली या मंदिर में रात्रि के 12 बजे, बहुत गिर्दी होने पर भी, भीडभाड में परमात्मा के अलप-झलप दर्शन करके धन्यता महसूस करना और पीडितों के उध्धारक ने जन्म ले लिया है, यह आश्वासन के साथ घर जाकर सो जाना । बस, जन्माष्टमी का त्यौहार मना लिया ।
ये हुई हमारी परंपरागत त्यौहार मनाने की रीत । ईसमें भक्ति है, आनंद है, जोश है, उल्हाश है, कला है, बहुत कुछ है । फिर भी, कोई कमी महसूस होती है । जिनके जीवन संदेश के प्रसार हेतु शोभायात्रा का आयोजन किया, उनका संदेश हम कुछ समझे हैं क्या ? हमने ऐसा कोई ठोस कार्य किया क्या ? जिससे प्रभु प्रसन्न हो !
जन्माष्टमी के शुभ दिन श्रीकृष्ण भगवान प्रसन्न हो जाय ऐसा, निजी स्वार्थ के बिना यानि निष्काम कर्म हमने किया क्या ? दुनिया के हर दरीद्र मानवी को सहायता करने में हम असमर्थ हैं । लेकिन किसी एक आदमी को थोडा सा अन्न तो दे शकते हैं न ! शायद किसीको नये वस्त्र न दे शकें, लेकिन पुराने वस्त्र तो दे शकते हैं न ! शायद हम ईतना भी न कर शकें तो भी, फूटपाथ पर सोनेवाले किसी आदमी को देखकर, ऐसे हतभागी लोगो का दु:ख दूर करने के लिए, सच्चे मन से परमात्मा को प्रार्थना तो कर शकते हैं न !
अध्याय नंबर 6 के श्लोक नंबर 30 में अजीब बात कह दी –
“ यो माम पश्यति सर्वत्र, सर्वं च मयि पश्यति,
तस्याहम् न प्रणश्यामि, स च मे न प्रणश्यति... ”
" जो मानवी सबमें मुझे देखता है, और मैं सबमें समाविष्ट हूं, ऐसा समझता है, वह मानवी से मैं अद्रश्य नहीं हूं और वह मुझसे अद्रश्य नहीं है । " यदि यह एक श्लोक ठीक से समझ लें तो गीताजी कंठस्थ करने की जरुरत नहीं है । परमात्मा सभी में है, ईसी लिए अगर मैं किसीकी सहायता न कर शकुं तो कोई बात नहीं, लेकिन किसीका अहित न करुं, किसीसे छल कपट न करुं, किसीको दु:ख हो ऐसा व्यवहार न करुं, किसीसे रिश्वत न लुं, ईतना तो हम समझ सकते हैं । सभी के साथ मेरा व्यवहार, अधिक से अधिक अच्छा करुं, मेरी फर्ज किसी अपेक्षा के बिना अदा करुं, ऐसा शुभ संकल्प जन्माष्टमी के दिन करेंगे तो वह उचित होगा ।
जन्माष्टमी के शुभ दिन, सुंदर और सुगंधित पुष्पों परमात्मा के चरणों में अर्पण करके आनंद का अनुभव करें, उनकी पूजा अर्चना करें । सच्ची पूजा करने के लिए, रक्तदान के रुप में अपना लहू, परमात्मा का स्मरण करते करते, किसी अनजान दरदी का कल्याण हो ऐसी शुभ भावना के साथ, परमात्मा के चरणों में अर्पण करें । सिर्फ स्वजन के लिए ही रक्तदान न करें, पूण्य या स्वर्ग पाने के लिए भी न करें, परमात्मा सभी में हैं, ईसी लिए पूजा की भावना से रक्तदान करें । रक्तदान के लिए श्रीमंत होना आवश्यक नहीं । सिर्फ हमारा स्वास्थ्य अच्छा होना चाहिये । बिना किसी खर्च, हम किसीको जीवनदान दे सकते हैं, यही परमात्मा की सच्ची पूजा है । ईससे परम आनंद की प्राप्ति होगी । जीवन से अधिक मूल्यवान क्या है ? क्या ईतना भी हम समझ नहीं सकते ?
हर तीन महीने नियमित रुप से रक्तदान करने के लिए विनम्र बिनती -
(1) किसी मां को बचाओगे तो - उसके बच्चे भी बच जाएंगे।
(2) किसी घर के मुख्य आदमी को बचाओगे तो - उसका परिवार बच जाएगा।
(3) किसी बच्चे को बचाओगे तो - उसके माता पिता बच जाएंगे।
(4) कुदरत बहुत उदार है । आप का दिया हुआ रक्त आप को वापस मिल जाएगा । आप का कुछ नहीं बीगडेगा ।
अपने स्वजन के प्रति अनन्य स्नेह होने पर भी, उनकी मृत्यु के बाद कोई भी परिवार अपने स्वजन की आंखों को छोटी सी हीराजडित मूल्यवान डिब्बी में रखकर शो केईस में नहीं रखते । आंखें कितनी भी सुंदर क्यों न हो, कमल जैसी (कमलनयन), मृग जैसी (मृगाक्षी), मीन जैसी (मीनाक्षी), कजरारी और देखते ही रहने का मन हो ऐसी, सौंदर्य से भरी हुई आंखों को मृत्यु के पश्चात कुछ ही समय में देह के साथ जलायी जाती है या भूमि संस्कार से मिटायी जाती है । कोई भी धर्म में माननेवाला समाज, धन की तरह उन्हें तिजोरी में बंद नहीं करते । अमूल्य आंखोंका मृत्यु के बाद कोई मूल्य नहीं । आज के विज्ञान युग में अगर चक्षुदान किया जाय तो दो अंध आदमिओं को, वे नेत्र मिलने से, अंधकार में जीवन बीतानेवाले मानवी को रोशनी मिल सकती है । मृत्यु के बाद ही चक्षुदान होता है ईसी लिए आंखें निकालने में कोई वेदना का सवाल ही नहीं उठता । हम ईतने स्वार्थी हैं कि जो चीज हमारे लिए कोई काम की नहीं, उसका भी दान नहीं करते । अंध मानवी के लिए यह आशीर्वाद रुप है, अनमोल है, यह समझाने की आवश्यकता नहीं । रक्तदान की तरह चक्षुदान भी, शुभ कार्य से शुभ फल मिलेगा ऐसी कामना से, पूण्य पाने की द्रष्टि से, या स्वर्ग मिलेगा ऐसी भावना से नहीं करना चाहिये । परमात्मा की सच्ची पूजा के रुप में संपूर्ण निष्काम भावना से करना चाहिये । जन्माष्टमी के शुभ अवसर पर यह शुभ संकल्प कर सकते हैं । अपने परिवार को, चक्षुदान के संकल्प के बारे में, बता देना चाहिये क्योंकि हमारी मृत्यु के बाद हम तो चक्षुदान नहीं कर सकेंगे । वह तो उन्हें ही करना पडेगा ।
पीडितों के उध्धारक श्रीकृष्ण भगवान महल में पैदा नहीं हुए । वे तो कारावास के अंधकार में पैदा हुए हैं । हमारे स्वार्थी मन के अंधकार में जिस दिन दूसरों को उपयोगी होने की शुभ भावना जागेगी और हम सब अपनी सामाजिक फर्ज के रुप में नियमित रक्तदान और चक्षुदान का संकल्प करेंगे वही शुभ दिन जन्माष्टमी होगी । हमारे हृदय में परमात्मा का जन्म हो गया होगा । परमेश्वर के दर्शन के लिए भीडभाड में मंदिर नहीं जाना पडेगा । आरस के मंदिर में, और सुवर्ण एवम् बहुमूल्य हीराजडित मूर्ति में ही परमात्मा नहीं है । वे तो मंदिर के भीतर ही नहीं, बाहर भी है । वे सिर्फ बाहर ही नहीं, हमारे भीतर भी है । उन्हें सच्चे प्रेम से खोजना आवश्यक है । वे जरुर मिलेंगे ।
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