ઓનલાઇન / અન્ય રીતે લવાજમ ભરવા માટે...

CyberSafar Edumedia Store

2. परमतत्व – एक या अनेक ?

श्रीकृष्ण भगवान परम तत्व है, परमात्मा है, यह लेख नं. 1 में हमने देखा । कोटि कोटि लोग देवाधिदेव महादेवजी की उपासना करते हैं । कोटि कोटि लोग भगवान श्री राम को आदर्श तत्त्व के रुप में पूजते हैं । कोटि कोटि लोग श्रीकृष्ण भगवान की आराधना करते हैं और कोटि कोटि लोग मा शक्ति के विविध स्वरुपों की साधना करते हैं । तो क्या परम तत्व अनेक हैं ? हिन्दु धर्मग्रंथों में परमात्मा एक ही है, ऐसा विशेष रुप से कहा गया है, फिर भी, उत्पति, स्थिति और लय ऐसी तीन विभिन्न परिस्थितिओं के अनुरुप ब्रह्मा, विष्णु और महादेव जैसे तीन स्वरुप की कल्पना की है । ईसमें भी विष्णु के दश अवतार की विभिन्न कथाएं हैं । जिस में श्रीराम और श्रीकृष्ण मुख्य अवतार हैं । ईस तरह परमात्मा एक ही होने पर भी, उनके अनेक स्वरुप हैं, ऐसा आभास होता है । यह बात को गुजरात के सुप्रसिध्ध परम भक्त श्री नरसिंह महेता ने बहुत ही सरल भाषा में समझायी है ।

“सुवर्ण और सुवर्ण के अलंकारों में तत्वत: कोई भेद नहीं है । अलंकारों के विविध रुप के विभिन्न नाम होते हैं, जैसे कि माला, कुंडल, कटिबंध, नुपूर ईत्यादि, लेकिन सुवर्ण आखिर सुवर्ण ही है । परमात्मा के विभिन्न स्वरुपों के बावजुद परम तत्व तो एक ही है ।”

देवों के देव, देवाधिदेव महादेवजी की, परम कल्याणकारी शिव के रुप में, कई मंदिरों में पूजा की जाती है । वे संहारकर्ता भी हैं और परम मंगलकारक भी हैं । व्याघ्रचर्म, चिताभस्म, रुंडमाला और सर्प को धारण करनेवाले, वे रौद्र स्वरुप की जटा में पावनकारी गंगामैया समाई हुई है और शीतल चन्द्ररेखा भी है । जिनके तीसरे नेत्र में पूरी दुनिया को भस्मीभूत करने की शक्तिवाली अग्निज्वाला है, वे महादेवजी के दूसरे दो नेत्र स्नेहधारा बरसानेवाले अमृतकुंभ समान है । एक ही स्वरुप में, संहारक और चैतन्यकारक दो विरोधाभासी शक्तियों का अद्बूत समन्वयवाले परम तत्व माने भगवान शिव ।

“ शिव महिम्न स्तोत्र ” में एक श्लोक में बहुत अच्छी तरह से समझाया है कि --

“ त्रयी सांख्यम् योग:, पशुपतिमतम्, वैष्णवम् ईति,

प्रभिन्ने प्रस्थाने, परमिदंमद: पथ्यमिति च,

रुचिनाम् वैचित्र्याद्, ऋजुकुटिल नाना पथजुषाम्,

नृणाम् एको गम्यस्, त्वमसि पयसाम् अर्णव ईव …”

" ज्ञान मार्ग, पाशुपत संप्रदाय, (पशुपति माने शिव को माननेवाले), वैष्णव संप्रदाय, (विष्णु को माननेवाले) ईत्यादि विभिन्न संप्रदाय, सिर्फ विभिन्न रुचि के कारन ही भिन्न है । कई नदियोंका प्रवाह भिन्न भिन्न मार्ग पर बहेता होने पर भी, अंत में एक ही समुद्र को मिलता है । " वैसे ही हम किसी भी संप्रदाय में मानें, फिर भी अंतिम ध्येय तो परमात्मा को पाने का ही होना चाहिये ।

भगवान श्री राम का जीवन दर्शन संपूर्ण आदर्श से भरा हुआ है । अनजाने में संयोग का शिकार बनकर, पतिता कहेलानेवाली अहल्या शीलारुप हो गयी थी । भगवान श्रीराम ने उसका उध्धार किया, ऐसी रामायण में कथा है । विरल व्यक्तित्ववाला परम तत्व ही ऐसा कर सकता है । भगवान श्रीराम को, खुद अपने जीवन में, स्वयं ज्येष्ठ और श्रेष्ठ होने पर भी, राज्य सिंहासन के बजाय बनवास मिला । फिर भी कोई विरोध किए बिना, परिस्थिति का प्रेम से स्वीकार किया । बनवास के दरम्यान भी, सामान्य नाविक गुहराजा के प्रति उनका प्रेमपूर्ण व्यवहार और अत्यंत दरीद्र और वृध्ध भील नारी शबरी के प्रेमपूर्ण आतिथ्य का स्वीकार करनेवाला परम तत्व ही हो सकता है । कई असुरों का संहार करनेवाले परम शौर्यवान होने पर भी, दुर्बल लोगों के लिए वे करुणामय हैं । संहारक और मंगलकारी दो विभिन्न शक्तिओं के अद्भूत समन्वयवाले श्रीराम, महादेवजी से भिन्न नहीं है । सिर्फ भिन्न स्वरुप है ।

जब में पढता था तब, हमारे गुजराती के शिक्षकश्री ने समास के बारे में पढाते वक्त बहुत अच्छी बात कही ।

भगवान श्रीराम ने लंका जाने से पहेले, समुद्र के तट पर, देवाधिदेव महादेवजी के शिवलींग की स्थापना की, और पूजन किया । ईस शीवलींग का क्या नाम रख्खेंगे ? उस विषय में रसप्रद चर्चा हुई ।

   (1) श्रीराम ने कहा - राम के ईश्वर – रामेश्वर ( षष्ठी तत्पुरुष समास )

   (2) मूर्ति में से आवाज आई - राम जिस के ईश्वर हैं वह - रामेश्वर ( बहुव्रीही समास )

   (3) वहीं उपस्थित ऋषिओं ने कहा - राम और ईश्वर – रामेश्वर ( द्वंद समास )

यह बात छोटी है लेकिन उसका महत्व बहुत है । कई दफा, विभिन्न संप्रदाय के अनुयायी, वे जिनका पूजन-अर्चन करते हैं, वही स्वरुप श्रेष्ठ है, दूसरा कोई स्वरुप श्रेष्ठ नहीं है, ऐसा मानते हैं । लेकिन उपरोक्त बात से हम देख सकते हैं कि परमात्मा के दो विभिन्न स्वरुप में कितनी विनम्रता है ! मतमतांतर का कोई भी मूल्य नहीं है । किसी भी स्वरुप के माध्यम से परमात्मा को पाना यही महत्वपूर्ण है । 

तुलसी कृत रामायण में, बालकांड में, महादेवजी श्रीराम के दर्शन से प्रसन्न हुए, ईससे माता सती भवानी को आश्चर्य हुआ, ईस प्रसंग का सुंदर वर्णन है –

“ सती सो दशा शंभु की देखी, उर उपजा संदेहु बिशेषी,

शंकर जगतवंद्य जगदीशा, सुर, नर, मुनी सब नावत शीशा,

तिन्ह नृपसुत ही किन्ह प्रणामा, कही सच्चिदानंद परधामा,

भए मगन छबी तासु विलोकी, अजहुं प्रीत उर रहती न रोकी...”

लंकाकांड में श्रीराम ने महादेवजी के शीवलींग की स्थापना की और कहा – " जिसको शंकर प्रिय हो, और मेरा द्रोह करे, अथवा शंकर द्रोही होकर, मेरा भक्त बनने की कामना करे, यह दोनों बातें अयोग्य है । " और कहा –

" होई अकाम, जो छल तजी सेईही, भगति मोरी तेही शंकर देईही,

मम कृत सेतु जो दर्शन करिही, सो बिनु श्रम, भवसागर तरिही..."

जो निष्काम होकर और छल को त्यागकर, श्री रामेश्वर महादेव का पूजन - अर्चन करेगा, उसे शंकर मेरी भक्ति देंगे । निष्काम होने की बात रामायण में भी है, और श्रीमद् भगवद् गीताजी में भी निष्काम कर्म पर बहुत जोर दिया गया है, हमें उसकी नोंध लेनी चाहिये ।

उमा-महेश, सीता-राम और राधा-कृष्ण, यह प्रकृति और पुरुष के ऐक्य का सूचन करती है । परम तत्व की शक्ति, परम तत्व से भिन्न हो ही नहीं सकती । शक्ति के रुप में मा अंबाजी, गायत्रीजी, लक्ष्मीजी ईत्यादि विभिन्न स्वरुपों की साधना कई लोग करते हैं । यह उचित है, फिर भी शक्तिमान और शक्ति भिन्न नहीं है, यह बात ठीक से समझ लेनी चाहिये । मन में कोई भेदभाव नहीं होना चाहिये । अपनी रुचि के अनुसार, कोई भी मनपसंद स्वरुप का पूजन अर्चन, पूरे भक्तिभाव और द्रढ श्रध्धा के साथ करना चाहिये । किसी भी स्वरुप की निंदा नहीं करनी चाहिये । संपूर्ण प्रेम से और किसी भी निजी स्वार्थ के बिना जो कार्य करें वह श्रध्धा, लेकिन बिना प्रेम, किसीके कहेने पर, बिना कुछ सोचे समझे, मानता के रुपमें स्वार्थ प्रेरित जो कार्य करें वह अंधश्रध्धा । ईससे दूर रहेना चाहिये.। स्वर्ग या पूण्य पाने की वृत्ति से, दुन्यवी चीजें मांगने की वृत्ति से, या कोई प्रशंसा करें ईस द्रष्टि से भी परमात्मा का पूजन अर्चन नहीं करना चाहिये ।

श्रीकृष्ण भगवान ने गीताजी के अध्याय नं. 10, “विभूतियोग” में कहा है कि –

 

रुद्राणाम् शंकर श्चाश्मि – " रुद्रो में मैं शंकर हूं । " ( 10-23 )

 

राम: शस्त्रभृताम्यहम्   - " शस्त्रधारीओं में मैं राम हूं । " ( 10-31 )

ईस तरह श्रीकृष्ण भगवान, श्री महादेवजी और श्रीराम एक ही है । खुद श्रीकृष्ण भगवान ने यही कहा है, अत: ईसमें कोई संदेह नहीं ।

Share with friends

Comments
Add New Search
+/-
Write comment
Name:
Email:
 
Website:
Title:
 

3.26 Copyright (C) 2008 Compojoom.com / Copyright (C) 2007 Alain Georgette / Copyright (C) 2006 Frantisek Hliva. All rights reserved."

 

ગમતાંનો ગુલાલ!

સાયબરસફર તમને ગમે છે? તો એની ભલામણ કરો મિત્રો અને સ્વજનોને. ટેલ-એ-ફ્રેન્ડ સર્વિસની મદદથી તમે તમારા વિવિધ ઇમેઇલ, બ્લોગ કે સોશિયલ નેટવર્કિંગ સાઇટના યુઝરનેમ, પાસવર્ડથી લોગ-ઇન થઈને તમારા કોન્ટેક્ટ લિસ્ટના અન્ય મિત્રોને સાયબરસફર વિશે જણાવી શકો છો.

SocialTwist Tell-a-Friend

પણ ગમશે