ઓનલાઇન / અન્ય રીતે લવાજમ ભરવા માટે...

CyberSafar Edumedia Store

3. परमतत्व की विशेषता

श्रीकृष्ण भगवान और आम आदमी में क्या फर्क ? यह समझने के लिए महाभारत के अन्य पात्रों के बारे में सोचें । श्रीकृष्ण भगवान के विरल पात्र के अलावा बाकी सभी पात्रों में कोई न कोई अपूर्णता महसूस होगी, यह खुद ब खुद मालुम हो जायेगा, और परम तत्व की विशेषता समझ में आ जायेगी ।  

महाभारत में श्रीकृष्ण के अलावा कोई अत्यंत सन्माननीय पात्र हो तो वे हैं भीष्म पितामह । पावनकारी गंगामैया के वे पवित्र पुत्र, पिता के सुख के लिए, आजीवन ब्रह्मचर्य व्रत रखने की भीष्म प्रतिज्ञा के कारन ही वे ‘ भीष्म ’ कहेलाये । हस्तिनापुर के राज्य सिंहासन को वफादार रहने की प्रतिज्ञा भी उन्होंने ली थी । लेकिन शासक के अविचारी कृत्य के समय भी मौन रहेना उचित नहीं था । फिर भी हस्तिनापुर की राज्यसभा में ही, दुर्योधन की सूचना के अनुसार, दुशासन द्वारा द्रौपदी के वस्त्रहरण की, अत्यंत हीन और अयोग्य घटना को वे रोक नहीं पाए । द्रौपदी की रक्षा के बजाय, उन्होंने सिर्फ अपनी प्रतिज्ञा को ही महत्व दिया । महाभारत के युध्ध के दौरान श्रीकृष्ण भगवान ने भी शस्त्र नहीं उठाने की प्रतिज्ञा ली थी, फिर भी पांडवों की रक्षा के लिए, अपनी प्रतिज्ञा का भंग करके भी, वे रथ का पहिया हाथ में उठाकर, भीष्म पितामह को मारने के लिए दौड पडे । ‘रथचरनपाणि’की यह कथा, महाभारत के एक सुंदर प्रसंग के रुप में लिखी गयी है ।

अनेक युध्धों में कई महारथीओं को पराजित करनेवाले महानुभाव, द्रढ निश्चयी, अत्यंत शूरवीर और प्रतिभासंपन्न होने पर भी, एक नि:सहाय नारी की शीलरक्षा के लिए शस्त्र नहीं उठा पाए । किसी अनजान स्त्री की भी शीलरक्षा करनी ही चाहिये, लेकिन द्रौपदी तो उनकी पौत्रवधू होने के नाते, उनकी पुत्री के समान थी । फिर भी, खुद परम विद्वान और अधर्म और अन्याय को रोकने में समर्थ होने के बावजुद निष्क्रीय रहे । किसी भी प्रकार, नारी की शीलरक्षा करनी ही चाहिये, ऐसा उत्तम ज्ञान होने पर भी, उनकी नजरों के सामने हो रहे हीन प्रसंग को रोकने के लिए, वे कुछ नहीं कर पाए । सिर्फ शिर झुकाकर बैठे रहे । श्रीकृष्ण भगवान राज्यसभा में हाजिर न थे, फिर भी अद्रश्य रहकर, द्रौपदी को वस्त्रों पहेनाकर उन्होंने उसकी शीलरक्षा की । श्रीकृष्ण भगवान सर्वव्यापी और सर्वशक्तिमान है, ईसका यह ज्वलंत उदाहरण है ।

आचार्य द्रोण भी, शूरवीर, विद्वान और प्रतिभासंपन्न थे । भूतकाल में, द्रुपद राजा ने, एक श्रीमंत राजवी और निर्धन ब्राह्मिन के बीच मित्रता नहीं हो सकती ऐसा कहकर -  

उनका घोर अपमान किया था । ईसी वजह से, अंगत द्वेष से पीडीत आचार्य द्रोण ने, कौरवों का राज्याश्रय स्वीकार किया । अपने शिष्य अर्जुन को उत्तम शस्त्रविद्या देकर, उसके द्वारा द्रुपद राजा को पराजीत करके, बंदीवान बनाया, तभी उनका अहम् संतुष्ट हुआ । अपना प्रिय शिष्य अर्जुन धनुर्विद्या में श्रेष्ठ बना रहे ईसी वजह से, एकलव्य को उन्होंने कोई धनुर्विद्या शीखाई नहीं थी फिर भी, गुरु के नाम पर गुरुदक्षिणा के रुप में दाहिने हाथ का अंगूठा मांगने में कोई हिचकिचाहट महसूस नहीं की थी ।

द्रौपदी के चीरहरण के हीन प्रसंग के दौरान वे राज्यसभा में मौजुद थे । द्रौपदी उनके दुश्मन द्रुपद राजा की बेटी थी, फिर भी उसकी शीलरक्षा करने की उनकी नैतिक जिम्मेदारी थी । लेकिन उन्होंने कुछ नहीं किया । दुर्योधन और दुशासन के गुरु होने के नाते वे यह अधम कार्य को रोक सकते थे । अगर समझाने से न समझे तो, शस्त्रविद्या में माहिर होने से, वे शस्त्र भी उठा सकते थे । लेकिन उन्होंने कुछ नहीं किया । सिर्फ मूक प्रेक्षक बने  रहे । उनको तो कोई प्रतिज्ञा का बंधन नहीं था । ईस तरह वे कोई महानुभाव नहीं लेकिन लाचार आदमी थे । द्रोण और द्रुपद राजा की मित्रता की बात, सुदामा और श्रीकृष्ण भगवान की मित्रता के साथ तुलना करने योग्य है । श्रीकृष्ण भगवान की महत्ता खुद ब खुद समझ में आ जायेगी ।

लोग युधिष्ठिर को तो धर्मराजा कहते थे, लेकिन द्युत में उन्होंने अपनी पत्नी को दाव पर लगाने का अविचारी और अघटित कार्य किया । द्रौपदी की मानहानि की संपूर्ण जिम्मेदारी उनकी ही थी । द्युत में धन, राज्य और अपने भाईओं को भी दाव पर लगाकर सब कुछ हार जाने के बाद भी वे नहीं समझे । धूर्त शकुनी ने द्रौपदी को दाव पर लगाने को कहा, यह अत्यंत हीन बात होने पर भी युधिष्ठिर ने क्यों ईसका स्वीकार किया ? यह समझ पाना मुश्किल है । उस युग में द्युत सामान्य माना जाता हो फिर भी पत्नी को दाव पर लगाने की बात सामान्य नहीं है । कोई भी बुध्धिमान मानवी ऐसा काम नहीं करता । ऐसे अविचारी और बेजवाबदार आदमी को धर्मराजा कहेना, वह धर्म का अपमान है । उनको सत्यवादी माना जाता था, फिर भी युध्ध में गुरु द्रोण के पुत्र, अश्वत्थामा की मृत्यु हुई है, ऐसी असत्य बात गुरु द्रोण को बताई, ताकि गुरु द्रोण शस्त्र त्याग दे । बाद में मन में अश्वत्थामा – मानवी या हाथी – ऐसा बोलकर अर्धसत्य बोलने का आत्मसंतोष लिया । वास्तव में यह असत्य ही था और वे जानते भी थे । ईस तरह युधिष्ठिर आम आदमी थे ।

भीम, अर्जुन, सहदेव, नकुल अत्यंत पराक्रमी होने पर भी बडे भैया के अयोग्य कृत्य को रोक नहीं पाए । पत्नी को दाव पर नहीं लगाना चाहिये, ऐसा विरोध किसीने नहीं किया । बडे भैया को कुछ कहेना उचित नहीं, यह मान मर्यादा के रुप में अच्छा है,  फिर भी ऐसे समय पर भी न बोलना, यह केवल दुर्बलता है । अत: सभी पांडव अत्यंत शूरवीर थे, लेकिन दासत्व के हीन खयाल से, अपनी पत्नी की रक्षा न कर शके, यह निर्विवाद है ।

महारथी कर्ण महादानेश्वरी, अत्यंत तेजस्वी और समर्थ योध्धा होने के बावजुद, सिर्फ दुर्योधन के मित्र होने के नाते, द्रौपदी के चीरहरण जैसी घृणास्पद और करुण घटना को रोकने में असमर्थ रहे । प्रतापी होने पर भी, मित्र के अयोग्य कार्य में साथ देनेवाला और भरी सभा में एक नारी के शील भंगकी अमानवीय घटना को देखनेवाला, महादानेश्वरी होते हुए भी महान नहीं कहा जा सकता ।

धृतराष्ट्र, शकुनि और दुर्योधन राज्यलोभ की वजह से, कपट करके, पांडवों की हत्या करने के लिए, उनका राज्य हडपने के लिए, उनकी मानहानि करने के लिए, प्रयत्न करते ही रहते थे । बडे भैया की अनुचित आज्ञा का पालन जरुरी नहीं था, फिर भी दुशासन ने   द्रौपदी के चीर हरण करने की कोशिष करके अपनी अधमता का प्रदर्शन किया । सत्ता के मद से अंध होनेवाला आदमी, कितनी हद तक गिर सकता है, यह बात ये सभी खलनायकों ने, यह कलंक कथा के माध्यम से पुरवार की ।

श्रीकृष्ण के बिना, महाभारत की कथा, प्रतिभा संपन्न महानुभवों का मौन, शूरवीरों की दुर्बलता, खल राजपुरुषों की कुटिलता और दुराचारी की अधमता की कथा है । काल को समय का कोई बंधन नहीं । ईसी लिए यह कथा कोई निश्चित समय की नहीं है । हर युग में महाभारत होता ही रहता है और होता ही रहेगा । ईसी लिए, हर युग में श्रीकृष्ण की आवश्यकता है ही ।

“हे अर्जुन ! जब जब धर्म का विनाश होता है और अधर्म फैलता है, तब तब मैं अवतार धारण करता हूं । सज्जनो की रक्षा के लिए, दुष्टों के संहार के लिए और धर्म की पुन: स्थापना के लिए मैं हर युग में जन्म लेता हूं ।” ऐसा कहेनेवाले श्रीकृष्ण भगवान के अवतरण का शुभ दिन माने जन्माष्टमी । यह प्रेम, भक्ति और त्याग का पर्व है । श्रीमद् भगवद् गीताजी के उपदेश को समझने के लिए और उसका आचरण करके अपने जीवन को उज्वल बनाने के लिए, यह पर्व है । जन्माष्टमी त्यौहार के बारे में कुछ सोचें ।

Share with friends

Comments
Add New Search
+/-
Write comment
Name:
Email:
 
Website:
Title:
 

3.26 Copyright (C) 2008 Compojoom.com / Copyright (C) 2007 Alain Georgette / Copyright (C) 2006 Frantisek Hliva. All rights reserved."

 

ગમતાંનો ગુલાલ!

સાયબરસફર તમને ગમે છે? તો એની ભલામણ કરો મિત્રો અને સ્વજનોને. ટેલ-એ-ફ્રેન્ડ સર્વિસની મદદથી તમે તમારા વિવિધ ઇમેઇલ, બ્લોગ કે સોશિયલ નેટવર્કિંગ સાઇટના યુઝરનેમ, પાસવર્ડથી લોગ-ઇન થઈને તમારા કોન્ટેક્ટ લિસ્ટના અન્ય મિત્રોને સાયબરસફર વિશે જણાવી શકો છો.

SocialTwist Tell-a-Friend

પણ ગમશે