परोपकाराय विभाति सूर्य:, परोपकाराय वहन्ति नद्य:,
परोपकाराय फलन्ति वृक्ष:, परोपकारश्च सदैव कार्य: ।।
सूर्य नारायण, नदीयां, वृक्ष आदि किसी नीजी स्वार्थ के बिना ही, सिर्फ परोपकार के लिए ही कार्य करते हैं । उसी प्रकार आदमी को भी किसी नीजी स्वार्थ के बिना ही, परोपकार करते करते जीवन बीताना चाहिए । यही उत्तम जीवन है । श्रीकृष्ण भगवान ने गीताजी में निष्काम कर्म पर बहुत जोर दिया है । दान नीजी स्वार्थ के बिना ही देना चाहिए । परोपकार करने के लिए श्रीमंत होना आवश्यक नहीं है । अपनी मर्यादा का खयाल रख के शुभ भावना से दान करते रहेना चाहिए । बिना सोचे कहीं भी दान कर देना, यह धन का विनाश हो सकता है ।
भारत में कई मंदिर है, नये बनाने की कोई जरुरत नहीं है । धन से छलकते हुए मंदिरों को और छलकाने की आवश्यकता नहीं है । परमात्मा सिर्फ मंदिर में ही नहीं रहते, वे मंदिर के बाहर भी है, यह भूलना नहीं चाहिए ।
अपने जीवन में कोई न कोई शुभ प्रसंग आते ही रहते हैं । सुपुत्र या सुपुत्री का जन्म, उनके लग्न, उपवित संस्कार, नीजी गृह में गृहप्रवेश, परिवार के हर सदस्य का जन्मदिन, ईत्यादि कई शुभ अवसर होते हैं । यह शुभ दिन सिर्फ अपने नीजी आनंद के लिए मनाने के बजाय, दूसरों के जीवन में भी आनंद फैले, ऐसा कुछ करने से परमात्मा की कृपा पा सकते हैं । ईस शुभ अवसर पर जो कुछ खर्च करना चाहें, उसमें थोडी कटौती करके दान करना चाहिए । मंदिरों में दान करने के बजाय, मंदिर जैसी ही कई पवित्र संस्थाएं गुजरात में हैं, उनका परिचय प्राप्त करें, और अपने शुभ अवसर पर, अपनी मर्यादा के अनुसार, कुछ दान करें, यही परमात्मा की सच्ची पूजा होगी । ऐसी संस्थाओं के बारे में जानें, वहां खुद जाकर संस्था की प्रवृति देखें, बाद में सोच विचार करके दान करें, यही उत्तम दान होगा ।
(1) जुनागढ के उच्च खानदान नागर परिवार मेंजिनका जन्म हुआ था वे परम पूज्य मातुश्री पुष्पाबहन महेता ने 1937 में विकास गृह नाम की संस्था पालडी, अहमदाबाद में स्थापित की । 26 वर्ष की युवान आयु में विधवा होने के बाद, उन्होने समाजसेवा का मार्ग अपनाया । बेसहारा विधवाओं को और पति या परिवार द्वारा तिरस्कृत महिलाओं को यह संस्था आश्रय देती है । सच्चे प्रेम से उनकी परवरिश की जाती है । आवश्यकता अनुसार शिक्षण देकर अपने पांव पर खडे होने तक सहाय दी जाती है । माता के साथ आये हुए बच्चों की भी वात्सल्यपूर्ण परवरिश की जाती है । उनको अच्छे संस्कार दिये जाते हैं । यहां आश्रय लेनेवाली कई महिलाओं का कब्जा पाने के लिए और उन्हें परेशान करने के लिए कुछ असामाजीक तत्व कोशिष करते हैं । ऐसी महिलाओं को कानुनी रक्षण भी दिया जाता है । जहां समाधान की संभावना हो वहां ऐसी उत्तम कोशिष भी की जाती है । 1988 में परम पूज्य मातुश्री पुष्पाबहन का निधन हो जाने के बाद भी यह संस्था उत्तम कार्य कर रही है । पुष्पाबहन के नीजी जीवन में वैभव या सुख सुविधा का कोई स्थान न था । वैधव्य के बाद उन्होंने जीवन पर्यंत काली साडी परिधान की । उनका जीवन बहुत सादगी पूर्ण था । जीवन के अंतिम सांस तक, उन्होंने पीडीत महिलाओं की सेवा की । “વડલાનાં વાવેતર ”नाम की पुस्तक में परम पूज्य मातुश्री पुष्पाबहन और विकासगृह के बारे में विस्तृत माहिती उपलब्ध है । उन्होंने विकासगृह के अतिरिक्त, वढवाण में विकास विद्यालय और जुनागढ में शिशुमंगल नाम की संस्थाओं की स्थापना की ।
(2) स्व. परमपूज्यपुष्पाबहनकीभतीजी, परमपूज्य श्रीमति अरुणाबहनने भी 1945 से विकास विद्यालय का सुकान संभालकर जीवन के आखिरी सांस तक अविरत सेवा की । यहां भी विधवा और त्यक्ताओं को आश्रय दिया जाता है । ईस पावन तीर्थ की मुलाकात के दौरान एक अजीब द्रश्य देखने को मिला । -- कई निर्दयी माताएं, समाज में प्रतिष्ठा गंवाने के डर से अपने अनधिकृत संतान को यहां छोड जाती है । -- ऐसे नन्हे नन्हे बच्चों की यहां बहुत अच्छी तरह से परवरिश की जाती है । संस्था की कई बहेनें बहुत वात्सल्यपूर्ण रुप से उनकी परवरिश करती है । निर्दोष फूलों को पलने में हंसते हुए देखकर, परमात्मा के दर्शन का अहेसास हुआ । परवरिश करनेवाली महिलाओं को अभिनंदन देते हुए उन्होंने कहा – “ईस संस्था ने हमारी भी ईतनी ही स्नेहपूर्ण परवरिश की है । ईसी लिए हम कुछ विशेष कर रही हैं ऐसा नहीं लगता ।”परम पूज्य अरुणाबहन के निधन के बाद भी यह संस्था उत्तम कार्य कर रही है । परम पूज्य अरुणाबहन ने भी अत्यंत सादगीपूर्ण रुप से जीवन व्यतित किया, और निष्काम भाव से सेवा की । विकासगृह और विकास विद्यालयमें कोई मंदिर नहीं है, फिर भी परमात्मा के अस्तित्व का यहां अहेसास होता है । परमात्मा सिर्फ मंदिर में ही नहीं लेकिन मंदिर के बाहर भी रहते हैं, यह परम सत्य का अनुभव होता है ।
(3) भुज निवासी परम पूज्य श्रीमति अनुबहन ठक्कर भी अजीब सेवामूर्ति थीं । उनके पास कोई संपत्ति न थी, फिर भी सेवा की अजीब धून के कारन, उनके गुरु की आज्ञा अनुसार, बडौदा जिल्ले में वाघोडीआ कस्बे के गोरज नाम के छोटे से गांव की निर्जन भूमि पर, आसपास के गांवो के बच्चों को ईकठ्ठा करके, उनको नहलाने की, उनके बाल संवारने की, उनके नाखून काटने जैसी छोटी छोटी प्रवृत्ति द्वारा सेवा की शुरुआत की । सेवा की सुगंध फैलने से कुछ कुछ मदद मिलने लगी । उन्होंने बालमंदिर की स्थापना की । उसके बाद प्राथमिक स्कूल, माध्यमिक स्कूल और हाईस्कूल की स्थापना की । बहेरे-गुंगे बच्चों के लिए अलग स्कूल की स्थापना की । उनके रहेने के लिए अच्छी सुविधावाली होस्टेल भी बनवाई । यहां वृध्धाश्रम की स्थापना भी की गई, जहां बुझुर्गों की बहुत अच्छी तरह से परवरिश की जाती है । आसपास के गांव के लोगों के लिए होस्पीटल की स्थापना की । बडौदा के निष्णात डोक्टर्स यहां आकर सेवा करते हैं । अप्रतिम सेवा के श्रेष्ठ परिणाम स्वरुप यहां कैलाश केन्सर होस्पीटल की स्थापना की गई । केन्सर के मरीजों की श्रेष्ठ सारवार निशुल्क की जाती है । मरीज और उसके एटेन्डन्ट के लिए निशुल्क भोजन की भी सुविधा है ।परम पूज्य अनुबहन अविवाहित थीं । संन्यासीनी न होने पर भी, संन्यासीनी की भांति सदैव गेरुए वस्त्र परिधान करती थीं । उनका नीजी जीवन बहुत सादगीपूर्ण था । एक अकिंचन नारी सेवा की प्रबलतम भावना से क्या कर सकती है ? यह चमत्कार जगत को दिखाकर, आखिरी सांस तक निष्काम सेवा करते करते परमात्मा की परम ज्योत में विलीन हो गई । मुनि आश्रम, गोरज नाम से सुप्रसिध्ध यह स्थल सेवा की ज्योत से झगमगा रहा है । यह पवित्र स्थल पर परमात्मा का निवास है ही ।
(4) प्रात:स्मरणीय संत परम पूज्य श्री रणछोडदासजी बापूने खुद संपूर्ण अकिंचन होने के बावजुद,समाज के सहयोग से और शेठ श्री अरविंदभाई मफतलाल के स्वैच्छिक सहकार से, 1967 में बीहार में अकाल के दौरान राहत केम्प शुरु करके, हररोज करीब 35,000 लोगों को छ महिना तक भोजन दिया । केम्प की पूर्णाहूति के अवसर पर पुरुषों को धोती और महिलाओं को साडी प्रदान की गई । पुरुषों को ड्राईवींग की तालीम दी गई, ताकि अकाल के बाद उसे काम मिल सके ।
ईसी पवित्र संत की प्रेरणा से राजकोट में नेत्र होस्पीटल की स्थापना की गई । यहां मोतीया का ओपरेशन निशुल्क किया जाता है ।निष्णात सेवाभावी डोक्टर्स द्वारा आंख के अन्य दर्दों की सारवार भी निशुल्क की जाती है । ईतना ही नहीं लेकिन आवश्यक मेडीकल टेस्ट, दवाएं, गोगल्स और अंत में ऐनक भी निशुल्क दिये जाते हैं । मरीज और उसके एटेन्डन्ट के लिए सात्विक भोजन की सुविधा का प्रबंध भी निशुल्क है ।
(5) परम पूज्य मातुश्री पुष्पाबहन के मार्गदर्शन अनुसार, हलवद में श्री रेवाशंकर प्रगतिगृह, जुनागढ में शिशुमंगल, (प्रभासपाटण - वेरावलमें उसकी शाखा है ), राजकोट में श्री कान्ता स्त्री विकासगृह, जामनगर में श्री कस्तुरबा स्त्री विकासगृह, भावनगर में श्री तापीबाई रणछोडदास गांधी स्त्री विकासगृह, अमरेली में श्री जडावलक्ष्मी रामजीभाई कामाणी विकासगृह ईत्यादि भिन्न भिन्न सज्जनों द्वारा शुभ भावना से स्थापित की हुई संस्थाएं है, जहां समाज के अत्याचारों से पीडीत महिलाएं और बच्चों को सच्चे अर्थ में आश्रय दिया जाता है । यह आश्रय भी अल्पकाल के लिए नहीं लेकिन वे पढ लिखकर अपने पांव पर खडे होकर स्वमान से जी सके, अपने जीवन के प्रश्नो वे खुद सुलझा सके, तब तक दिया जाता है । यह कोई छोटा कार्य नहीं है ।
दहेज के रुप में कुछ धन पाने के लिए किसी निर्दोष कन्या को जिन्दा जला डालना वह आसान कार्य है । लेकिन ईसमें कोई शूरवीरता नहीं है । किसीका बारबार अपमान करके, अपशब्द सुना के या शारीरिक त्रास देकर रुलाने का कार्य भी आसान कार्य है । यह कोई मुश्किल काम नहीं है । मगर ऐसे त्रास से मृतप्राय हो गई हो ऐसी निराधार, बेबस और लाचार नारी के आंसु पोंछने का काम, उसे स्वमान से जीने का सिखाने का काम, उसके जीवन में आनंद फैलाने का काम बहुत मुश्किल है । यह भी कोई एक नारी के लिए नहीं, लेकिन हजारों महिलाओं के जीवन में सुखद परिवर्तन करने का काम, अपने किसी नीजी स्वार्थ के बिना ही करना, ऐसे अमूल्य, अजोड कार्य की प्रशंसा के लिए शब्द भी नहीं मिलेंगे । ऐसे पवित्र कार्य करनेवाली महिलाएं और महानुभावों को शत शत प्रणाम करके उनके पवित्र कार्य में हम सब यथाशक्ति योगदान दें, यह अत्त्यंत जरुरी है । हम अपना नीजी स्वार्थ छोडकर पवित्र योगदान कब देंगे ?
हम श्रीमंत हैं, ऐसा अपने अहम् की संतुष्टि के लिए, या तो समाज में हमारी प्रतिष्ठा बढे ईसी लिए हम कभी कभी दान करते हैं । मगर वह श्रीकृष्ण भगवान के उपदेश अनुसार निष्काम कर्म नहीं होता है । अपने नाम की तक्ति संस्था में लगे, लोग हमारी प्रशंसा करे, ईतनी अपेक्षा मन में छुपी होती है ।
उपरोक्त महान महिलाओंने और परम संत ने अपना जीवन परमात्मा के चरणों में समर्पित कर दिया । दूसरों के जीवन में आनंद फैलाने के लिए अपने आनंद को गौण माना । दूसरों के जीवन में सुगंध फैलाने के लिए, खुद अपने लिए कंटक भरा मार्ग स्वीकार किया । उनके जैसा बहुत उच्च कोटि का हमारा जीवन न बन सके, फिर भी उनका कार्य आगे बढाने के लिए हम थोडा सा योगदान तो दे सकें न ? उनके जलाये हुए दीपक में थोडा सा तैल तो डाल सकते हैं न ? यह भी निष्काम सेवा ही है । स्वार्थी जीवन तो सभी जी सकते हैं, उसमें कोई विशेषता नहीं है । उसे पशु जीवन कह सकते हैं । निष्काम भाव से दूसरों के जीवन में आनंद फैलाने का काम ही परमात्मा की सच्ची पूजा है । हम परमात्मा की सच्ची पूजा करेंगे क्या ?
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